|
|
|
|
|
आपका देशबन्धु |
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
 |
|
अन्य |
|
|
|
|
|
सहयोगी संस्थाएं |
|
|
|
|
सेवाएँ |
|
|
|
|
|
|
प्रादेशिकी छत्तीसगढ़ रायपुर |
प्रिंट संस्करण
ईमेल करें
प्रतिक्रियाएं पढ़े
सर्वाधिक पढ़ी
सर्वाधिक प्रतिक्रियाएं मिली |
| मुल्जिमों से आरक्षकों की कमीशनखोरी! |
| (02:48:24 AM) 09, Feb, 2010, Tuesday |
|
हथकड़ी नहीं लगाने से लेकर वकील तैयार करने में होती है दलाली रायपुर ! जिला सत्र न्यायालय परिसर में स्थित रेलवे न्यायालय में रेलवे प्रोटेक्शन बल के आरक्षकों की कमीशनखोरी से न्याय डगमगाने लगा है। जहां एक ओर रेलवे के सामानों की चोरी समेत अन्य कारणों से पेशी में लाए जाने वाले मुल्जिमों से आरक्षक मनमाने कमीशन वसूलते हैं, वहीं दूसरी तरफ न्यायालय के अधिवक्ताओं को केस न देने व देख लेने जैसे शब्दों में धमकियां मिलने लगी हैं। हालांकि रेलवे न्यायालय इस तरह के मामलों से अछूता नहीं रहा है और पूर्व में भी प्रकरणों में रेलवे के अफसरों से शिकायत हुई है, मगर आरक्षकों की कारगुजारियों पर अफसरों की चुप्पी समझ से परे है। यहां तक कि कुछेक अवसरों में तो आरक्षकों के कमीशनखोरी के चलते खतरनाक मुल्जिम साफ बच निकलते हैं। अगर न्यायालय में आरक्षकों की तूती बोलती रही तो वह दिन दूर नहीं जब आरक्षक ही मुल्जिम को न्यायालय में पेश करने के पहले फैसला सुना दें। उल्लेखनीय है कि आरपीएफ भाटापारा, डब्ल्यूआरएस कॉलोनी, रायपुर रेलवे, चरौदा, दुर्ग एवं चकरभाठा से रोजाना दर्जनों की संख्या में रेलवे के मुल्जिम पेशी में रेलवे न्यायालय लाए जाते रहे हैं। इन मुल्जिमों को न्यायालय में प्रस्तुत करने के पूर्व ही आरपीएफ के आरक्षक अपराधी से कमीशन तय कर लेते हैं तथा सौदा तय होने के बाद ही उनको न्यायालय में पेश किया जाता है। यहां तक कि अपराधी और आरक्षकों के बीच कहीं रायशुमारी नहीं तय हो पाई तो नहीं पेश किया जाता। उल्टे आरोपी एक से अधिक दिन तक थाने की कोठरी में निरूध्द रहते हैं। बताया गया है कि आरोपी को न्यायालय में पेश करने के विभिन्न प्रचलित तरीकों के अलग-अलग कमीशन निर्धारित हैं। इसमें बिना हथकड़ी लगाए, हथकड़ी लगाकर, कम धाराओं में तथा मनपसंद अधिवक्ता से पैरवी इत्यादि के कमीशन शामिल हैं। अब अपराधी की हैसियत के मुताबिक कमीशन निर्धारित हो जाती है और फिर निश्चित तिथि में आरोपी को न्यायालय में पेश किया जाता है। सूत्रों के मुताबिक उपरोक्त सभी उपायों के लिए आरक्षकों द्वारा 50 से 60 फीसदी कमीशन वसूला जाता है। अब आरोपी सक्षम हुआ तो ठीक अन्यथा घर के सामान, जेवर आदि को जमानत में लेकर कमीशन की खानापूर्ति होती है। बिना कमीशन के आरक्षकों के कदम तो कदम कलम तक नहीं चलती। रेलवे के अधिकारियों में ओसी, डीएससी व सीएससी सहित कोलकाता में रेलवे मुख्यालय के प्रमुख अधिकारियों तक को कमीशनखोरी के प्रचलन की जानकारी है, लेकिन आज भी एक मजबूत कार्रवाई का इंतजार है ताकि रेलवे न्यायालय की अस्मिता से खिलवाड क़रने वाले आरक्षको पर रोक लगाई जा सके। इतना ही नहीं, रेलवे न्यायालय के सूत्रों ने कहा कि आरक्षकों का संबंध कबाड़ियों से सीधे है, जो रेलवे के चोरी के सामानों की खरीदी करते हैं। नहीं होती आरक्षकों की बदली रेलवे न्यायालय में मुल्जिम को लेकर पेशी में पहुंचने वाले आरपीएफ के आरक्षकों की वर्षों बदली नही होती है। जाहिर है कि कमीशन के बलबूते पर आरक्षक महीनों एक स्थान पर डटे रहते हैं। ज्यादा शिकायत होने पर अधिक से अधिक दण्ड स्वरूप लंबी अवधि की छुट्टी पर चले जाते हैं। गौरतलब है कि आरक्षकों के कमीशनखोरी से तंग एक आरोपी आरक्षक को ट्रैप कराकर रंगेहाथ कमीशन लेते चार-पांच वर्ष पूर्व न्यायालय परिसर में पकड़ा गया। अधिवक्ता भी परेशान रेलवे न्यायालय में लाए गए आरोपियों के प्रकरणों के सुनवाई में महत्वपूर्ण भागीदार अधिवक्ता भी आरपीएफ आरक्षकों की कमीशनखोरी से परेशान हैं। इन अधिवक्ताओं ने बताया कि आरक्षक आरोपी से कमीशन तो लेते ही हैं, साथ में वकीलाें से भी लिया जाता है। तब कहीं जाकर प्रकरण पैरवी के लिए वकीलों को मिल पाते हैं। यही नहीं रेलवे कोर्ट के क्लर्क से आरक्षकों का कमीशन तय है। सीआईबी से जांच की मांग आरपीएफ आरक्षकों की कमीशनखोरी से हलाकान अधिवक्ताओं ने इन घटनाओं की जांच सीआईबी से कराए जाने की मांग की है, ताकि आरक्षकों के हौसलाें पर प्रतिबंध लग पाए और मुल्जिम को भी न्यायसंगत ढंग से सुरक्षा व न्याय मिल सके।
|
|
|
|
|
| |
|
| |
|
| |
| |
|
|
|
|
| |
|
|
|
|
| |
|