हमारे शहरों के गरीब लोगों में एक बहुत जरूरतमंद व बेहद ही उपेक्षित तबका है बेघर लोगों का। प्राय: न तो नेता उनसे वोट की उम्मीद रखते हैं न अधिकारी उनकी शिकायत की परवाह करते हैं। पुलिस जब चाहे डंडा चला देती है। इन उपेक्षितों के दु:ख-दर्द को कुछ कम करने का उद्देश्य अपनाकर वर्ष 2000 में दिल्ली में आश्रय अधिकार अभियान का गठन किया गया। इस वर्ष जून में अभियान के लगभग 52765 बेघर लोगों की गिनती की। जिसके आधार पर अनुमान लगाया गया कि कुछ आश्रयविहीन (बेघर) लोगों की संख्या एक लाख से अधिक ही होगी, कम नहीं।
इसके बाद अभियान ने पता लगाया कि सरकारी (दिल्ली नगर निगम) द्वारा बनाए गए इन रैन बसेरों में कितने लोगों की रात बिताने की व्यवस्था है तो पता चला कि मात्र 2601 लोगों के लिए यह व्यवस्था है। दूसरे शब्दों में 100 जरूरतमंद बेघर लोगों में से मात्र 3 लोगों के लिए ही आश्रय की व्यवस्था दिल्ली की सरकार ने की थी। महिलाओं के लिए कोई रैन बसेरा ही उपलब्ध नहीं था।
उपेक्षा की इस स्थिति में सुधार के लिए आश्रय अधिकार अभियान (संक्षेप में अभियान) ने दिल्ली उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) का द्वार खटखटाया। न्यायालय ने आश्रयविहीन लोगों के लिए पर्याप्त आश्रय व्यवस्था करने और रैन बसेरों की सफाई और अन्य स्थितियों संबंधी जरूरी निर्देश दिया। अभियान ने अनुभव किया कि अब उसे सभी रैन बसेरों का वहां रहने वाले लोगों की मदद से एक विस्तृत अध्ययन-सर्वेक्षण करना चाहिए जिससे वहां की ठीक हालत पता चले और किस तरह के सुधार चाहिए इस बारे में सबके विचार भी मालूम हो। दिल्ली नगर निगम द्वारा चलाए जा रहे 13 रैन बसेरों में शरण लेने वाले बेघर लोगों की भागीदारी से किए गए सर्वेक्षण का एक व्यापक महत्व है और देश के अन्य नगरों में चल रहे रैन बसेरों की स्थिति सुधारने में भी इससे मदद मिल सकती है। रैन बसेरों में शरण लेने वाले लोगों और इस विभाग में कुछ कर्मचारियों व अधिकारियों से बातचीत कर यह निष्कर्ष निकला कि सभी रैन बसेरों में निम् सुविधाओं की व्यवस्था करना आवश्यक है। जितने लोगों के रहने के लिए व्यवस्था है उनके लिए पर्याप्त कंबल, फर्श पर बिछाने के लिए पर्याप्त संख्या में दरी, आवास क्षमता के अनुकूल शौचालय की सुविधा, शौचालय व स्नानघर में पानी की व्यवस्था, पीने के पानी की उचित व्यवस्था, पंखे तथा कूलर की उपलब्धि, सामान रखने के लिए लॉकर की सुविधा, एक कमरे के लिए एक टीवी व दीवार घड़ी, प्राथमिक उपचार का किट, खिड़कियों में जाली की व्यवस्था, जहां नए रैन बसेरे बन रहे हैं व पुराने रैन बसेरों में जहां जगह उपलब्ध है वहां सस्ते भोजन के कैंटीन की व्यवस्था व रिक्शा चालक, रेहड़ी वालों के वाहन की पार्किंग की व्यवस्था। नगर-निगम सब तरह की मरम्मत व रख-रखाव मुस्तैदी से करे, शौचालयों व स्नानघरों को ठीक से साफ करवाने की व्यवस्था कराए व कंबलों व उनके कवर को उचित समय पर साफ किया जाए। मच्छरों व चूहों के नियंत्रण की व्यवस्था होनी चाहिए। समय-समय पर रख-रखाव उचित बनाए रखने के लिए निरीक्षण होना चाहिए।
रैन बसेरों के मानवीय प्रबंधन के लिए निगम को निर्देश देने चाहिए कि समय से पहले लोगों को बाहर न धकेला जाए व उन्हें जगाने के लिए लाठी डंडे का उपयोग न किया जाए। बेघर लोगों के लिए मासिक पास भी बनाया जा सकता है। बसेरा 24 घंटे तक खुले रहे तो बेहतर है ताकि रात को मजदूरी करने वाले या बीमार लोग दिन में भी इसका उपयोग कर सकें। रैन बसेरे में रहने वालों को अपनी शिकायत नगर-निगम तक कार्रवाई करनी चाहिए।
रैन बसेरों में नियमित शरण लेने वाले लोगों को साथ लेकर निगम को उनकी व रैन बसेरों के कर्मचारियों की समिति बनानी चाहिए। इन समिति की नियमित बैठकें होनी चाहिए व रैन बसेरों संबंधी निर्णयों में वहां रहने वाले लोगों की भागीदारी होनी चाहिए उन्हें बताया जाना चाहिए कि रैन बसेरों के लिए कितना बजट उपलब्ध है, कैसे खर्च होता है व इसमें सुधार के बारे में उनकी राय प्राप्त करनी चाहिए। रैन बसेरे में रहने वाले लोगों को बसेरों के प्रबंध से भी जोड़ना चाहिए।
नगर निगम की मोबाइल डिस्पैंसरी को रैन बसेरों तक भी नियमित पहुंचना चाहिए। सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर भी यहां सप्ताह में एक दो बार अवश्य आएं। साथ ही यहां स्वास्थ्य, शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण आदि के लिए विभिन्न स्वैच्छिक संस्थाओं व संगठनों से संपर्क किया जाए ताकि यहां के लोगों को आवश्यकताओं के अनुसार ये विभिन्न सुविधाएं देने के लिए आगे आएं।
इस सर्वेक्षण से रैन बसेरों की निम्लिखित मुख्य समस्याएं सामने आईं-
1. 13 में से 12 रैन बसेरों में कंबलों की गंदगी की समस्या भी सामने आई। कुछ बसेरों में कंबल पर्याप्त नहीं थे व सर्दियों में बसेरों में आने के बाद भी बहुत ठंड लगने की समस्या बताई गई।
2. 13 में से 10 बसेरों में पीने के पानी की उचित व्यवस्था नहीं थी व 4 में किसी भी तरह के पानी की व्यवस्था नहीं थी।
3. आधे से अधिक बसेरों में शौचालयों की कमी या गंदगी को एक मुख्य समस्या के रूप में बताया गया। कुछ शौचालयों की बहुत समय से सफाई नहीं हुई थी व कुछ पानी के जमाव के कारण उपयोग में नहीं लाए जा रहे थे।
4. 9 रैन बसेरों में स्वास्थ्य सुविधा का अभाव एक मुख्य समस्या माना गया। बेघर लोगों को सामान्य अस्पतालों में इलाज करवाने में कई कठिनाईयां आती हैं। अत: रैन बसेरों में कुछ स्वास्थ्य सुविधा मिले तो उनके लिए यह बहुत उपयोगी है। दिल्ली नगर निगम के पास 264 चलती फिरती डिस्पेंसरियां हैं पर उनमें से कोई भी रैन बसेरों में नहीं पहुंचती हैं।
5. 13 में से 12 रैन बसेरों में मनोरंजन के किसी भी साधन का अभाव बताया गया। केवल एक बसेरे में टीवी उपलब्ध था। कैंटीन या शिक्षा, प्रशिक्षण की कोई भी सुविधा उपलब्ध नहीं थी।
6. आधे से अधिक रैन बसेरों में कहा गया कि अपना समान रखने की किसी जगह का अभाव एक महत्वपूर्ण समस्या है।
7. आधे से अधिक रैन बसेरों में लोगों ने शिकायत की कि रैन बसेरा खाली करने के लिए निर्धारित सुबह 7 बजे के समय से पहले ही चौकीदार उन्हें बाहर कर देता है। अत: यदि दीवार घड़ी हो तो मदद मिलेगी। जो लोग रात को देर से मजदूरी खत्म कर आते हैं उन्हें कई बार प्रवेश मिलने में कठिनाई होती है।
8. कई रैन-बसेरों का रख-रखाव ठीक नहीं है। पंखें, लाईट, कूलर खराब पड़े हैं। कहीं खिड़की का कांच टूटा है तो कहीं वर्षा का पानी टपकता है।
9. छ: बसेरों में शरण लेने वाले लोगों ने किसी भी पहचान-पत्र के अभाव को ऐसी समस्या बताया जिसके कारण दैनिक जीवन में कई कठिनाईयां आती हैं।
10. कुछ बसेरों पर लोगों ने बताया कि प्रत्येक रात को उन्हें जो छ: रुपए देने पड़ते हैं, वह भुगतान होने पर छुट्टा पैसा वापिस नहीं दिया जाता है व दूसरी ओर किसी के पास 50 पैसे भी कम हों तो उसे भीतर नहीं आने दिया जाता है।
11. कुछ रैन बसेरों में लोगों ने कहा कि वे यहां मच्छरों व चूहों के उत्पात से बहुत परेशान होते हैं।
12. कुछ लोगों ने कहा कि रैन बसेरों में भी कभी-कभी पुलिस परेशान करती है।
13. कुछ रिक्शा चालकों, रेहड़ी वालों ने कहा कि उनके वाहन को पास ही सुरक्षित पार्क करने की व्यवस्था नहीं है।