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उसमें प्राण जगाओ साथी,मैंने प्रस्ताव ठुकरा दिया
(08:06:13 PM) 30, Jan, 2010, Saturday


 ललित सुरजन

 {15}

यह 1980 की बात है। मध्यप्रदेश में राष्ट्रपति शासन समाप्त कर विधानसभा के चुनाव होना थे। मैं अपने दफ्तर में बैठा ही था कि खबर आई- प्रकाशचंद्र सेठी पांच-सात मिनट में पहुंच रहे हैं। वे उस दिन रायपुर आ रहे हैं यह तो पता था, लेकिन प्रेस आ जाएंगे इसका कोई अनुमान नहीं था। मैं उनका स्वागत करने के लिए मुख्य द्वार पर पहुंचा। कुछ ही क्षणों में सेठी जी आए। महापौर स्वरूपचंद जैन उनके साथ थे। सेठी जी ने कहा- प्रेस की बिल्डिंग दिखाओ। उनके आदेश का पालन किया। फिर उन्होंने सवाल दागा- तुम मायाराम जी को चुनाव क्यों नहीं लड़ने देते? प्रश् सुनकर मैं थोड़ा हड़बड़ाया, फिर संभलकर जवाब दिया- मैं रोकने वाला कौन होता हूं, वे नहीं लड़ना चाहते होंगे। सेठी जी ने फिर कहा कि हम उनको पिपरिया (जिला होशंगाबाद) से लड़वाना चाहते हैं। उनसे पूछा तो मालूम पड़ा कि तुम मना कर रहे हो। अब तो प्रेस का भवन भी बन गया है। तुम उन्हें फ्री क्यों नहीं करते। मैंने हाथ जोड़कर कहा कि वे आपके मित्र हैं। दोनों मिलकर जो चाहे फैसला ले लें, लेकिन मैंने उन्हें नहीं रोका है।

वास्तव में बाबूजी की दलगत राजनीति अथवा चुनावी राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं थी। 1964-65 में जब द्वारिका प्रसाद मिश्र उन्हें साथियों (परसाई जी आदि) सहित कांग्रेस में लाना चाहते थे, तब भी बाबूजी ने उन्हें मना कर दिया। उसके बाद 1966 के राज्यसभा चुनाव में मिश्र जी ने बाबूजी को कांग्रेस के समर्थन से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में राज्यसभा में भेजने का प्रस्ताव रखा तो बाबूजी ने मित्रों की सलाह मान ली। बाद में मिश्र जी अपने ही प्रस्ताव पर कायम नहीं रह सके। डॉ. राधाकृष्णन व के. कामराज के दबाव के चलते पत्रकार ए.डी. मणि को दूसरी टर्न के लिए मनोनीत कर दिया गया। बाबूजी मैदान में उतर चुके थे। जानते थे कि हारेंगे, लेकिन इस वादाखिलाफी को उजागर करने के लिए उन्होंने मैदान में बने रहना तय किया। उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी के तीन वोट व कांग्रेस के दो या तीन वोट मिले। संभवत: दमोह के आनंद श्रीवास्तव, (जो नवभारत में उनके सहायक संपादक थे) हटा के जुगलकिशोर बजाज और गाडरवारा के लक्ष्मीनारायण खजांची (जिनसे पारिवारिक संबंध थे) के थे।

इसके बाद भी एकाधिक बार प्रयत्न हुए कि बाबूजी राज्यसभा में जाएं। ऐसी पहल हर बार मित्रों की ओर से ही हुई। मित्रों का मन रखने के लिए बाबूजी अपना बायोडाटा तो भेज देते थे, लेकिन राजनीति में इस तरह आने की कोई गंभीर पहल उन्होंने नहीं की। राज्यसभा में जाने के लिए पत्रमालिक और पत्रकार जिस तरह के समझौते करते हैं और नेताओं की जिस तरह से खुशामद करनी होती है वह बाबूजी के स्वभाव के बिल्कुल विपरीत थी। वे ऐसा कर ही नहीं सकते थे। इसी तरह पुरस्कार एवं अलंकरण आदि की भी उन्होंने कभी चिंता नहीं की और न कोशिश। एक बार वी.सी. शुक्ल ने मुझसे पूछा- ललित! तुम नहीं सोचते कि मायाराम जी को पद्मश्री मिलना चाहिए? मेरा उत्तर था- मेरे सोचने से क्या होता है। सोचना तो आपको चाहिए और अगर आप सोच रहे हों तो बाबूजी पद्मभूषण के योग्य हैं, पद्मश्री तो काका हाथरसी तक को मिल जाती है। जाहिर है कि शुक्ल जी की सदिच्छा मुझसे बात करने तक सीमित थी। उसके आगे कुछ होना-जाना नहीं था।

चुनावी राजनीति का एक प्रसंग 1985 में फिर घटित हुआ। मेरे पास प्रस्ताव आया कि रायपुर ग्रामीण या मंदिर हसौद से कांग्रेस टिकट पर चुनाव लडूं। मैंने संदेशवाहक को स्पष्ट मना कर दिया। इसके पहले बाबूजी से पूछा गया था कि हम ललित को टिकट देना चाहते हैं, आपको कोई आपत्ति तो नहीं। तब बाबूजी ने जवाब दिया था- ललित से सीधे बात कर लेना बेहतर होगा, लेकिन मैं जहां तक समझता हूं वे हां नहीं कहेंगे। बाबूजी ने यह बात मुझे नहीं बताई, लेकिन मैंने वही किया जो उनके मन में संभवत: था। दो-तीन साल बाद वही संदेशवाहक भोपाल-रायपुर विमान यात्रा में मिल गए। मुझसे पूछा शास्त्री जी (प्रोफेसर रणवीरसिंह शास्त्री) कैसा काम कर रहे हैं। मैंने कुछ जवाब दिया होगा। फिर उन्होंने कुछ दु:ख के साथ कहा कि आपका गोल्डन अर्पाच्युनिटी मिली थी, उसे आपने ठुकरा दिया। मैंने इसका उत्तर यह कहकर दिया कि मैं पत्रकार के रूप में इस तरह बेहतर हूं कि मुझ से विधायकों के कामकाज के बारे में राय ली जा रही है। अगर आपका प्रस्ताव स्वीकार कर विधायक बन गया होता तो मेरे बारे में आप किसी और से पूछ रहे होते।

उपरोक्त प्रसंगों से यह तो स्पष्ट होता है कि एक समाचार पत्र के रूप में स्वाभाविक तौर पर बाबूजी की दिलचस्पी राजनीतिक घटनाचक्र पर रही, लेकिन इससे कोई व्यक्तिगत लाभ उठाने का प्रयत्न उन्होंने नहीं किया। जिन राजनेताओं के साथ उनके संबंध परस्पर विश्वास के थे वे बाबूजी से समय-समय पर परामर्श करते थे। ऐसे अनेक प्रसंगों का उल्लेख बाबूजी ने अपनी कलम से किया है। मुझे कुछ घटनाएं स्मरण आ रही हैं। 1962 की गर्मियों में हम लोग नैनीताल में थे। बाबूजी ने एक कागज पर तार का मजनून लिखा कि तार घर जाकर इसे भेज दो। प्रकाशचंद्र सेठी को उस दिन पंडित नेहरू ने पहली बार अपने मंत्रिमण्डल में शामिल किया था और बाबूजी उन्हें बधाई का तार भेज रहे थे। कालांतर में सेठी जी मुख्यमंत्री बनकर मध्यप्रदेश लौटे। 1972 में सेठी जी प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी पचमढ़ी में थे। बाबूजी भी बच्चों को लेकर वहां पहुंचे थे। सेठी जी से उनका मिलने का कार्यक्रम बना। उस दिन बाबूजी वापिस लौट रहे थे। कार में सामान लदा था। वे मुख्यमंत्री निवास पहुंचे। दिल्ली से आए नए स्टाफ ने बाबूजी को ठीक से नहीं पहचाना। कुछ देर रुककर वे गृहनगर पिपरिया आ गए। आधी रात को सेठी जी के सचिव पिपरिया के थानेदार को लेकर बाबूजी को ढूंढते हुए हमारे घर पहुंचे। बहुत माफी मांगी। अपनी नौकरी की दुहाई दी। बाबूजी को अगली सुबह फिर पचमढ़ी जाना पड़ा। वे सेठी जी से मिले और निज सचिव के प्रति उनके क्रोध को शांत किया।

पिछले अध्याय में मैंने ललित श्रीवास्तव का जिक्र कर आया हूं। वे 1973 में जबलपुर नगर निगम के पार्षद बनकर सक्रिय राजनीति में आए। मैं उन दिनों जबलपुर में था। रायपुर से बाबूजी ने ट्रंक काल किया (उस समय एसटीडी सुविधा नहीं होती थी) किशोरीलाल जी शुक्ल निगम चुनाव में पर्यवेक्षक बनकर पहुंच रहे हैं। ललित श्रीवास्तव को उनसे मिलवा दो और मेरी तरफ से कहो कि उन्हें अवसर दिया जाए। मैंने आदेश का पालन किया। चाचाजी (शुक्ल जी का संबोधन) ने यह कहते हुए श्रीवास्तव जी का टिकट पक्का कर दिया कि मायाराम जी के आदेश का पालन तो करना ही पडेग़ा।

 
 
 
 
 
 
 
 
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