भारत के गौरव में यहां की प्राकृतिक छटा में रंग बिखेरती पक्षियों का भी महत्वपूर्ण स्थान है। वेदों, महाकाव्यों और संहिताओं में पक्षियों के वैज्ञानिक अध्ययन का उल्लेख मिलता है और सबसे पहले चरक संहिता में पक्षियों का वैज्ञानिक वर्गीकरण किया गया। ऐसा माना जाता है कि सर्वप्रथम पक्षियों का वैज्ञानिक अध्ययन भारत में आरंभ हुआ। पहले इनके बारे में जानकारी फुटकर तथ्यों और आंकड़ों पर आधारित होती थी। ईसा पूर्व सातवीं सदी से पहले की रचना चरक संहिता में पक्षियों को चार वर्गों में बांटा गया है। चौथी सदी में अरस्तू ने परिंदो को तीन वर्गों में बांटा। ऐसा माना जाता है कि यजुर्वेदकालीन ऋषियों ने शुक और पहाड़ी मैना को बोलना सीखा दिया था। उन्हें यह भी पता था कि कोयल अपने अंडे अपने घोसलें में नहीं देती है। इसमें साठ पक्षियों की चर्चा है। वेदों के अलावा, 3700 ई पू रचित बाल्मिकी रामायण में अनेक पक्षियों का ज्ञानप्रद, रससिक्त और विवेकमय वर्णन है। वहीं, 3000 ई पूर्व रचित महाभारत में भी पक्षियों का वर्णन है। संस्कृत साहित्य के अलावा पाली और प्राकृत साहित्य में पक्षियों का वर्णन मिलता है। मध्यकाल में बाबर, हुमायूं और जहांगीर ने पक्षियों के अध्ययन में रुचि ली। इतिहास बताता है कि आधुनिक भारत में पक्षी अध्ययन की शुरुआत 1713 में एडवर्ड बकली ने की और 1862 में जैर्डन ने बर्ड्स ऑफ इंडिया किताब लिखकर पक्षी विज्ञान की नींव डाली। विज्ञान के अनुसार, पक्षी भी स्तनपायी की तरह समतापी होता है किंतु यह अंडे देता है और उसे शरीर की गर्मी से सेता है। पक्षियों की महत्ता के संदर्भ में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था- ''चिड़ियों को दूर से ही देख लेना और आनंद का अनुभव करना काफी नहीं है। अगर हम उन्हें पहचानें, उनके नाम को जानें और चहचहाते सुनकर पहचान सकें, तो हमारा आनंद और बढ़ जायेगा। अगर हम उनके साथ हिलमिल जाएं तो वह हर जगह हमारे साथी हो जाते हैं।'' इस देश की धरती भी पक्षियों के लिए कुछ खास प्रकार की मेहमाननवाजी करती है तभी तो विदेशों से भी उनकी कितनी प्रजातियां यहां का लुभावना मौसम देख बरबस यहां खिंची चली आती हैं।
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