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जिस जालिम ने बहुत तड़पाया...
(11:22:33 AM) 08, Feb, 2009, Sunday
ललित सुरजन

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इस करार से आने वाले समय में भारत और अमेरिका के संबंध क्या मोड़ लेंगे। हम जैसी कि बार-बार शंका व्यक्त कर चुके हैं, अमेरिका अपनी वैश्विक चालबाजियों में भारत को जूनियर पार्टनर बनाकर रखना चाहता है। अब हमारी हालत उस फिल्मी गाने जैसी है-जिस जालिम ने बहुत तड़पाया, उसी पर प्यार आया।

ललित सुरजन
भारत ने अमेरिका के साथ एटमी करार को लेकर पिछले तीन साल से चली आ रही प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण सोपान बीते शनिवार याने छह सितंबर को पार कर लिया। इस सप्ताह यह करार आगे की कार्रवाई के लिए अमेरिकी संसद में पेश किया जा चुका है और उसकी सहमति मिलते साथ मूर्त रूप ले लेगा। भारत और अमेरिका के बीच हुई इस संधि को लेकर बहुत से उतार-चढ़ाव आए और अब अमेरिकी कांग्रेस में भी थोड़ी बहुत फुलझड़ियां जरूर छूटेंगी। यह भी तय है कि इस संधि के लागू हो जाने के बाद भी लंबे समय तक बहसों का दौर चलता रहेगा। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारत की राजनीति और विदेशनीति ने इस करार के साथ एक ऐतिहासिक मोड़ ले लिया है। पहले विएना की बात करें। यह सबको पता है कि वार्ता के पहले दौर में भारत के पक्ष में फैसला नहीं लिया जा सका। दूसरे दौर की वार्ता को लेकर भी अनेक प्रश्न थे और एक समय ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सितंबर के अंत में वार्ता के एक और दौर की जरूरत पड़ेगी, लेकिन अंतत: ये शंकाएं किसी हद तक निर्मूल सिध्द हुईं अथवा शंकाओं को दूर कर लिया गया; तथा आण्विक सामग्री मुहैय्या करवाने वाले पैंतालीस देशों के समूह अर्थात एनएसजी ने भारत को मंजूरी दे दी। एनएसजी का नियम है कि वहां सारे फैसले सर्वसम्मति से होते हैं, तथा एक भी वोट खिलाफ पड़े तो कोई प्रस्ताव मंजूर नहीं हो सकता।
भारत इस समूह का सदस्य अब तक नहीं है। विएना में पहले दौर की वार्ता में सात देशों ने खुलकर आपत्तियां सामने रखी थीं जिसकी वजह से दुबारा बैठक करने की जरूरत आन पड़ी। दूसरे दौर में भी चार देश मतदान से अनुपस्थित रहे। इनका विरोध बना हुआ है और यह संभवत: अमेरिकी दबाव ही था जिसके कारण इन्होंने मतदान में भाग न लेकर भारत के लिए रास्ता आसान कर दिया। यह ध्यान देने योग्य है कि विश्व में अब दो एक देश ही ऐसे हैं जिन्होंने आण्विक अप्रसार संधि (एनपीटी) तथा व्यापक परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी) पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। भारत इनमें से एक है जो अपनी आण्विक महत्वाकांक्षा के चलते तथा किसी हद तक अपनी विशिष्ट सामरिक स्थिति के कारण इन संधियों से बचते रहा है; लेकिन जिन सात देशों ने विएना में एटमी करार का समर्थन नहीं किया अथवा आधे अधूरे मन से सहमति दी उनमें से छह के साथ भारत के सौहार्द्रपूर्ण संबंध लगातार बने रहे हैं। उन्होंने एटमी करार को सही इसलिए नहीं माना कि ये सारे देश सैध्दांतिक और व्यावहारिक रूप से परमाणु अप्रसार के पुरजोर समर्थक हैं तथा भारत की आण्विक शक्ति बनने की चाहत उन्हें समझ नहीं आती। मसलन इनमें से एक देश न्यूजीलैंड है जहां प्रधानमंत्री हैलेन क्लॉर्क के नेतृत्व में पूरा देश लंबे समय से आण्विक शक्ति का विरोध करते रहा है। यूरोप के देश जैसे आयरलैण्ड, ऑस्ट्रिया, स्विट्जरलैण्ड आदि वे देश हैं जो पूरी तरह से एटमी शक्ति के खिलाफ हैं। इसमें बहुत कुछ योगदान ग्रीन पार्टी जैसे राजनीतिक दलों का है जो मतदाताओं के बीच अच्छा-खासा प्रभाव रखते हैं व जिनकी उपेक्षा किसी भी सरकार को भारी पड़ सकती है।
यह हैरानी की बात है कि इस सरल सच्चाई को हमारे टीकाकार समझने से इंकार करते हैं। पिछले सप्ताह इन लोगों ने बार-बार यूरोप के 'छोटे-छोटे देश', 'बित्ता बराबर देश', 'भारत के एक जिले से भी छोटे देश' जैसे पदों का उपयोग कर अपनी नासमझी का परिचय दिया। वे यह भूल गए कि ऐसे मौके पर देश का आकार नहीं, बल्कि उसकी सार्वभौमिकता मायने रखती है। खैर, सात देशों में अपवाद स्वरूप एक बड़ा देश चीन भी था जिसकी अलग ही कहानी है। यह एक अटल सत्य है कि आप अपने पड़ोसी नहीं बदल सकते। इस नाते भारत चीन के साथ सदा से सौहार्द्रपूर्ण संबंध बनाने की कोशिश करता रहा है। लेकिन यह भी राजनीति की विडंबना है कि चीन भारत को नीचा दिखाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ता। या तो चीन स्वयं अपनी विशालता से आक्रांत है या फिर साम्राज्यवादी विस्तार की उसकी महत्वाकांक्षा अभी शांत नहीं हुई है। शायद इसलिए उसे अपने आंतरिक विघटन का डर सताता रहता है।
इस मामले में अमेरिका और चीन के बीच मुझे कोई बहुत ज्यादा फर्क दिखाई नहीं देता। विएना में चीन ने भारत का बराबर विरोध किया। जब राष्ट्रपति बुश ने राष्ट्रपति हू जिनताओ से फोन पर बात की, उसके बाद ही वह मतदान से अनुपस्थित होने के लिए राजी हुआ, ऐसा प्रारंभिक खबरों से पता चलता है।
बहरहाल इन तमाम बाधाओं के बावजूद करार तो हो ही गया है। इसके बाद यही प्रश्न उठता है कि आने वाले समय में भारत और अमेरिका के संबंध क्या मोड़ लेंगे। हम जैसी कि बार-बार शंका व्यक्त कर चुके हैं, अमेरिका अपनी वैश्विक चालबाजियों में भारत को जूनियर पार्टनर बनाकर रखना चाहता है। अब हमारी हालत उस फिल्मी गाने जैसी है-जिस जालिम ने बहुत तड़पाया, उसी पर प्यार आया। क्या भारत इससे उबर पाएगा, यह समय के गर्भ में है। सामरिक विश्लेषक सी उदयभास्कर का कहना है कि पंडित नेहरू के समय जैसे हमने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई थी आज फिर उसी रास्ते पर चलने की जरूरत है, लेकिन क्या सोनिया-मनमोहन की जोड़ी यह कमाल कर पाएगी। पंडित नेहरू और होमी भाभा के समय से भारत एटमी शक्ति के सामरिक इस्तेमाल का विरोध करते आया है। कालांतर में यह स्थिति बदली और हमारे रूख में आए बदलाव पर शांतिप्रिय देशों को आश्चर्य भी हुआ। आज एक बड़ी आण्विक शक्ति होने का दर्जा पा लेने के बाद क्या भारत-आण्विक अप्रसार की दिशा में कोई विश्वसनीय तथा कारगर भूमिका निभा पाएगा? इस प्रश्न का भी उत्तर मिलना अभी बाकी है। ये बुनियादी सवाल हैं लेकिन इनके आगे पीछे भारत की विदेश नीति, आर्थिक नीति, गुटनिरपेक्षता व पंचशील के सिध्दांत, वाणिज्यिक रिश्तों आदि को लेकर और भी बहुत से सवाल उभरेंगे जिनका संतोषजनक उत्तर देने पर ही कांग्रेस पार्टी और उसकी सरकार सफलता का श्रेय ले सकेगी।  

 
 
 
 
 
 
 
 
 
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