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सुंदरबन के दर्द की दास्तान
(08:17:11 PM) 05, Feb, 2010, Friday


 सोमा मित्र

सुन्दरबन के डेल्टा में 'ऐला' तूफान की मार जब से पड़ी है, तब से रंगबेलिया गांव की 32 वर्षीय सबिता मण्उल, 28 वर्षीय कंचन सरकार और 33 वर्षीय सरस्वती हलधर बस जलवायु शरणार्थी बनकर रह गई हैं। सविता आज अपने दो बच्चों और अपनी गाय के साथ एक नाव में जिन्दगी गुजार रही है, जबकि कंचन ने अपनी दो बेटियों के साथ पास के शरणार्थी कैम्प में सहारा लिया है।लेकिन सबसे खराब हालत सरस्वती की है। अपने डेढ़ साल के बच्चे को गोद के लिए, डर की मारी यह औरत, कुमारमारी द्वीप पर बाढ़ग्रस्त गांव को छोड़कर जाने को तैयार नहीं है। बचाव कार्यकर्ताओं ने जब उसे ले जाने की कोशिश की तो उसने उनका विरोध किया और कहा कि उसके पति मछली पकड़ने गए हैं और परिवार उनके वापस लौटने का इंतजार कर रहा है। सरस्वती यह मानने को तैयार ही नहीं है कि उसका पति, कमाल, अब कभी वापस नहीं लौटेगा। तूफानी आंधी ने कम से कम 50 नावों को बर्बाद कर दिया और सरस्वती का यह विश्वास कि कभी न कभी उसका पति लौटेगा, बस एक भ्रम ही है। सबिता, कंचन और सरस्वती, सुन्दरबन की उन हजारों औरतों में से हैं, जिनकी सिर्फ झोपड़ियां ही नहीं टूटीं, बल्कि पूरा जीवन ही खत्म हो गया है।

 तूफान का हमला पश्चिम बंगाल के जिलों के दक्षिणी और उत्तरी 24 परगना के उपजाऊ डेल्टा क्षेत्र में करीब दोपहर के 12.30 बजे हुआ और अगले 48 घंटों तक इस क्षेत्र में भारी बारिश का कहर टूटता रहा। गंगा की लगभग सभी सहायक नदियां जैसे कि रेमोंगल, सासा और बांगा, खतरे के निशान से ऊपर बहती रहीं। विशाल-कुछ तो 20 फीट से भी ऊंची लहरों ने करीब 400 किलोमीटर के क्षेत्र में मिट्टी के तटबंधों, सड़कों, पुलों और बिजली के खंभों को तहस-नहस कर दिया। सुंदरबन के 19 ब्लॉकों में से 10 में पानी भर गया। कइयों मेें तो अभी भी जाना मुमकिन नहीं है।

तूफान का हमला पश्चिम बंगाल के जिलों के दक्षिणी और उत्तरी परगना के उपजाऊ डेल्टा क्षेत्र में करीब दोपहर के बजे हुआ और अगले घंटों तक इस क्षेत्र में भारी बारिश का कहर टूटता रहा। गंगा की लगभग सभी सहायक नदियां जैसे कि रेमोंगलसासा और बांगाखतरे के निशान से ऊपर बहती रहीं। विशालकुछ तो फीट से भी ऊंची लहरों ने करीब किलोमीटर के क्षेत्र में मिट्टी के तटबंधोंसड़कोंपुलों और बिजली के खंभों को तहसनहस कर दिया। सुंदरबन के ब्लॉकों में से में पानी भर गया। कइयों मेें तो अभी भी जाना मुमकिन नहीं है।

इस तबाही का प्रभाव तात्कालिक था, क्योंकि लोग भौंचक्के रह गए और असहाय से अकेले पड़ गए। 28 वर्षीय रत्ना नसकर ने शिकायत की, कि सरकारी राहत नावों से सामान सिर्फ उन गांवों में बांटा गया जो नदी के किनारे थे। उसने कहा, 'हमें पहली राहत सामग्री पांच दिनों के बाद मिली। मेरे पास अपनी तीन साल की बेटी और दो साल के बेटे को खिलाने के लिए कुछ भी नहीं था। अब दोनों को रूक-रूक कर दस्त लग रहे थे।' उसने यह भी कहा कि सभी कैम्पों में मरीजों की भरमार है पर उनका इलाज करने वाला कोई डॉक्टर नहीं है।

बसंती और गोसाबा ब्लॉक में दस्त और अन्य बीमारियां स्थानिक हैं- यहां 25 से अधिक मृत्यु बताई गई है। दोनों ब्लॉकों को मिलाकर यहां की जनसंख्या 500,000 है, जिसमें से एक चौथाई अब पानी से पैदा होने वाली बीमारियों की शिकार है।

पीने के पानी की भयंकर कमी है। सरकार और कुछ गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा किए जाने वाले पैकेट के पानी के अलावा, पीने योग्य पानी कहीं नहीं है। सारे गहरे टयूबवेल बाढ क़े पानी से भर गए हैं। इस क्षेत्र में हर जगह बस औरतें दूर-दूर से पानी के मटके ढोती नंजर आती हैं। सबीना बीबी की शिकायत थी कि सबसे नंजदीकी टयूबवेल उनके राहत कैम्प, जहां से अपने परिवार के साथ अभी रहती हैं, से करीब आठ किलोमीटर दूरी पर है।

लेकिन जहां खाने की कमी, खराब आश्रय और अपर्याप्त पीने का पानी- जितना भी बुरा हाल हो, को संबोधित किया जा सकता है, लेकिन सुन्दरबन पर 'ऐला' के दीर्घकालीन प्रभाव इससे कहीं अधिक नुकसानदेह हैं। जाधवपुर विश्वविद्यालय के भूगोलशास्त्री सत्येष चक्रवर्ती की भविष्यवाणी है कि खारे पानी के एकाएक अंदर घुस आने से इस क्षेत्र की खेतीबाड़ी और मछली पकड़ने पर कमजोर बना देने वाला असर होगा। मिट्टी की ऊपरी परत पहले ही बह गई है और मछलियों के तालाब खारे पानी से भर गए हैं।

वे कहते हैं कि 'कम से कम अगले दो सालों तक यहां की मिट्टी से किसी भी तरह की पैदावार की उम्मीद रखना मुश्किल है। यही बात मत्स्यपालन के लिए भी लागू होती है, क्योंकि सारे तालाबों में खारा पानी भर गया है।'

 
 
 
 
 
 
 
 
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