Deshbandhu : Articles,एच एल दुसाध, आरक्षण, लोकतंत्र और सपा
 Last Updated: 02:02:42 PM 02, Aug, 2014, Saturday
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आरक्षण, लोकतंत्र और सपा
(09:53:41 PM) 29, Sep, 2012, Saturday
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एच एल दुसाध
भारत का इतिहास आरक्षण पर केंद्रित संघर्ष का इतिहास है इसलिए थोड़े -थोड़े अंतराल पर विभिन्न अंचलों में सवर्ण, महिला, गुर्जर, जाट, मुस्लिम आरक्षण के नाम पर माहौल उत्पन्न होते रहता है। विगत कुछ वर्षों से आरक्षण के संघर्ष के नाम पर सुर्खियाँ बटोरते रहे गुर्जर और जाट, किन्तु इस वर्ष बाजी मार ले गए दलित कर्मचारी। उन्होंने प्रोन्नति में आरक्षण को पुन: बहाल करने की जो लड़ाई लड़ी, उससे अधिकांश राजनीतिक दलों पर दबाव बना और वे अदालतों के फैसलों को बदलने में जुट गए। फिलहाल प्रोन्नति में आरक्षण बहाल करनेवाला संविधान संशोधन बिल राय सभा में पहुंचकर अटक गया है और विश्लेषकों का मानना है कि इसका भी हश्र महिला आरक्षण विधेयक जैसा हो सकता है। वैसे इस बिल का जो भी हश्र हो किन्तु इस प्रसंग में सपा की भूमिका लोकतंत्र प्रेमियों के लिए लंबे समय तक बेचैनी का सबब बनी रहेगी।
इस मसले पर सपा मुखिया की भूमिका उन सवर्णों जैसी रही है जो वंचितों के हर प्रकार के प्रतिनिधित्व (आरक्षण) का तरह-तरह से विरोध करते हैं। उनका इसके विरोध के पीछे तर्क रहा कि इससे जूनियर को सीनियर बनने का मौका मिल जाता है। सीनियरों के भावनाओं की इतनी चिंता करने वाले मुलायम यह भूल गए कि सपा में शिवपाल यादव, आाम खान जैसे कई सीनियर नेताओं को पीछे धकेल उन्होंने जूनियर अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाया है। वे यदि केंद्र से लेकर राय के विभिन्न विभागों में सर्वे करायें तो पता चलेगा कि पदोन्नति में आरक्षण लागू होने के पूर्व भूरि-भूरि जूनियर सवर्ण कर्मचारी सीनियरों को पीछे छोड़ते रहे हैं। पर, चूंकि वैसे जूनियरों में बाहुल्यता उस वर्ग की रही जिसके दस वर्ष के अनपढ़ और जाहिल बालक तक को भी दंडवत कर पूरा समाज धन्य होता रहा है, इसलिये वैसे जूनियरों से सीनियरों की भावनाएं आहत होने की समस्या कभी सामने नहीं आईं। पर चूंकि पदोन्नति में आरक्षण मनुष्येतरों को सीनियर बनने का अवसर सुलभ करा देता है इसलिए वर्णवादी मानसिकता से पुष्ट लोगों की भावनाएं आहत हो जाती हैं। यह समस्या मुलायमजी को इतना विचलित कर दी कि उन्हें यह बयान जारी करने में कोई कुंठा नहीं हुई कि पदोन्नति में आरक्षण लागू होने पर समाज में कटुता फैलेगी। ऐसा ही तर्क अल्पसंख्यकों और दलित- पिछड़ों के आरक्षण की मांग के खिलाफ सवर्ण देते हैं। इन तर्कों के आधार पर सपा ने प्रोन्नति में आरक्षण के खिलाफ जनता के बीच जाने का ऐलान कर दिया है। इस बीच द्रमुक व अन्य कई दलों के साथ बहुत से सामाजिक संगठनों के तरफ से एससीएसटी की तरह ओबीसी के लिए भी पदोन्नति में आरक्षण की मांग उठाई गई जिस पर सपा के तरफ से कहा गया, जब हमारी नजरों में एससीएसटी का प्रोन्नति में आरक्षण ही असंवैधानिक है तो पिछड़ों को शामिल करने से वह संवैधानिक कैसे हो जायेगा, लिहााा संविधान प्रेमी सपा ने इस किस्म के आरक्षण के खात्मे के लिए किसी भी सीमा तक जाने का  मन बना लिया है। सपा की तरफ से यह भी कहा गया है, आरक्षण के सारे फार्मूले सही नहीं हो सकते। इटावा जिले की दो विधानसभा सीटें लखना (अब भरथना) और अजीतमल (अब औरैया) 1952 से आरक्षित चली आ रही हैं। जबकि दोनों विधानसभा सीटों पर एससीएसटी से कहीं यादा आबादी अन्य समुदायों की है। नतीजतन इन क्षेत्रों से अन्य समुदायों के बड़े नेता आगे नहीं निकल सके। ठेकों और प्रोन्नति में एससीएसटी के आरक्षण का खात्मा कर चुकी सपा ने यह बयान जारी कर उनके राजनीतिक आरक्षण के खात्मे की भी मंसा जाहिर कर दी है।
किन्तु सपा यह भूल रही है कि विविध प्रकार के आरक्षण का मामला सामाजिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा है। इसका सम्बन्ध लोकतंत्र में शक्ति (आर्थिक-राजनीतिक-धार्मिक) के सम्यक बंटवारे से है। शक्ति का  विभिन्न सामाजिक समूहों और उनकी महिलाओं के  मध्य न्यायोचित बंटवारे में ही लोकतंत्र की सलामती के तत्व निहित रहते हैं। जो तबका शक्ति  से वंचित रहता है वह लोकतंत्र में आस्था खो देता है जिससे लोकतंत्र संकटग्रस्त हो जाता है, ऐसा दुनिया के विभिन्न लोकतांत्रिक देशों का इतिहास बताता है। जहां तक भारत का सवाल है यहां दुनिया के अन्य देशों की तुलना में शक्ति का अत्यंत असमान बंटवारा हुआ है। यहां 15 प्रतिशत सुविधासंपन्न और विशेषाधिकारयुक्त लोगों का शक्ति के केन्द्रों पर 80-85 प्रतिशत कब्जा है। ऐसी स्थिति दुनिया में और कहीं नहीं है। शक्ति से स्रोतों से काफी हद तक वंचित होने के कारण ही एक तबके ने 2050 तक बन्दूक के बल पर लोकतंत्र के मंदिर पर कब्जा जमाने का ऐलान कर दिया है। ऐसे में अगर भारत में लोकतंत्र को सही सलामत रखना है तो सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, पार्किंग, परिवहन, फिल्म-टीवी, पौरोहित्य, सेना, न्यायपालिका सहित शासन- प्रशासन के सभी अंगों का भारत के चार सामाजिक समूहों (सवर्ण-ओबीसी-एससीएसटी और धार्मिक अल्पसंख्यकों )के संख्यानुपात में बंटवारा कराने का उपाय ढूंढना ही होगा।
जहां तक नौकरियों की बात है उच्च पदों की नौकरियों में ही प्रशासन की शक्ति निहित होती है। यह अप्रिय सच्चाई है कि भारत के अधिकांश मंत्रियों को अपने विभाग की कोई जानकारी नहीं होती। इन अन्धों की लाठी नौकरशाह ही होते हैं। योजनायें बनाने से लेकर उसे जमीनी स्तर पर उतारने तक का काम वे ही करते हैं। नेताओं का रोल मुख्यत: सिग्नेचर करने तक सीमित रहता है। एक तरीके से नेता नहीं, नौकरशाह ही देश चलाते हैं। जहां तक नौकरशाही की शक्ति वितरण का सवाल है, उसमें दलित-पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की भागीदारी नहीं के बराबर है। उदाहरण के तौर पर पिछले साल प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार केन्द्र के सभी विभागों और मंत्रालयों के कुल 149 सचिवों में एससी के शून्य और एसटी के मात्र दो सचिव थे। 108 अतिरिक्त सचिवों में 22.5 प्रतिशत प्रतिनिधित्व के अधिकारी एससी और एसटी वर्ग के दो-दो लोग थे।  सरकार की धुरी माने जानेवाले संयुक्त सचिव स्तर के 477 अधिकारियों में एससी का प्रतिनिधित्व सिर्फ 3 फीसद था। लगभग यही स्थिति डायरेक्टर स्तर पर तैनात 590 अधिकारी पदों पर थी। पीएमओ द्वारा जारी उस सूचना में पिछड़े और अल्पसंख्यकों के विषय में कोई जानकारी नहीं दी गई थी। पर पड़ताल करने पर दावे के साथ कहा जा सकता है कि पिछड़े और अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों का भी शक्तिशाली नौकरशाही में प्रतिनिधित्व नहीं के बराबर ही होगा। केन्द्र से भिन्न स्थिति रायों की भी नहीं है। वहां भी उच्च पदों पर  80-85 प्रतिशत कब्जा  सवर्णों का ही है। नौकरशाही में विभिन्न सामाजिक समूहों की असमान हिस्सेदारी राष्ट्र के लिए अगर कोई समस्या है तो उसका मुक्कमल हल वहां सामाजिक विविधता लागू करके ही किया जा सकता है। फिलहाल जब तक वहां विविधता का सिध्दांत लागू नहीं होता तब तक एससीएसटी के साथ ओबीसी और अल्पसंख्यकों के लिए प्रोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था करने से बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता। कारण, जिस तरह सवर्ण उच्चाधिकारी अपनी वर्णवादी मानसिकता के हाथों मजबूर होकर बहुजन कर्मचारियों की चरित्र पंजिका खराब करने में जुटे रहते हैं, उससे सामान्य प्रयिा में उनके लिए उच्च पदों पर वाजिब प्रतिनिधित्व पाना दुष्कर होगा, सपा सुप्रीमो यह मान लें।
(लेखन बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं )

Posted by: alok trivedi On: October 03, 2012
मई लेखक क विचारो से सहमत नहर हू..मई संपादक जी से यह अनुरोध करता हू की कृपया एस प्रकार क लेखको क विचारो को न प्रकाशित करे जो एकांगी अध्यन क आधार पे विषय का विश्लेषण करते है ...

Posted by: alok trivedi On: October 04, 2012
मै लेखक से अनुरोध करूंगा की वो मेरे द्वारा दिए गये कमेन्ट पे अपनी प्रतिक्रिया अवस्य दे ..

 
 
 
 
 
 
 
 
 
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