हमारे यहां शंख बजाना एक धार्मिक अनुष्ठान है। मंदिरों में नियमित रूप से और बहुत से घरों में पूजापाठ, धार्मिक अनुष्ठान, व्रत, कथा, जन्मोत्सव आदि अवसरों पर शंख बजाना एक शुभ परम्परा मानी जाती है। कहा जाता है कि शंख बजाने से घर के बाहर की आसुरी शक्तियां घर के भीतर प्रवेश नहीं कर पाती हैं। घर में शंख रखना और उसे बजाना वास्तुदोष को भी समाप्त कर देता है।
यह भी कहा जाता है कि समुद्र मंथन के समय प्राप्त हुए 14 रत्नों में से छठवां रत्न शंख था। अन्य 13 रत्नों की भांति शंख में भी वही अद्भुत गुण मौजूद थे। शंख नाद से निकली ध्वनि में अ, उ, म् अथवा ओम् शब्द उद्धोषित होता है अत: जहां तक ओम् शब्द का नाद पहुंचता है वहां तक की नकारात्मक ऊर्जा नष्ट हो जाती है। इस बात को आज के वैज्ञानिक भी मान रहे हैं कि शंख नाद से वायु मण्डल के अति सूक्ष्म कण नष्ट हो जाते हैं जो मानव जीवन के लिए हितकर नहीं होते। वैदिक मान्यता के अनेसार शंख को विजय घोष का प्रतीक माना जाता है। कार्य के आरम्भ करने के समय शंख बजाना शुभता का प्रतीक माना जाता है। इसके नाद से सुनने वाले को सहज ही ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव हो जाता है और मस्तिष्क के विचारों में भी सकारात्मक बदलाव आ जाता है।
शंख बजाना स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभ का सौदा है। इससे पूरक, कुम्भक और रेचक जैसी प्राणायाम क्रियाएं एक साथ हो जाती हैं। सांस लेने से पूरक, सांस रोकने से कुम्भक और सांस छोड़ने की क्रिया से रेचक सम्पन्न हो जाती हैं। हृदय रोग, रक्तदाब, सांस सम्बन्धी रोग, मन्दाग्नि आदि में मात्र शंख बजाने से पर्याप्त लाभ मिलता है।
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