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| रविवि: लोहा फर्जीवाड़ा का दोषी कौन? |
| (03:05:22 AM) 11, Mar, 2010, Thursday |
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रायपुर ! पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय में लोहा फर्जीवाड़ा का असल दोषी कौन है, इसको लेकर बहस छिड़ गई है। यहां तक कि प्रकरण में कुलपति कक्ष सहित प्रशासनिक भवन व समूचे विवि परिसर में भंवर मामले ने हलचल मचा रखा है। इस फर्जीवाड़े में जहां विवि से जुड़े लोग सहायक यंत्री बीपी भंवर को निर्दोष बता रहे हैं, वहीं भंवर धारा 420, 409 के तहत जेल में निरूध्द हैं। ऐसे में विवि की कार्यशैली पर तो प्रश्न चिन्ह लग ही रहे हैं, साथ में पुलिसिया छानबीन में भी आरोप लगाए जा रहे हैं। बताया गया है, कि लोहा फर्जीवाड़ा में विवि द्वारा गठित जस्टिस तिवारी जांच रपट को नजर अंदाज कर एकतरफा कार्रवाई की गई है और एक सुनियोजित साजिश में भंवर को आरोपी बनाकर विवि ने प्रस्तुत कर दिया। इसी प्रकरण में कई अन्य आरोपी हैं, जो प्रमुख हो सकते हैं। मगर उनके खिलाफ विवि ने कोई कार्रवाई नहीं की। वहीं सहायक यंत्री भंवर न्याय के लिए कार्यपरिषद समेत विवि के प्रमुख अधिकारियों के समक्ष गुहार लगाते रह गए, मगर उनको न्याय नहीं मिल पाया। जबकि उक्त फर्जीवाड़ा के असल दोषी आज भी बेखौफ को होकर विवि में काम जारी रखे हुए हैं। इस खुलासे ने तब यादा चौंका दिया, जब जस्टिस तिवारी ने 19 आरोपों में से 18 आरोप में यंत्री भंवर को दोषी नहीं बताया है। जिसे रिपोर्ट में दोषी कहा गया। उसके खिलाफ विवि ने रपट तक लिखाने की हिम्मत नहीं दिखाई। हद तो तब हो गई कि प्रकरण के संबंध विवि के कुलपति प्रो. एसके पांडे को ठीक-ठाक जानकारी नहीं है और वे प्रकरण में सामने आने व हकीकत से बचते नजर आए। यही नहीं कुलपति जहां घटनाक्रम में ट्रांसपोर्टिंग में हुए किसी लेन-देन की गड़बड़ी से जुड़ा मामला बता रहे हैं, वहीं थाना सरस्वती नगर में दर्ज प्राथमिकी की मानें तो भंवर को लोहा फर्जीवाड़ा में गिरफ्तारी की गई है। ऐसे में यह कैसे संभव है कि लाखों के फर्जीवाड़े में फंसे विवि के सहायक यंत्री की जानकारी कुलपति को न हो। जबकि सरस्वती नगर थाना प्रभारी ने स्वयं स्वीकारा है कि यंत्री भंवर को पिछले दिनों लोहा फर्जीवाड़े में गिरफ्तार किया गया। इतना ही नहीं विवि के एक जिम्मेदार सूत्रधार ने बताया कि भंवर ने एक ठेकेदार के भुगतान में भारी कटौती कर दी थी। दरअसल उसी का उनको खामियाजा भुगतना पड़ा और उक्त ठेकेदार ने विवि के आभा मंडल में छाए रहने वाले चार प्रमुख लोगों को साथ लेकर भंवर को सोची-समझी रणनीति के तहत सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। सूत्रधार ने यहां तक कहा कि भंवर की गिरफ्तारी में पुलिस महकमे के एक प्रमुख अधिकारी की भूमिका संदिग्ध है, जिन्होंने तत्कालीन डीएसपी रमा पटेल पर दबाव बनाकर कार्रवाई है। साथ में जिला सत्र न्यायालय में सहायक यंत्री की जमानत नहीं होने दी। उल्लेखनीय है कि पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय में सहायक यंत्री बीपी भंवर को पिछले माह फरवरी में लोहा फर्जीवाड़ा के एक प्रकरण में धारा 420, 409 के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, जबकि इस घोटाले में आधा दर्जन आरोपी और हैं, जिनके खिलाफ कार्रवाई करना विवि ने मुनासिब नहीं समझा है। बताया गया है कि विवि के लोहा फर्जीवाड़ा में दो शिक्षक और एक अधिकारी की संलिप्तता के साथ-साथ उपयंत्री रूपेश शर्मा, राजेश प्रसाद सालोकी, ठेकेदार प्रकाश तिवारी, उमा रस्तोगी को जस्टिस तिवारी की रपट में दोषी ठहराया है, मगर इनके खिलाफ विवि ने प्राथमिकी दर्ज नहीं कराई। अकेले भंवर को मोहरा बना दिया गया। इसके अलावा जिन दो शिक्षक और अधिकारी की संलिप्तता माना जा रहा है, उसमें डॉ. केएस पटेल, डॉ. मनीष राय तथा डॉ. बीपी साहू की भूमिका की अनदेखी नहीं की जा सकती है। इसमें गहरी छानबीन आवश्यक है। जानकार सूत्रों की मानें तो भंवर बंटवारे व हस्तक्षेप के साथ व काम में रोक के चलते शिकार बने हैं। न्यायमूर्ति सूर्य कुमार तिवारी ने विवि में प्रस्तुत 10 पृष्ठीय जांच प्रतिवेदन में स्पष्ट लिखा है, कि भंवर पर लगे 19 आरोप में से 18 में आरोप सिध्द नहीं होता, फिर सहायक यंत्री किस तरह दोषी हुए। थाना प्रभारी सरस्वती नगर खान ने प्रतिनिधि से चर्चा में स्पष्ट किया कि भंवर को भिलाई इस्पात संयंत्र से एक ट्रक द्वारा लोहे की खेप में अनियमितता का दोषी पाए जाने पर गिरफ्तारी की गई है। उनका कहना था कि आरोपी ने जगदलपुर की जिस ट्रक नंबर का हवाला देकर लोहा के खेप रवाना होने की जानकारी दी है, दरअसल वह अस्तित्व में नहीं है। वहीं इसके उल्टे जस्टिस तिवारी ने जांच प्रतिवेदन में उपयंत्री रूपेश शर्मा द्वारा पी-3 एवं पी-4 देयकों से 18 मार्च 2006 को ट्रक क्रमांक सीजी 04 जे 260 में 17.870 मैट्रिक टन लोहा दो ठेकेदार प्रकाश तिवारी व नागेश शुक्ला को प्रदान करने के बयान का उल्लेख किया है। साथ में छात्र कल्याण भवन के लिए 27.890 मैट्रिक टन लोहा प्राप्त होने की पुष्टि की है। ऐसे में लोहे में गड़बड़ी समझ से परे है। उन्होंने बताया कि यह विचारणीय है कि भंवर भिलाई स्टील प्लांट जाकर ट्रकों से माल भेज रहे थे। लोक निर्माण विभाग द्वारा माल प्राप्त करने का दायित्व रूपेश शर्मा को था तथा माल को तौला कर, पंजी में उसकी प्रविष्टि करने का दायित्व उन्हीं का था, किन्तु 1997 के कार्य विभाजन आदेश का आड़ लेकर उन्होंने सारा उत्तरदायित्व भंवर पर मढ़ दिया। भंवर ने बहस के दौरान 31.08.2001 को किये गए कार्य विभाजन की आदेश की छायाप्रति प्रस्तुत की है, जिसमें तत्कालीन विद्यमान उपयंत्री के मध्य कार्य का विभाजन किया गया है। यह निर्विवाद है कि भंवर वर्ष 2006 में सहायक यंत्री के पद पर पदोन्नत हो गए। अत: एकमात्र उपयंत्री सिविल रूपेश शर्मा ही रहे। अतएव उपयंत्री का सारा कार्यभार वे अकेले ही संभालते आ रहे हैं। भंवर की आड़ में वे अपने उत्तरदायित्व से मुंह नहीं मोड़ सकते और 1997 के किसी कार्य विभाजन आदेश की आड़ नहीं ले सकते। रूपेश शर्मा और उमापति रस्तोगी दोनों ही व्यक्ति भंवर से चिढ़े हुए हैं इसलिये की श्री भंवर ने उनके द्वारा तैयार किए गए दो देयकों में से प्रकाश तिवारी, ठेकेदार के 9,32,874 में से कटौती करके 1,11,394 रूपये का देयक स्वीकृत किया था, इसके संबंध में प्रदत्त डी 17 की नोटशीट 23.09.08 को लिखकर दी जिस पर कुलपति-कुलसचिव ने अनुमोदन कर कार्रवाई किये जाने का आदेश दिया है। इस नोटशीट के अनुसार रूपेश शर्मा के विरूध्द विभागीय जांच की कार्रवाई की जानी थी। इसी प्रकार केन्द्रीय मूल्यांकन भवन के द्वितीय तल के बारे में जो देयक पेश किया गया था उसमें भी श्री शर्मा द्वारा बनाये गए देयक में राशि काटी गई है। श्री शर्मा के विरूध्द विभागीय कार्रवाई की अनुशंसा श्री भंवर ने की थी, किन्तु दुर्भाग्य से उसके दो पृष्ठ गायब हैं। इस नस्ती के गायब पन्नों को ढूंढकर रूपेश शर्मा के विरूध्द कुलपति के आदेशानुसार कार्रवाई संस्थित किया जाना था जो उन्होंने नहीं किया। बस्तर परिसर के अकादमी भवन के लिए नियुक्त किये गए ठेकेदार रोहित चावला ने अपने बयान में बताया है कि भिलाई से उसे 87 टन लोहा प्राप्त हुआ था, जो तौल कराने पर सही पाया गया। 5 टन लोहा श्री पूससिंह बैस विश्वविद्यालय यंत्री के निर्देशानुसार जय बाबा कंस्ट्रक्शन्स के यहां से प्राप्त हुआ। चूंकि दोनों भवन अगल-बगल बन रहे थे इसलिये जय बाबा कंस्ट्रक्शन्स से लोहा प्रशासनिक भवन लाने में किसी वाहन की आवश्यकता नहीं पड़ी। इस तथ्य से स्पष्ट है कि यह आरोप निरर्थक है, जबकि ठेकेदार को पूरा माल प्राप्त करना मंजूर है। नामी वकील से मामला उलझा भंवर प्रकरण में जिला सत्र न्यायालय में निचली अदालत में जमानत याचिका खारिज होने के पश्चात् यंत्री के भाई ने शहर के एक नामी वकील के जरिए सेंशन कोर्ट में याचिका लगाई,े जहां जमानत मिलने की उम्मीद थी। लेकिन न्यायाधीश ने निचली अदालत के फैसले सहित वकील के प्रभाव के चलते जमानत नामांजूर हो गई। अलबत्ता भंवर को जेल जाना पड़ा तथा पिछले 10 दिनों से जेल में निरूध्द हैं।
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