भारत डोगरा
बेघर लोगों पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने बेघर लोगों को आश्रय व अन्य सुविधाएं उपलब्ध तुरंत करवाने के आदेश 20 जनवरी दिल्ली के संदर्भ में दिए, पर इनका व्यापक राष्ट्रीय स्तर का महत्व है। सुप्रीम कोर्ट ने बेघर लोगों को आश्रय व बुनियादी सुविधाओं के चुनाव पर जो चिंता व्यक्त की है, वह एक राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा है। अनेक मुख्य शहरों के बेघर लोगों की स्थिति दिल्ली में भी कही बदतर है। अत: सुप्रीम कोर्ट के 20 जनवरी के बेघर लोगों संबंधी आदेश की सही भावना तो यही है कि केवल दिल्ली में नहीं, पूरे देश में सभी बेघर लोगों को आश्रय स्थल, बुनियादी सुविधाएं व उचित पोषण उपलब्ध करवाया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जहां तुरंत स्थायी शेल्टर नहीं बन सकते हैं, वहां रात को खाली पड़े सरकारी भवनों को बेघर लोगों के लिए खोला जा सकता है। इस आदेश पर प्रतिक्रिया करते हुए आश्रय अधिकार अभियान की निदेशक परमजीत कौर ने कहा, ''सुप्रीम कोर्ट के बेघरों को आश्रय व बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करवाने के आदेश पूरे देश में बेघर लोगों के लिए जरूरी है।''
दिनभर मेहनत कर जब कोई बहुत थक जाता है, तब उसे यह सोच कर बहुत सांत्वना मिलती है कि अब तो घर पहुंचकर आराम ही करना है। किन्तु कल्पना कीजिए अपने देश के उन लाखों लोगों की जिनका कोई घर ही नहीं है। कंपकंपाती ठंड हो या मूसलाधार वर्षा, छत के नाम पर खुला आसमान है और बिछौने के नाम पर फुटपाथ। किस्मत अच्छी हो तो बस किसी रैन बसेरे में रातभर के लिए शरण मिल जाती है पर अधिकांश बेघर लोगों को तो पटरी पर ही सोना पड़ता है या अपने रिक्शे या ठेले पर। पूरे देश के शहरों में बेघर या आश्रयविहीन लोगों की संख्या 30 लाख के आसपास होने की संभावना है। इसके अतिरिक्त झोपड़ी व स्लम बस्ती में रहने वाले कुछ लोग या तो इतनी तंग जगह में दूसरों के साथ रह रहे हैं या उनकी बस्ती तोड़े जाने का इतना डर है कि उनकी स्थिति बेघर लोगों से बहुत अलग नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर सरकार को आश्रयविहीन लोगों के लिए नियोजन में कम से कम पचास लाख शहरी बेघर लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखना चाहिए।
दिनभर मेहनत कर जब कोई बहुत थक जाता हैतब उसे यह सोच कर बहुत सांत्वना मिलती है कि अब तो घर पहुंचकर आराम ही करना है। किन्तु कल्पना कीजिए अपने देश के उन लाखों लोगों की जिनका कोई घर ही नहीं है। कंपकंपाती ठंड हो या मूसलाधार वर्षाछत के नाम पर खुला आसमान है और बिछौने के नाम पर फुटपाथ। किस्मत अच्छी हो तो बस किसी रैन बसेरे में रातभर के लिए शरण मिल जाती है पर अधिकांश बेघर लोगों को तो पटरी पर ही सोना पड़ता है या अपने रिक्शे या ठेले पर। पूरे देश के शहरों में बेघर या आश्रयविहीन लोगों की संख्या लाख के आसपास होने की संभावना है। इसके अतिरिक्त झोपड़ी व स्लम बस्ती में रहने वाले कुछ लोग या तो इतनी तंग जगह में दूसरों के साथ रह रहे हैं या उनकी बस्ती तोड़े जाने का इतना डर है कि उनकी स्थिति बेघर लोगों से बहुत अलग नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर सरकार को आश्रयविहीन लोगों के लिए नियोजन में कम से कम पचास लाख शहरी बेघर लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखना चाहिए।
शहरी आवासहीन लोगों को एक तो वैसे ही बहुत कष्ट सहने पड़ते हैं, तिस पर कानून व्यवस्था भी उनके प्रति संवेदनविहीन है। आवास के अभाव में फुटपाथ पर पूरी तरह शांतिपूर्ण ढंग से रहने वाले व्यक्ति को भी समय-समय पर पुलिस की मार झेलनी पड़ सकती है। इतना ही नहीं भिखारियों को पकड़ने के अपने लक्ष्य पूरा करने के लिए उन्हें पुलिस पकड़ कर भिक्षु गृह में भी भेज सकती है। भिक्षु गृह में उन्हें कई महीनों तक जेल के कैदी की तरह रहना पड़ सकता है और कई बार तो उन्हें यह भी नहीं बताया जाता है कि इन्हें कितने समय के लिए बंद किया गया है। आवासहीन महिलाओं व बच्चों की स्थिति इस कारण भी बहुत असुरक्षित है कि अपराधी तत्व उन्हें यौन शोषण का शिकार बनाने का प्रयास करते हैं। इस दृष्टि से यह विशेष चिंता का विषय है कि दिल्ली जैसे महानगरों में अभी तक महिलाओं के लिए कोई रैन बसेरा नहीं बनाया गया है।
सौंदर्यीकरण के नाम पर जो अनेक कार्रवाईयां दिल्ली जैसे बड़े शहरों में समय-समय पर की जाती हैं उनसे आवासविहीनों की समस्याएं और बढ़ जाती हैं और खुले आसमान के नीचे भी उन्होंने अपनी जो जगह थोड़ी सी व्यवस्थित कर रखी होती है वहां से उन्हें भाग दौड़ करनी पड़ती है।
सरकार को जितने बेघर लोग हैं उनकी उचित संख्या का अनुमान लगाना चाहिए तथा इसके अनुकूल सुविधाएं उपलब्ध करवानी चाहिए। रैन बसेरों की संख्या बढ़ानी चाहिए तथा उनकी हालत में सुधार होना चाहिए। वहां सोने की जगह, बिस्तरों व शौचालयों की ठीक से सफाई सुनिश्चित होनी चाहिए। महिलाओं के लिए अलग से रैन बसेरे होने चाहिए। पुरुषों व महिलाओं के लिए कुछ रैन बसेरे पास-पास में भी बनने चाहिए जिससे बेघर परिवारों के सदस्यों को एक दूसरे से अलग होकर दूर न जाना पड़े। अपना थोड़ा बहुत, हल्का समान यहां सोने वाले रख सकें इसकी व्यवस्था होनी चाहिए। रैन बसेरों में रहने वाले लोगों की रात सुरक्षित बीत सके, इसकी व्यवस्था होनी चाहिए। रैन बसेरों को चलाने में बेघर लोगों के ही कुछ प्रतिनिधियों का सहयोग प्राप्त करना चाहिए।
कई रिक्शा चालक, पानी की टंकी वाले, ठेले वाले अपने रिक्शा या टंकी को असुरक्षित छोड़कर रैन बसेरों में नहीं आ सकते हैं। यदि संभव हो तो रैन बसेरों के बाहर इन्हें सुरक्षित रखने की व्यवस्था हो। जहां यह संभव नहीं हो, वहां रिक्शा चालकों को अपने वर्तमान विश्राम स्थल पर ही पालीथीन की शीट, बांस, टिन आदि से अस्थाई आवास बनाने की इजाजत दी जाए। इन अस्थाई आवासों की अधिक आवश्यकता बरसात व सर्दियों के दौरान पड़ेगी।
विभिन्न धर्मस्थानों से संपर्क स्थापित कर उन्हें रात को अपने द्वार बेघर लोगों के विश्राम के लिए खोलने को कहा जा सकता है। विभिन्न सरकारी व गैर सरकारी इमारतें जहां कोई बहुमूल्य सामग्री नहीं है, जो रात को खाली रहती हैं व जहां कई लोग सो सकते हैं, बेघर लोगों द्वारा रात को उपयोग की जा सकती हैं व वे सुबह आठ बजे तक इनकी सफाई कर इन्हें खाली कर सकते हैं। इस तरह की इमारतों का यह सार्थक उपयोग संभव बनाने के लिए संवेदनशील सरकारी व गैर सरकारी क्षेत्र के लोगों को आगे आना चाहिए।
यह सब कार्य बेघर लोगों के आपसी संगठन और जिम्मेदारियां संभालने से ही संभव होगा। उनके अपने प्रतिनिधि जिम्मेदारियां संभालेंगे और निभाएंगे। वे पुलिस के साथ सुरक्षा संबंधी मामलों में सहयोग भी करेंगे। उनके सहयोग से पुलिस को अपराधों को नियंत्रण करने में मदद मिलेगी। बेघर लोगों के संगठन व प्रशिक्षण में सामाजिक कार्यकर्ताओं को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। जहां संभव होगा वे बेघर लोगों के सामुदायिक संबंधों को दृढ़ करने का प्रयास करेंगे व उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, नशा दूर करने की सुविधाएं उपलब्ध करवाएंगे। साथ ही जहां विशेष आवश्यकता होगी वहां मानसिक स्वास्थ्य, विकलांगता, कुष्ठरोग आदि से जुड़ी विशिष्ट संस्थाओं से उनका संबंध स्थापित करने का प्रयास करेंगे। सरकारी संसाधनों का उचित उपयोग होगा व इसके साथ स्वैच्छिक संस्थाओं के साधन व बेघर लोगों की मेहनत भी जुड़ेगी तो आश्रयविहीन लोगों की भलाई का कार्य तेजी से आगे बढ़ सकेगा। सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन कर उनके जीवन की नीरसता को दूर किया जा सकता है व उनकी तरह-तरह की रचनात्मकता को आगे बढ़ने का अवसर मिल सकता है। उपेक्षा व गंदगी के अड्डे होने के स्थान पर रैन बसेरों व बेघर लोगों के अन्य आश्रय स्थल को ऐसे केन्द्र के रूप में विकसित किया जा सकता है जहां रात को लगभग 7 से 11 बजे के बीच सेवा भावना से प्रेरित कई लोग बेघर लोगों की भलाई से कई स्तरों पर जुड़ सकते हैं। बेघर लोगों को जबरदस्ती भिक्षु गृह में ले जाने पर रोक लगनी चाहिए व बिना जगह उन्हें जो समय-समय पर पुलिस द्वारा पीटा जाता है, उस पर सख्ती से रोक लगनी चाहिए। बेघर लोगों से अन्याय करने वाले कानूनों को हटाना चाहिए और इसके स्थान पर ऐसे कानून बनाने चाहिए जिससे बेघर लोगों से जुड़े विभिन्न कल्याणकारी कार्य बिना किसी अवरोध के आगे बढ़ सकें।
जिस रैन बसेरे या आश्रय स्थल में बेघर लोग रह रहे हैं, वहीं का पहचान पत्र बनाकर अस्पताल का इलाज, राशन कार्ड आदि सुविधाएं बेघर लोगों को उपलब्ध करवानी चाहिए। प्राय: बेघर व्यक्ति के बारे में सोचा जाता है कि जिसका घर नहीं, मोहल्ला नहीं, पड़ोस नहीं, उसका सामुदायिक जीवन क्या होगा, लेकिन वास्तविक स्थिति ऐसी नहीं है। मनुष्य में सुरक्षा के साथ के साथ आपसी भाईचारे एवं सुख दु:ख में साथ निभाने की भावना सदा मौजूद रहती है। इसी आधार पर फुटपाथों पर भी सामुदायिक जीवन विकसित होता है। प्राय: यह एक ही तरह के रोजी-रोटी वाले लोगों के बीच में विकसित होता है, लेकिन इसका आधार कुछ अन्य भी हो सकता है।
इस सामुदायिक जीवन की पहचान बनाकर इसकी क्षमताओं को समुचित अवसर देने की आवश्यकता है। ऐसी अनुकूल स्थिति मिलने पर आश्रयविहीन अपने आश्रय की व्यवस्था के लिए स्वयं भी बहुत कुछ कर सकते हैं। वे मेहनतकश लोग हैं। मेहनत करने से कभी पीछे नहीं हटते, पर उचित अवसर न मिलने के कारण वे निराश हैं, निष्क्रिय हैं। उन्हें कोई आश्रय मिल सकता है तो वे स्वयं प्रायास करने में पीछे नहीं होंगे।
सर्दी के दिनों में कई दयालु दिलों में यह गहरी इच्छा जागृत होती है कि बेघर लोगों के लिए कंबल व रजाई का दान करें। यह बहुत अच्छी भावना है, पर केवल कुछ कंबल ही किसी फुटपाथ तक पहुंचा देने से महानगर के बेघर लोगों की समस्याएं दूर नहीं हो जातीं। दूसरी ओर यदि आश्रयविहीन लोगों से पूछकर, उनकी अपनी भागीदारी से एक आश्रय अभियान विकसित हो तो उसमें अपना भरपूर योगदान देकर सभी नागरिक अपने सबसे जरूरतमंद भाई-बहनों के प्रति अपनी जिम्मेदारी वास्तव में निभा सकते हैं।