म मन में रह-रह कर उसकी स्मृति कौंधती रहती है। उसका शीतल जल और टेढ़ा-मेढ़ा घुमावदार प्रवाह पथ, उसके आसपास पीली माटी के टीले और टीलों से आगे फैले हुए खेत आज भी जैसे मुझे पुकारते हैं। लगता था जैसे कोई स्वर्ग का कोना था वहां, जहां से हमें वक्त बहुत दूर ले आया है।
निमाड़ अंचल के लोगों ने इस नदी को उसके टेढ़-मेढ़े विस्तार के कारण बाकड़ी नदी का नाम दिया है। निमाड़ी में बाकड़ी का अर्थ है तिरछी। इसका तिरछापन ''कहीं गहरापन, कहीं उथलापन, कहीं छरहरापन'' उसे एक अलग ही सौंदर्य से पूरित करता था। पूर्वी निमाड़ में स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में अपनी किशोर अवस्था से ही गांधी जी की पुकार पर राष्ट्र की आजादी के लिए वंदे मातरम् का मंत्र जपने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, इतिहास के अध्येता और प्रखर पत्रकार जगदीश विद्यार्थी अपनी पकी हुई उम्र वाली अनुभवी आंखों से पूरे क्षेत्र का भूगोल और इतिहास बताते हुए कहते हैं। इस नदी का वास्तविक नाम वनकुंवर है। भले ही नक्शों में इसका कुछ भी नाम हो यहां के जन-जन तो इसे बाकड़ी नदी ही कहते हैं। अब तो यह नदी धीरे-धीरे रेत में गुम होती चली जा रही है, परंतु मेरे मन में वह आज भी अपनी पूरी जल समृद्धि के साथ प्रवाहमान है। मुझे भीतर से भिगोती यह नदी मेरे भीतर आज भी एक हरा कोना रचती है। उसकी सूखी रेत से अपनी हथेली से कुरेद-कुरेद कर निकाले हुए जल का स्वाद आज भी मेरे कंठ में खिलखिलाता है। लगता है वह बचपन का प्यार है जो जीवनभर अपनी नसों में ऊर्जा प्रवाहित करने की शक्ति रखता है।
मुझे अपने घर के पिछवाड़े वाली गली से बाकड़ी के किनारे पहुंचने में मुश्किल से दस मिनट लगते थे परंतु लौटने में दस जनम। वह बचपन के दिन थे। एक दिन में एक जन्म जीने की उमंग से भरे दिन। उधर नदी का प्रवाह तेज रहता था परंतु गहरा बिल्कुल नहीं था। पिंडलियां भिगोते हम पैदल नदी को पार कर लेते थे और फिर दूसरे किनारे पीली और काली माटी के टीलों पर चढ़ते ही हमारे सामने खेत आ जाते। इन खेतों के किनारे-किनारे रास्ते पार करते ही करीब तीन चार किमी दूर नदी का दूसरा रूप मिलता था, जहां उसका प्रवाह लगभग आड़ा हो जाता। वहां पर नदी का नाम भी बदल जाता था। वहां पर आड़ी नदी कहलाती। आड़ी नदी और बाकड़ी नदी के किनारे खेत और लंबी अमराई की छायादार पगडंडियां। रास्ते में इमली के बड़े पेड़ और कहीं-कहीं नीम के पेड़ों की कतारें। एक टीले पर बनी कोई पुरानी दरगाह से उठती लोभान की खुशबू वातावरण में श्रद्धा और रहस्य का जाल बुनती थी। वहां जाना और वहां घूमना जैसे एक सुहाने जादुई लोक में पहुंच जाना था।
एक बार आड़ी नदी के किनारे कुछ कहार युवकों को एक कऊ का पेड़ काटते और उसकी लकड़ी को फाड़ कर इकट्ठा करते हुए देखा था। खजूर और नारियल के वृक्षों जैसा यह पेड़ भी लंबा होता है। इसे निमाड़ी में 'कऊ' कहते हैं। इसकी गीली लकड़ी कटने पर भीतर से लाल रंग की निकलती है। इसे काटते समय लाल रंग का रस जैसा भी द्रव टपकता है। जब वह उसकी लकड़ी को फाड़ रहा था तब आड़ी नदी की रेत पर धराशायी उस पेड़ के भीतर से टपकता हुआ लाल रंग का वह रस और उसका फटा हुआ तना देखकर मुझे ऐसा लगा जैसे ''कऊ'' के पेट से खून बह रहा हो। मैंने देखा नदी का जल उसे धोने के लिए व्याकुल सा दौड़ रहा था। हवाएं शांत थी। वातावरण में सन्नाटा। कुल्हाड़ी की आवाज में दब गई पेड़ की चीख के साथ लकड़ी बटोरते युवकों की चमकती हुई आंखों से मैंने एक हत्या को पहली बार किसी उत्सव की तरह मनाते हुए देखा था।
आड़ी नदी हमारी बाकड़ी नदी से कोई चार पांच मील दूर बहती थी। इसलिए वहां कम ही जा पाते थे किन्तु हमारी वनकुंवर तो बहुत पास थी। रोज वहां जाते। उसके प्रवाह में तैरते। अठखेलियां करते। गर्मियों की छुट्टी में तो उसका अंचल ही हमारा सहारा होता था। उसकी रेत ही खेल का मैदान, उसका प्रवाह ही हमारा स्वीमिंग पुल।
वनकुंवर से मुझे अपने ठेठ बचपन में ही प्यार हो गया था। सांझ के समय उसके जल में डूबते हुए सूरज को देखकर सोचा था कि कल सुबह मछेरों के जाल में फंसा हुआ यह सूरज निकलेगा और भागकर फिर अपने पूरबी घोंसले में जाकर बैठ जाएगा। वनकुंवर के जल में कहीं कपड़े धुलते। कहीं पशुओं के स्नान होते। कहीं इसमें तैरते हुए युवकों की ठिठोलियां होतीं। वनकुंवर या बाकड़ी नदी के नाभी क्षेत्र में कई तीर्थ थे। तीर्थ से मेरा तात्पर्य धार्मिक तीर्थ से नहीं है। संस्कृत में तीर्थ शब्द का वास्तविक अर्थ है-नदी का ऐसा स्थान जिसे पैदल पार किया जा सके। धार्मिक अर्थों में भी तीर्थ इसीलिए तीर्थ कहलाते हैं कि उन जगहों से आप भवसागर को पार कर सकते हैं। अंग्रेजी में इसके लिए फोर्ड शब्द है। अमरीका के प्रसिद्ध नगर आक्सफोर्ड का नामकरण भी इसी तर्ज पर हुआ है। पहले वहां बहने वाली नदी को बैलगाड़ी पर बैठे-बैठे पार किया जा सकता था। इसलिए वह स्थान आक्सफोर्ड कहलाया।
बाकड़ी के ये तीर्थ, अर्थात् वह उथली जगहें जहां से उसे पैदल पार किया जाता था, बहुत सुरक्षित थे, परंतु वर्षा ऋतु में ये सारे तीर्थ डूब जाया करते थे। वर्षा काल में बाकड़ी विकराल रूप धर लेती थी और कई बार उसमें बहकर आने वाली लकड़ियां पकड़ने के लिए उसकी धारा में उतरने वाले कई युवक बह चुके थे। इसलिए यह मान्यता हो चली थी कि यह नदी हर साल किसी न किसी की बलि लेती है। इस मान्यता के कारण हमें अक्सर उसके किनारे जाने से रोका टोका जाता था परंतु हमारे मित्रों का दल इकट्ठा हो जाता फिर हम कहां मानने वाले थे? उन्हीं दिनों एक गीत लोकप्रिय हुआ था-''नदी नारे न जाओ श्याम पैया पड़ूं।'' गीत को सुनकर अच्छा भी लगता था। हंसी भी आती थी।
बाकड़ी के किनारे का जो दृश्य मैं कभी भूल नहीं पाता वह है गणगौर पर्व के दिनों में उसके किनारे उमड़ा हुआ पूरा गांव और रणुबाई तथा धणियर राजा के सजीले रथों से सजा मेला। धानी और खोपरे का प्रसाद और गणगौर के झालरियां गीतों से गूंजता हुआ पूरा वातावरण। सुंदर वस्त्रों में सजी स्त्रियां आरती के थाल, नृत्य बच्चों के लिए गुब्बारे वाले और खिलौने वाले भी खूब जमा हो जाते। गणगौर तीज के दिन बाकड़ी के छोटे से बंधान वाले क्षेत्र में तो पैर रखने की जगह नहीं रहती थी। उमंग और उत्साह का ऐसा वातावरण कई दिनों तक जिसका नशा नहीं उतरता था। बरसों से वह वातावरण मन की स्मृति में टंका हुआ है पर अब वह बात कहां-? 'जाने कहां गए वो दिन...कहते थे तेरी राह में नजरों को हम बिछायेंगे' जैसे-जैसे हम बड़े हुए हमारी नदी छोटी होती चली गई। गांव के पढ़े-लिखे लोग बाकड़ी नदी के नाम को सुधार कर बाकुड़ नदी कहने लगे। बाकुड क़े सौन्दर्य ने मेरे बचपन को कविता का हरियालापन दिया था। सौभाग्य से हमारा गांव नर्मदा के अंचल में बसा था। नर्मदा भी गांव से कोई पांच मील दूर बहती थी। एक तरफ नर्मदा की विराटता थी और दूसरी तरफ बाकुड़ का घरेलुपन। हम दोनों के बीच धीरे-धीरे अपने बचपन की केंचुली छोड़कर आगे बढ़ते रहे। नदी पीछे छूटती चली गयी। सिकुड़ता गया उसका विस्तार। एक समय ऐसा भी आया जब पूरी नदी अपनी रेत में गुम हो गयी। एक उजाड़पन एक वीराना रेत पर पसर गया। मैंने बड़ी पीड़ा से एक कविता में उन दिनों लिखा था-
'' एक नदी जो खो गयी रेत में
जो मन को भिगोती थी सेंत मेत में
सोचता हूं उसकी मछलियो का क्या हुआ?''
वो मछलियां हमीं थे। हमारे बचपन के मित्रों की टोल थी वह। सिर्फ बाकुड़ ही रेत में दफन नहीं हुई थी उसके साथ हम भी दफन हुए थे। सिर्फ वही नहीं सूखी थी हम भी सूख गये थे। उसके किनारे ईंटें गढ़ी जाती थीं और वह ईंट लोगों का आश्रय बनती थी।
अब तो बाकुड़ में थोड़ा ही पानी बचा हुआ है, परंतु उसका अधिकांश अंश रेत में खो गया है। सोचता हूं क्या हम लोग उसे गुम होने से बचा नहीं सकते?
-गोविंद कुमार 'गुंजन'
'उत्तरायण' 18, सौमित्र नगर
सुभाष स्कूल के पीछे, खंडवा (मप्र)