दिनेश पंत
गंगा एक्शन प्लान लागू होने के बाद सीवर फार्म के बाद जो सीवर ट्रीटमेंट प्लांट बने, वह उत्सर्जन भी नदियों में ही फेंका गया। आज से चार वर्ष पूर्व जब जापान की इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी ने गंगा-यमुना को लेकर जो अध्ययन किया। उस अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक गौमुख से गंगा सागर तक गंगा के प्रदूषण का 80 प्रतिशत सीवरेज, 17 प्रतिशत फैक्ट्रियों के उत्सर्जन व 3 प्रतिशत अन्य स्रोतों से हो रहा है। नगर हों या फिर ऋषिकेश, हरिद्वार में गंगा के किनारे बसे सैकड़ों आश्रम इनकी गंदगी में यही समाहित हो रही है।
ऐसा नहीं है कि गंगा को बचाने के मानवीय प्रयास नहीं हुए। गंगा तो मैली होनी अंग्रेजों के समय से ही शुरू हो गई थी। गंगा की दुर्दशा से द्रवित होकर सर्वप्रथम पं. मदन मोहन मालवीय ने गंगा की शुद्धता के लिए आंदोलन चलाया था, लेकिन आजादी के बाद आधुनिक विकास के नाम पर कल-कारखाने खुलने शुरू हुए। कस्बों व नगरों में रहने वालों की संख्या बढ़ी और उसी के अनुपात में कूड़ा-करकट व रासायनिक अपशिष्टों में भी बढ़ोतरी हुई और यह सब गंदगी गंगा में समाहित होती चली गई। उसके बाद गंगा मैली दर मैली होती चली गई, और प्रयास नहीं के बराबर हुए।
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जिन्होंने खुद गंगा की महिमा पर लिखा था, 'हिमालय और गंगा का नाम आते ही आम भारतीय के मन में उसकी पवित्र और मनोहारी छवि उतर आती है।' उन्हीं के प्रधानमंत्रित्व काल में गंगा कम मैली व प्रदूषित नहीं हुई थी, लेकिन गंगा को बचाने के लिए उनके इस प्रशंसक ने शायद ही कोई ठोस कदम उठाया हो, याद नहीं आता। आजाद भारत में सरकारें बदलती रहीं, विकास होता रहा, कल कारखाने खुलते रहे, कस्बों व नगरों का विकास होता रहा। गंगा किनारे लोग बसते रहे। गंगा इनकी हर तरह की आवश्यकताओं की पूर्ति करती रही। पीने के लिए पानी दिया। सिंचाई के लिए पानी दिया। खेतों को उपजाऊ बनाया, खूब धन्य-धान्य उगा और लोग समृद्धि की ओर बढ़ते चले गए लेकिन अपने इस पालनहार गंगा को भूल गए।
अगर गंगा को इस भूलभुलैया से निकालने का प्रयास किसी ने किया तो वह भारतीय था एमसी मेहता। इस मैग्सेसे अवार्ड विजेता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और यहां एक अर्जी दाखिल की। सुप्रीम कोर्ट की इसी लताड़ के चलते सर्वप्रथम आजाद भारत में गंगा एक्शन प्लान बना। लेकिन सरकारी मशीनरी की रफ्तार व इच्छाशक्ति के अभाव में यह एक्शन प्लान सफेद हाथी ही साबित हुआ। 1500 करोड़ रुपए तब से अब तक गंगा को शुद्ध करने के नाम पर खर्च कर दिए गए लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। मैग्सेसे अवार्ड विजेता मेहता के इस कदम का असर यह रहा कि गंगा को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ चली, कई संगठन गंगा को बचाने के लिए आगे आने लगे। इसने भी सरकार पर दवाब बढ़ाने का काम किया।
गंगा को प्रदूषण से बचाने के लिए बाबा रामदेव के नेतृत्व में गंगा रक्षा मंच द्वारा चलाया गया अभियान हो, विश्व बिरादरी द्वारा भारत जागृति मिशन के तहत गंगा रक्षा पंचायतों का आयोजन हो या फिर पर्यावरणविद जेडी अग्रवाल, सुंदरलाल बहुगुणा, चंडीप्रसाद भट्ट या उत्तराखंड के विभिन्न संगठनों द्वारा चलाए जा रहे नदी बचाओ अभियान हों। इनके द्वारा जो प्रयास किए गए उसी का यह नतीजा रहा कि मनमोहन सिंह सरकार को इसे राष्ट्रीय नदी घोषित करना पड़ा। अब गंगा को शीतल बनाने के लिए नए सीवर ट्रीटमेंट प्लांट बनाए जाने की बात हो रही है। भारत सरकार विश्व बैंक व जापान सरकार के सहयोग से 1500 करोड़ की व्यवस्था कर रही है। लेकिन यहां देखना यह होगा कि इसका हाल भी केन्द्रीय गंगा प्राधिकरण की भांति न हो। लेकिन अगर सरकार इच्छा शक्ति रखे तो गंगा की पवित्रता फिर से वापस तो लाई ही जा सकती है। जब लंदन की प्रदूषित टेम्स नदी साफ-सुथरी हो सकती है। वहां की शान बन सकती है तो फिर लोगों के दिलोदिमाग में बस चुकी गंगा क्यों नहीं अपनी पवित्रता को वापस पा सकती है? गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर सक्रियता दिखाने और फिर खामोशी ओढ़ लेने से जिम्मेदारी से तो नहीं बचा जा सकता। अपनी उद्गम स्थल गंगोत्री से जो गंगा दो धाराओं मंदाकिनी व अलकनंदा में बंटती है वहां से यह देवप्रयाग गढ़वाल में भले ही एक होती हो। फिर हिमालय से निकलकर ऋषिकेश में मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती हो फिर यहां से यह दक्षिण पूर्व दिशा में टेढ़ी-मेढ़ी बहती हुई छोटी नदियों को अपने में मिलाती हुई 2225 किमी दूर बंगाल की खाड़ी में गंगा गंगासागर में समुद्र में जा मिलती है। वहां तक हर जगह गंगा प्रदूषित है, इस सच से तो इंकार नहीं किया जा सकता।
पुराणों की कथाओं में जाएं तो कपिल मुनि के शाप से भस्मीभूत राजा सागर के 60 हजार पुत्रों के शीपोद्वार के लिए भगीरथ ने कठोर श्रम किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ तब न जाने इस गंगा में डुबकी लगाकर कितने लोगों ने अपने पाप धोए। डुबकी तो भगीरथ की इस गंगा में आज भी जारी है। गंगा नदी के तट पर स्थित हरिद्वार में हो रहे महाकुंभ में तो हर रोज लाखों लोग डुबकी लगा रहे हैं। लेकिन चिंता की बात यह है कि लोगों की जीवन रेखा रही गंगा की जीवन रेखा तो कम होती जा रही है। भागीरथ ने अपने प्रयासों से गंगा को पृथ्वी पर अवतरित तो कर दिया लेकिन इसकी पवित्रता को बचाने की जिम्मेदारी तो हमारी व हमारी सरकारों की हो जाती है। अगर गंगा का अस्तित्व नहीं रहा तो उनका क्या होगा जो गंगा की बदौलत ही जी रहे हैं। जिनकी सुख-समृद्धि इसी पर टिकी हो। निष्कर्ष तो यही निकलता है कि गंगा के अस्तित्व में ही हमारा अस्तित्व निर्भर है।
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