ललित सुरजन
रायपुर से लगभग पौने दो सौ किमी की दूरी पर दुलारपाली नामक गांव हैं। अब यह महासमुंद जिले में हैं और लगभग भुला दिया गया है, लेकिन एक समय ऐसा था जब दुलारपाली लगातार सुर्खियों में रहा करता था। 1970 के दशक में इसे उन्नत कृषि के लिए प्रदेश के आदर्श ग्राम की मान्यता मिली हुई थी। देश भर से कृषि विशेषज्ञ और योजनाकार यहां आया करते थे। उस कालावधि में आर.पी. मिश्र कुछ समय के लिए रायपुर संभागायुक्त के रूप में पदस्थ रहे। श्री मिश्र ने अपने कार्यकाल में रायपुर में कैंसर अस्पताल बनाने में खासी दिलचस्पी ली थी। बाबूजी के साथ उनका अच्छा संपर्क था। मिश्र जी के अनुरोध पर बाबूजी एक बार उनके साथ दुलारपाली की यात्रा पर गए और लौटने के बाद उन्होंने इस आदर्श ग्राम पर उन्होंने विस्तृत फीचर्स लिखा।
इस प्रसंग का जिक्र मैंने इसलिए किया कि बाबूजी को एक पत्रकार के रूप में लिखने के लिए जिस समय और मानसिक अवकाश की आवश्यकता होती है वह उन्हें लंबे समय तक नहीं मिल पाया। लेकिन न तो भाषा पर उनकी पकड़ कभी कम हुई और न कभी विषय की गहराई में जाने से वे चूके। दुलारपाली वाला फीचर उनकी प्रखर पत्रकारिक क्षमता का एक बढ़िया उदाहरण है। ऐसे अवसर वे बीच-बीच में अपने लिए निकालते रहे। एक उदाहरण का जिक्र में खासकर करना चाहूंगा। 1967 में वी.वी. गिरी इंदिरा गांधी के समर्थन से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राष्ट्रपति चुनाव लड़ रहे थे। देश के राजनैतिक इतिहास की यह अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी। इस बीच बाबूजी का बंबई जाना हुआ। बंबई-हावड़ा मेल से शाम को जब वे रायपुर स्टेशन पर उतरे तब तक परिणाम आ चुके थे। वी.वी. गिरी राष्ट्रपति निर्वाचित हो गए थे। चौबीस घंटे की यात्रा करके लौटे बाबूजी ने टे्रन से उतरते साथ मुझसे सबसे पहला सवाल यही किया कि नतीजा क्या रहा। उन दिनों मोबाइल फोन वगैरह तो थे नहीं। मैंने नतीजा बताया तो बाबूजी ने पहले दफ्तर चलने का निर्देश दिया। उन दिनों हमारे यहां कार नहीं थी। रिक्शे से प्रेस आए। बाबूजी अपनी टेबल पर बैठे और विशेष संपादकीय लिखना प्रारंभ कर दिया। तीस चालीस मिनट में उन्होंने अग्रलेख लिखा, फिर संतुष्ट भाव से बोले कि चलो अब घर चलते हैं। उनकी यह सजगता और सक्रियता हम लोगों को भी चकित करने वाली थी।
बाबूजी जब लिखते थे तब दो-चार लोग बैठे भी हाें तो उन्हें उलझन नहीं होती थी। पान की ट्रे सामने वाले की तरफ खिसका कर वे लिखने में मशगूल हो जाते थे। एक और प्रसंग याद आता है। श्रीपैरंबदूर में राजीव गांधी की हत्या हुई। रात को प्रेस से कोई मुझे खबर करने के लिए घर आया। मुझे प्रेस आना ही था लेकिन यह उचित समझा कि बाबूजी को भी इस त्रासद घटना से अवगत करा दिया जाए। मैंने उन्हें धीरे से उठाया और खबर बतलाई। तो वे उठ खड़े हुए और बोले दो मिनट रुको मैं भी साथ चलता हूं। बाबूजी दफ्तर आए। रात भर संपादकीय कक्ष में बैठे रहे। सुबह 9 बजे के लगभग बड़ी मुश्किल से हम उन्हें घर जाने के लिए राजी कर सके।
उनका लिखा एक और विशेष संपादकीय मुझे अब तक याद है ''महाप्राण का महाप्रयाण''। जबलपुर में सेठ गोविंददास का हीरक जयंती या अमृत महोत्सव चल रहा था। मैथिलीशरण गुप्त सहित देश के नामी-गिरामी लेखक वहां उपस्थित थे। उसी बीच खबर मिली कि इलाहाबाद में निराला जी का देहावसान हो गया है। बाबूजी तुरंत दफ्तर आए और निराला जी को श्रध्दांजलि देते हुए प्रथम पृष्ठ के लिए यह संपादकीय लिखा। पाठक अनुमान लगा सकते हैं कि राजनीति, साहित्य, कृषि जैसे विविध विषयों पर साधिकार लिखने वाले इस पत्रकार का ज्ञान भंडार कितना विपुल रहा होगा। एक अन्य उदाहरण और दिया जा सकता है। संभवत: 1966 में पहली बार रुपए का अवमूल्यन हुआ। उस समय रेडियो और टेलीप्रिंटर के अलावा तुरंत खबरें जानने का और कोई उपाय नहीं था। जो सीमित जानकारी मिलती थी उसी के आधार पर तात्कालिक विश्लेषण हो सकता था। बाबूजी ने अर्थशास्त्र में अपनी पैठ का परिचय देते हुए बतलाया कि अवमूल्यन जितने प्रतिशत किया गया है उसका डयोढ़ा प्रभाव रुपए की वास्तविक कीमत पर पड़ेगा और भारतीय अर्थव्यवस्था पर किस तरह प्रतिकूल असर होगा।
बाबूजी का नियमित लेखन 1983 के अंत में प्रारंभ हुआ। हम उनसे प्रथम पृष्ठ पर आधा कॉलम का एक साप्ताहिक टिप्पणी लिखवाना चाहते थे। दो-तीन हफ्ते उन्होंने हमारी इच्छा के अनुसार कॉलम लिखा। लेकिन जल्दी ही उन्होंने उसे एक संपूर्ण कॉलम में परिवर्तित कर दिया। ''दरअसल'' शीर्षक यह कॉलम 1994 में उनके निधन तक लगातार चलता रहा। अपने समय में यह हिन्दी का सर्वाधिक लोकप्रिय कॉलम बन गया था। बाबूजी के जीवनदर्शन का संपूर्ण आकलन इस लेखन से किया जा सकता है। ''दरअसल'' शब्द एक तरह से बाबूजी का तकिया कलाम था। इसी नाते मैंने उन्हें शीर्षक सुझाया जो उन्हें तुरंत पसंद आ गया। इस कॉलम के अंतर्गत उन्होंने दस साल में लगभग पांच सौ लेख लिखे। जिन्हें पुस्तक रूप में प्रकाशित करने का काम चल रहा है।
1986 की जुलाई में बाबूजी को बारह दिन बंबई के डॉ. ए.बी. बावडेकर के अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। रीढ़ की हड्डी में आई मुंदी चोट के कारण उनका ऑपरेशन होना था। बंबई रवाना होने से पहले वे उस हफ्ते का कॉलम लिख गए थे। ऑपरेशन के तीसरे दिन उन्होंने मुझे कागज कलम लेकर बैठने के लिए कहा तथा डिक्टेक्शन देना शुरू कर दिया। कॉलम पूरा हुआ। मैंने पोस्ट ऑफिस जाकर उसे रायपुर भिजवा दिया। ऑपरेशन के लिए बिस्तर पर पडा व्यक्ति कॉलम नहीं लिखता तो स्वाभाविक माना जाता, लेकिन बाबूजी अपने पाठकों के प्रति इस सीमा तक उत्तरदायित्व मानते थे। यह ध्यान देने योग्य है कि वे लिखते समय अपनी स्मरणशक्ति का ही सहारा लेते थे तथा उन्हें कभी नोट्स देखने की जरूरत महसूस नहीं होती थी। उनकी स्मरण शक्ति विलक्षण थी किंतु उनसे तथ्यों की चूक होने के अवसर विरल ही होंगे।
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