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स्थानीय स्वशासन की ईकाइयों के स्वशक्तिकरण की संभावना

13, Apr, 2011, Wednesday 09:08:07 PM

डा. आलोक पाण्डेय

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में अपनी पहचान रखने वाले भारत की छवि पिछले दो दशकों से एक तेज गति से आर्थिक विकास करने वाले देश के रूप में भी होने लगी है।

 नई दिल्ली में भारतीय उद्योगों के परिसंघ (सी.आई.आई.) के वार्षिक सत्र 2011 से संबंधित हाल ही (8-9 अप्रैल) में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्राय: देश के सभी नीति निर्ताताओं के साथ-साथ केन्द्रीय वित्त मंत्री ने भी दो अंकों वाले आर्थिक विकास की दर को पाने की ही चर्चा की।
1 किन्तु इस आर्थिक विकास का लाभ आजादी के बाद के 63 सालों में किसे मिला इसे जानने के लिये उसी समय प्रसिध्द समाजसेवी अन्ना हजारे के द्वारा जंतर-मंतर पर किये गये आमरण अनशन के बारे में जान कर समझा जा सकता है।
सी.आई.आई की बैठक में देश के प्रमुख नौकरशाहों, जैसे भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त और नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक इत्यादि ने 'जनता के मौन रहने की प्रवृत्ति' को देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार को एक महत्वपूर्ण मुद्दा माना। इस संदर्भ में उनके द्वारा जनता को सामुहिक रूप से अपनी आवाज बुलंद करने की वकालत की गयी।
भारतीय लोकतंत्र के वर्तमान स्वरूप को यदि देखें तो स्थानीय स्वशासन की ईकाइयों (पंचायती राज संस्थाओं और स्थानीय नगरीय निकायों) को ऐसे बहुत से कामों को करने की जिम्मेदारी दी गयी है जिससे समाज में आर्थिक विकास के साथ सामाजिक न्याय को स्थापित किया जा सकता है। यदि संविधान की मंशा के अनुरूप स्थानीय स्वशासन की ईकाइयों को काम करने का मौका मिले तो ये ईकाइयॉ न केवल आर्थिक विकास को तेजी से बढ़ाने में मददगार होंगी बल्कि जनता  के अधिक निकट होने के कारण भ्रष्टाचार को कम करने और पारदर्शी शासन व्यवस्था को बढ़ाने में यादा सहायक बन सकती हैं। किन्तु इसके लिये इन ईकाइयों को मजबूत करने की आवश्यकता होगी।
स्थानीय स्वशासन की ईकाइयों  को मजबूत करने के संबंध में पिछले लगभग दो दशकों में किये गये प्रयासों का विश्लेषण करें तो यह साफ होता है कि किसी भी राय सरकार ने (इस संदर्भ में केरल को भी जोड़ा जा सकता है) वास्तव में स्थानीय स्वशासन की ईकाइयों को सशक्त करने का स्वार्थहीन प्रयास नहीं किया। जहॉ तक जनता की मॉग करने की बात है तो अनुभव यह बताते हैं कि सरकार के मंत्रियों और लोकसेवकों के साथ संवाद स्थापित करने और निगोशिएट करने के लिये जिस प्रकार की क्षमता की आवश्यकता है उस प्रकार की क्षमता स्थानीय स्वशासन की ईकाइयों के चयनित जनप्रतिनिधियों में नहीं है। ऐसे में सामान्य व्यक्ति से इस प्रकार की कल्पना करना तो 'दिवास्वप्न' से अधिक कुछ नहीं होगा।
जहॉ तक स्थानीय स्वशासन की ईकाइयों के चायनित जनप्रतिनिधियों की संवाद स्थापित करने और निगोशिएट करने की क्षमता बढ़ाने के लिये प्रयास करने का प्रश्न है तो इस विषय के दो मुख्य पक्षों को समझाना बहुत जरूरी है। पहला पक्ष उचित दक्षता रखने वाले मानव संसाधनों से जुड़ा है जो क्षमताओं को बढ़ाने के काम के लिये बहुत अवश्यक है तो दूसरा पक्ष क्षमता बढ़ाने के लिये आवश्यक वित्तीय संसाधन से जुड़ा हुआ है।
जहॉ तक सरकार का प्रश्न है तो इस प्रकार के क्षमता विकास के संबंध में सरकार की दोनों ही पक्षों में अपनी सीमा बहुत स्पष्ट हैं। सरकार के द्वारा सामाजिक क्षेत्र में योजनागत व्ययों के संदर्भ में देखें तो पिछले कई वर्षों से यह लगातार घट रहा है। ऐसे में यह सोचना कि इस प्रकार की क्षमताओं को बढ़ाने का दायित्व सरकार केवल अपने बूते पर कर सकेगी, असंभव सा लगता है। सरकार इस काम के लिये उद्योगों का सहारा अवश्य ले सकती है।
जहॉ तक उद्योगों की बात है तो निगमों के सामाजिक उत्तरदायित्व (कॉरपोरेट सोशल रेसपॉन्सिबिलिटी) में लोगों की क्षमताओ को बढ़ाने के लिये अनेक उपाय किये जा रहे हैं। किन्तु लोगों की क्षमताओं को बढ़ाने के यादातर उपाय अजीविकोपार्जन और आर्थिक गतिविधियों से जुड़े हुये हैं। ऐसे में सामान बनाने वाले उद्योगों ने चिप्स, अचार, पापड़, अनाने के लिये समूहों को गठित करना शुरू किया है तो गैर बैकिंग वित्तीय संस्थानों ने स्वयं सहायता समूह और एकल लक्ष्य समूह (कॉमन इन्टरेस्ट ग्रूप) बनाने का। किन्तु इस पूरी प्रक्रिया में समूह के सदस्य केवल 'लेने वाले' छोर पर खड़े दिखायी देते हैं जो उनकी निर्भरता को ही बढ़ाने वाला है आत्मनिर्भरता को नहीं। उद्योगों के लिये ऐसे लोग 'मानव संसाधन' तो बन सकते हैं किन्तु 'सामाजिक संसाधन' नहीं।
संवाद स्थापित करने और निगोशिएट करने की क्षमता इस पूरे काम में सरकार और उद्योग नागरिक समाज संगठनों का सहयोग ले सकते हैं। नागरिक समाज संगठनों ने सूचना के अधिकार से लेकर लोकपाल विधेयक लाने के अपने प्रयासों के माध्यम यह दिखाया हे कि सरकार के मंत्रियों और लोकसेवको के साथ संवाद स्थापित करने की क्षमता उनमें है। सरकार और उद्योगों के वित्तीय सहयोग से नागरिक समाज संगठन इस कार्य में सरकार और उद्योगों को सहयोग करने में सक्षम हो सकते हैं। वास्तव में यह स्थिति न केवल वर्तमान संदर्भ में समाज के तीन प्रमुख घटकों- सरकार, बाजार और समुदाय- के आपसी सहयोग को बढ़ाने वाली होगी जिसका दीर्घकालिक लाभ देश की आम जनता को मिलेगा। इससे भी अधिक इस प्रकार के अनुभव आने वाले समय में समाज के विभिन्न घटकों के आपसी समन्वय के एक गौरवशाली इतिहास के रूप में याद किये जायेंगे।

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