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हो गई मैली गंगा
(08:25:12 PM) 07, Feb, 2010, Sunday


 डॉ. महेश परिमल

 कुंभ मेला शुरू हो चुका है। लोग उसमें स्नान कर अपने पापों को धो रहे हैं। पवित्र बन रहे हैं। अब तक लाखों बल्कि अरबों लोगों को ये गंगा नदी निष्पापी बना चुकी है फिर भी इनकी संख्या कम नहीं हुई है। जितना ये लोगों का मैल धोती है, उतनी ही अपवित्र होती जाती है। अब तो ये पतित पावन गंगा इतनी मैली हो चुकी है कि अरबों रुपए खर्च होने के बाद भी इसे साफ नहीं किया जा सका है। हो भी क्यों न आखिर इतने शहरों का मैला भी तो इसी गंगा में जा रहा है। आखिर वह किसे साफ करे, रोज लाखों टन आने वाले कचरे को या फिर उसमें डुबकी लगाने वालों को? गंगा मैली होती जा रही है, हम उसमें डुबकी लगाकर धन्य हो रहे हैं। ऐसा केवल और केवल हमारे ही देश में हो सकता है।

कुंभ मेला शुरू हो चुका है। लोग उसमें स्नान कर अपने पापों को धो रहे हैं। पवित्र बन रहे हैं। अब तक लाखों बल्कि अरबों लोगों को ये गंगा नदी निष्पापी बना चुकी है फिर भी इनकी संख्या कम नहीं हुई है। जितना ये लोगों का मैल धोती हैउतनी ही अपवित्र होती जाती है। अब तो ये पतित पावन गंगा इतनी मैली हो चुकी है कि अरबों रुपए खर्च होने के बाद भी इसे साफ नहीं किया जा सका है। हो भी क्यों न आखिर इतने शहरों का मैला भी तो इसी गंगा में जा रहा है। आखिर वह किसे साफ करेरोज लाखों टन आने वाले कचरे को या फिर उसमें डुबकी लगाने वालों कोगंगा मैली होती जा रही हैहम उसमें डुबकी लगाकर धन्य हो रहे हैं। ऐसा केवल और केवल हमारे ही देश में हो सकता है।

गंगा नदी को प्रदूषणमुक्त बनाने के लिए अब तक कुल 1679 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। इसके बाद भी यही गंगा लगातार प्रदूषित होती जा रही है। गंगा नदी को साफ करने की दिशा में पहला प्रयास राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में हुआ था, तब उन्होंने गंगा एक्शन प्लान शुरू किया था। इस महत्वाकांक्षी योजना को अमल में लाने के लिए सेंट्रल गंगा अथॉरिटी नामक एजेंसी का गठन किया गया। इस योजना का उद्देश्य था कि सन् 1984 से 1990 तक गंगा नदी में आने वाले हर प्रकार के प्रदूषण को रोककर संपूर्ण रूप से शुरू करना था। यह योजना अन्य सरकारी योजनाओं की तरह भ्रष्टाचार का शिकार हो गई। अंतत: इस योजना को सन् 2000 में बंद कर देना पड़ा। लेकिन तब तक इस पर कुल 452 करोड़ रुपए खर्च हो चुके थे। सेंट्रल गंगा अथारिटी ने नदी के किनारे उद्योगों के रसायनयुक्त पानी को गंगा नदी में आने से रोकने के लिए काम करना था, पर उसने अपना सारा ध्यान गटर के पानी को शुरू करने में लगाया। गटर के पानी के शुद्धिकरण के लिए आसपास के कुल 261 को शामिल किया गया। इसके लिए टेंडर जारी किए गए। ठेकेदारों को काम दिया गया, पर यह योजना भी भ्रष्टाचार का शिकार हो गई। ठेकेदारों ने धन ले लिया, पर काम नहीं किया। सरकार को करोड़ों का चूना लग गया।गंगा एक्शन प्लान का पहला चरण अभी चल ही रहा था कि 1993 में केन्द्र सरकार ने इसका दूसरा चरण प्रारंभ करने की घोषणा कर दी। इस दूसरे चरण में गंगा की सहायक नदियां यमुना, गोमती और दामोदर नदियों को शुद्ध करने का अभियान शुरू किया गया। इस अभियान से राय सरकार और ठेकेदारों को लगा कि इस योजना से तो बहुत ही कमाया जा सकता है, अतएव उन्होंने इस योजना का विस्तार करने की योजना बनाई। 1994 में केन्द्र सरकार ने देश की सभी नदियों को प्रदूषण मुक्त करने के लिए नेशनल रिवर कंजर्वेशन अथारिटी की स्थापना की। इसके लिए 4064 करोड़ रुपए की महत्वाकांक्षी योजना तैयार की गई। इस योजना के तहत 18 राज्यों की 31 नदियों और उसे प्रदूषित करने वाले 157 शहरों को लिया गया। इस योजना को शुरू हुए 13 वर्ष हो गए, पर अभी तक इसमें ऐसी कोई खास प्रगति नहीं हुई है। उधर गंगा एक्शन प्लान के दूसरे चरण का काम 1993 मेें शुरू हुआ, जिसका 2001 तक मात्र 4 प्रतिशत काम ही हो पाया। इसके बाद इस योजना को नेशनल रिवर कंजर्वेशन प्रोग्राम के साथ मर्ज कर दिया गया।

इस पूरे प्रकरण पर भारत सरकार के कंट्रोलर एंड ओडियर जनरल (सीएजी) ने 1993-2000 के दौरान हुए भ्रष्टचार पर अपनी बेरूखी प्रकट की थी। यही नहीं उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल द्वारा गंगा एक्शन प्लान में 35.07 करोड़ रुपए का भ्रष्टाचार किया गया। आश्चर्य की बात यह है कि इसमें 72.62 करोड़ रुपए खर्च ही नहीं हो पाए और 6.75 करोड़ रुपए के गलत आंकड़े तैयार किए गए। गंगा एक्शन प्लान के तहत जिन गटरों का शुद्धिकरण किया गया था वे अब फिर उसी हालत में आ गए हैं, क्योंकि किसी की मशीन खराब हो गई है, किसी पम्पिंग स्टेशन से डीजल चोरी हो रही है, कहीं वहां की नगरपालिका के पास उसके संचालन के लिए धन नहीं है। कहीं बिजली नहीं है कहीं मशीनें जंग खा रही हैं, कहीं पाइपों में कचरा जमा हो गया है। सबसे अधिक घपला पश्चिम बंगाल में हुआ इसे देखते हुए अब कई राय भी इस योजना में शामिल होना चाहते हैं।

केन्द्र सरकार द्वारा जो नेशलन कंजर्वेशन प्रोजेक्ट की योजना तैयार की गई है, उसका 70 प्रतिशत खर्च केंद्र सरकार देती है, शेष 30 प्रतिशत राय सरकार को खर्च करना होता है। अभी तक 2460 करोड़ की लागत वाली 763 योजनाएं मंजूर की गई हैं। राय सरकारें इस योजना को अपने राय में शुरू करने के लिए उत्सुक दिखाई देती है। किन्तु जितनी तत्पर वे धन प्राप्त करने में होती है उतनी तत्पर योजना को अमल करने में नहीं होती। जिन 18 रायों को इस योजना के लिए चयन किया गया है, उसमें से बिहार, झारखंड, ओड़िसा, राजस्थान, गोवा और केरल में शुरूआत भी नहीं हो पाई है।

पश्चिम बंगाल में कुल 94 योजनाएं मंजूर की गई हैं। किन्तु अभी तक उसमें से केवल एक योजना पर ही कार्रवाई पूरी हुई है। नेशनल रिवर कंजर्वेशन प्रोग्राम की पूरी कार्यशैली किसी भूलभुलैया से कम नहीं है। कई लोग इसे मजाक में नेशनल गटर ट्रिटमेंट प्रोग्राम के नाम से जानते है, क्योंकि इस योजना में यह मान लिया गया है कि गटर के पानी का यदि शुद्धिकरण कर दिया जाता है तो देश की संपूर्ण नदियां प्रदूषण से मुक्त हो जाएंगी। हकीकत तो यह है कि जिस दिल्ली जैसे राय, जहां इसे पूरी तरह से लागू किया गया है और जहां शत-प्रतिशत काम हुआ है, वहीं की नदियों का पानी सबसे अधिक प्रदूषित हुआ है। नवम्बर 2002 में सेंट्रल पाल्यूशन कंट्रोल बोर्ड यहां की नदियों के पानी का नमूना लिया तो पता चला कि उस पानी में कोलीफार्म बैक्टीरिया की मात्रा 100 मिलीमीटर में से 118 मिलियन जितनी देखने को मिली। ये बैक्टीरिया मानवमल के माध्यम से इस नदियों में पहुंच रहे हैं।

सेंट्रल पोलुशन बोर्ड के अतिरिक्त डायरेक्टर आर.सी. त्रिवेदी स्वीकारते हैं कि दिल्ली शहर में रोज 330 करोड़ लीटर गंदा पानी पैदा होता है इसमें से केवल 150 करोड़ लीटर का ही शुद्धिकरण हो पाता है। क्योंकि म्युनिसिपल कार्पोरेशन के पास इससे अधिक पानी के शुद्धिकरण की व्यवस्था नहीं है। शेष 180 करोड़ लीटर पानी बिना किसी शुद्धिकरण के यमुना नदी में छोड़ दिया जाता है। यही पानी आगे चलकर गंगा नदी में मिल जाता है। दिल्ली में यमुना को साफ रखने के लिए सरकार ने 150 करोड़ रुपए केवल संडास बनाने में ही खर्च किया, ताकि लोग नदी के किनारे दिशा मैदान न करें। पर इस काम में इतना अधिक भ्रष्टाचार हुआ कि आज अधिकांश संडास जर्जर हो गए हैं। इस काम के लिए धन जापान बैंक ऑफ इंटरनेशनल कार्पोरेशन नामक एक संस्था ने दिया था। यमुना एक्शन प्लान के पहले ही चरण में कंपनी ने अगले चरण का धन देने से ही इंकार कर दिया।

चाहे वह यमुना एक्शन प्लान हो या फिर गंगा एक्शन प्लान, इसमें दूरदर्शिता का पूरा-पूरा अभाव है। केवल भ्रष्टाचार ही इसका मुख्य उद्देश्य बन गया है। सरकार की तरफ से दी जाने वाली सहायता को राय सरकारें हड़प लेती है। न नदियां साफ हो रही हैं और न ही गटर की सफाई हो पा रही है। साफ होता है तो केवल धन, बाकी सब भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। ऐसे में कैसे हो पाएगी हमारी गंगा नदी प्रदूषणमुक्त? हमारी योजनाओं में कोई खामी नहीं है, खामी है हमारी कार्यप्रणाली में, हमारी मानसिकता में, हमारी सोच में, जब तक इसे नहीं बदला जाएगा, तब तक कई गंगाएं इसी तरह प्रदूषित होती रहेंगी और इसमें डुबकी लगाकर हम अपने सारे पापों को धोते रहेंगे। ऐसे में आखिर गंगा भी कब तक पवित्र बनी रहेगी?

 
 
 
 
 
 
 
 
 
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