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| ''इडियट्स'' को पाठ पढ़ाती 'थ्री इडियट्स' |
| (02:51:46 AM) 04, Feb, 2010, Thursday |
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डॉ. महेश परिमल
बचपन में भारतेंदु हरिशचंद्र का नाटक पढ़ा था ''अंधेर नगरी चौपट राजा''। समाज में व्याप्त अव्यवस्थाओं पर तीखी चोट करने वाला यह नाटक करीब सौ वर्ष पहले लिखा गया था। आज से सौ वर्ष पहले की परिस्थितियां आज भी कायम हैं, क्योंकि अभी-अभी सुनने में आया है कि महाराष्ट्र में पिछले एक सप्ताह में होने वाले आत्महत्याओं और रेगिंग के लिए राज्य सरकार फिल्म 'थ्री इडियट्स' को दोषी मान रही है, इसके लिए उसने इस फिल्म की स्क्रिप्ट मंगवाई है। ताकि यह जाना जा सके कि आखिर इन आत्महत्याओं के पीछे कारण यह फिल्म तो नहीं है?
कमजोर शिक्षा पद्धति और केवल डिग्री देने वाली शिक्षा पर करारा चोट करने वाली फिल्म थ्री इडियट्स में यह बताया गया है कि बच्चों पर कभी अपेक्षाओं का बोझ न लादो। उसे डिग्रीधारी नहीं, बल्कि काबिल बनाओ। बच्चा क्या चाहता है, यह जानने की पूरी कोशिश करो। बच्चा जो चाहता है, यदि वह उसी दिशा में जाएगा, तो वह पूरी शिद्दत के साथ उस काम को करेगा। पालकों की अपेक्षाओं के बोझ से तो वह दब जाएगा। महाराष्ट्र सरकार ने इस बात को नहीं समझा, बल्कि इस फिल्म को दोषी माना। समस्या कहां है, यह जानने की कोशिश नहीं की, महाराष्ट्र सरकार ने। क्या पहले मुंबई में इसके पहले छात्र-छात्राओं ने आत्महत्याएं नहीं की? क्या रेगिंग अभी-अभी शुरू हुई है? यह तो शुरू से ही होता आया है। परीक्षा में कम अंक आने से या फेल हो जाने से विद्यार्थी डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। इस स्थिति में उन्हें आत्महत्या से बेहतर कोई उपाय नहीं सूझता। आखिर फेल हो जाने से या अंक कम आने से ऐसा कौन सा तूफान खड़ा हो गया? पर हमारी शिक्षा पद्धति ही ऐसी है कि फेल होने वाले बच्चों पर कटाक्ष करते हैं। उनसे ठीक से बात नहीं करते, उनका व्यवहार बदल जाता है। यही कारण है कि बच्चे अवसाद से घिर जाते हैं।
वैसे भी जब से फिल्म थ्री इडियट्स रिलीज हुई है, विवादों से घिर गई है। फिल्म की सफलता को देखकर सबसे पहले आए, चेतन भगत। इनका कहना था कि यह फिल्म उनके उपन्यास फाइव पाइंट समवन पर आधारित है। इसलिए सफलता का श्रेय उन्हें भी मिलना चाहिए। इसके बाद फिल्म के डायरेक्टर विधु विनोद चोपड़ा ने पत्रकार से शटअप कह दिया। तो विवाद को बल मिला। वैसे भी यह फिल्म 2009 की सुपरहिट फिल्म रही। इससे सबको लाभ हुआ, पर चेतन भगत के उपन्यास का इसमें समावेश हो जाने से अब उनका हिंदी संस्करण काफी बिक रहा है। खैर, यह तो बात हुई थ्री इडियट्स की। पर मुंबई के दादर में रहने वाले 19 वर्षीय सुशांत यदि आत्महत्या कर लेता है, तो क्या इसके लिए फिल्म थ्री इडियट्स को दोषी माना जाए। वह छमाही परीक्षा में वह 6 विषयों में से 4 में वह फेल हो गया था। आठ दिनों तक अपना परिणाम छिपाने वाले सुशांत ने स्कूल के टायलेट में ही नायलोन की रस्सी से गले में फांसी लगाकर अपनी जान दे दी। फिल्म थ्री इडियट्स में भी इंजीनियरिंग का एक छात्र आत्महत्या कर लेता है। संभव है, उसने यह फिल्म देखी हो। उससे उसके मन में आत्महत्या का विचार आया हो। पर यह तो सोचो कि आखिर परीक्षा में फेल हो जाना ही क्या उसकी प्रतिभा का मापदंड है। उस नन्हीं सी जान के तनाव को महसूस करने की कोशिश करें। यह सोचें कि क्या आज की शिक्षा बच्चे को खुलकर हंसने की अनुमति देती है? क्या फेल होने वाले विद्यार्थी से कोई अच्छे से व्यवहार कर सकता है?
नेरुल की डी.वाय. पटेल कॉलेज की प्रथम वर्ष की छात्रा भजन प्रीतकौर ने कुछ दिनों पहले आत्महत्या कर ली। वह भी 6 से 4 विषयों में अनुत्तीर्ण हो गई थी। आत्महत्या के पूर्व उसने घर की दीवार पर लिखा था कि मुझे 85 प्रतिशत अंक प्राप्त करने ही थे। इस छात्रा की बड़ी बहन और छोटा भाई पढ़ाई में उससे अधिक होशियार थे, इसलिए भजन अक्सर हीनभावना से ग्रस्त रहती। उसे अच्छी तरह से मालूम था कि यदि घर में परीक्षा का परिणाम पता चल गया, तो निश्चित रूप से उसके साथ व्यवहार ठीक नहीं होगा। उसने थ्री इडियट्स देखी थी या नहीं, यह तो पता नहीं, पर वह अधिक से अधिक अंक लाने के तनाव में थी, यह सच है। अपनी पीड़ा उसने दीवार पर लिखकर जता भी दी।
थ्री इडियट्स ने एक तरह से देश के विद्यार्थियों, पालकों, शिक्षण संस्थाओं के संचालकों और शिक्षाविदों को झकझोरने वाली फिल्म है। उनकी अंतरात्मा को जगाने वाली फिल्म है।
अब मुंबई की उस मासूम के दिल की बात कौन समझने जाएगा, जिसने एक रियालिटी शो में भाग लिया था, उसने दिल लगाकर अपना बेहतर प्रदर्शन किया, वह इससे और आगे जाना चाहती थी पर उसके पालकों को यह पसंद नहीं था, उन्होंने मासूम नेहा को आगे बढ़ने ही नहीं दिया। हताशा में आकर उसने आत्महत्या का सहारा लिया। जिस तरह से स्कूल में बच्चों पर अधिक से अधिक अंक लाने का दबाव होता है, उसी तरह रियालिटी शो में भी बच्चों पर अगले राउंड में जाने का भारी दबाव होता है। बच्चे इस दबाव को पचा नहीं पाते, कई बार उन्हें हंसी का पात्र बनना पड़ता है। इस तरह से अनजाने में ही सही रियालिटी शो के संचालक भी बच्चों की आत्महत्या का कारण बन जाते हैं।
कोई व्यक्ति जब अचेतन की स्थिति में रहता है, तब उस पर कितना भी अत्याचार किया जाए, वह प्रतिकार नहीं करता, पर जब वह जाग्रत अवस्था में होता है, तब उसे वे तमाम अत्याचार बुरी तरह से झिंझोड़ देते हैं। आज की शिक्षा पद्धति में लगातार नए प्रयोग किए जा रहे हैं, इससे बच्चे तनावग्रस्त होते हैं। बच्चे केवल होम वर्क से ही नहीं बल्कि विभिन्न तरीकों से प्रताड़ित होते रहे हैं। इसे समझने की जरूरत न तो पालकों को है और न ही शाला संचालकों को। पालक मोटी से मोटी राशि देकर खुश हैं, संचालक उक्त राशि बटोरकर खुश हैं, बच्चे से कोई पूछने नहीं जाता कि वह किस स्थिति में है, वह कैसे खुश रह सकता है? आज के बच्चे जाग्रत अवस्था में अपने पर होने वाले अत्याचार को सहन कर रहे हैं। जो विद्यार्थी इसे सहन नहीं कर पाते, वे आत्महत्या का सहारा लेते हैं। फिल्म में जिस तरह से आज की शिक्षा पद्धति पर चोट की गई है, इससे विद्यार्थियों ने समझा है। संभवत: जिस विद्यार्थी ने इसे समझ लिया हो, उसने आत्महत्या का रास्ता अख्तियार किया हो। पर सच तो यह है कि इस फिल्म ने लोगों की अंतरात्मा को जगाने का काम किया है। आज की शिक्षा पद्धति में उत्तीर्ण-अनुत्तीर्ण, प्रतिशत, विफलता जैसी वति इतनी अधिक बढ़ गई है कि ये विद्यार्थियों को कहीं का नहीं छोड़ती।
अब मुंबई की उस मासूम के दिल की बात कौन समझने जाएगा, जिसने एक रियालिटी शो में भाग लिया था, उसने दिल लगाकर अपना बेहतर प्रदर्शन किया, वह इससे और आगे जाना चाहती थी, पर उसके पालकों को यह पसंद नहीं था, उन्होंने मासूम नेहा को आगे बढ़ने ही नहीं दिया। हताशा में आकर उसने आत्महत्या का सहारा लिया। जिस तरह से स्कूल में बच्चों पर अधिक से अधिक अंक लाने का दबाव होता है, उसी तरह से स्कूल में बच्चों पर अधिक से अधिक अंक लाने का दबाव होता है, उसी तरह रियालिटी शो में भी बच्चों पर अगले राउंड में जाने का भारी दबाव होता है। बच्चे इस दबाव को पचा नहीं पाते, कई बार उन्हें हंसी काा पात्र बनना पड़ता है। इस तरह से अनजाने में ही सही रियालिटी शो के संचालक भी बच्चों की आत्महत्या का कारण बन जाते हैं।
इन सब तथ्यों से अनजान होकर महाराष्ट्र सरकार इस वहम में है कि आज जो कुछ भी हो रहा है, उसके पीछे थ्री इडियट्स ही जिम्मेदार है। इस तरह से वह अपनी गलतियों को छिपाने की कोशिश कर रही है। सरकार यह अच्छी तरह से जानती है कि इस मायानगरी के कई नेताओं के बड़े-बडे क़ॉलेज हैं। यदि कॉलेज में इस तरह की घटनाएं होंगी, तो विद्यार्थियों में एक गलत संदेश जाएगा। इसलिए सरकार थ्री इडियट्स को दोषी मान रही है। यहां सरकार नेताओं के दबाव में आ गई है। वैसे भी आज जिस तरह से प्रावीण्य सूची का प्रचार-प्रसार किया जाता है, उससे मेधावी बच्चों में कई बार हताशा दिखने लगती है। काश एक नंबर और आया होता, तो मैं भी इस सूची में शामिल हो जाता। यह विचार उसे अवसाद के क्षणों में ले जाता है। विद्यार्थी का परिणाम थोड़ा सा भी कमजोर आता है, तो पालक इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश् बना लेते हैं। उन्हें ऐसा लगता है बच्चे का नहीं, उनका रिजल्ट कमजोर आया है। इसके लिए भी आज की शिक्षा को दोषी अवश्य मानेंगे, पर बच्चे को उसी स्कूल में पढ़ाना नहीं छोड़ेंगे। वास्तव में शिक्षा अधिक से अधिक अंक लाने वाली नहीं, बल्कि अधिक से अधिक ज्ञान देने वाली होनी चाहिए। अब यह बात अलग है कि थ्री इडियट्स का संदेश हमारे देश के इडियट्स समझ नहीं पा रहे हों। तो क्या इससे हम यह समझ लें कि इन्हीं थ्री इडियट्स के कारण बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं?
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