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फिलहाल कीमतों में गिरावट मुश्किल
(09:05:30 PM) 09, Feb, 2010, Tuesday
डॉ. हनुमंत यादव

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डॉ. हनुमंत यादव

विगत सप्ताह देश में बढ़ती महंगाई पर केंद्र सरकार द्वारा बुलाए गए सम्मेलन में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने देश में जरूरी उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में बेतहाशा वृध्दि पर चिंता प्रकट करते हुए इस पर काबू पाने के लिए तत्परता से काम करने पर जोर दिया। उन्होंने राज्य सरकारों से खाद्यान्न उत्पादन में वृध्दि एवं सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत करने की सलाह दी। रबी मौसम में अच्छे पैदावार की संभावनाओं को देखते हुए उन्होंने भरोसा जताया कि बुरे दिन बीत चुके हैं। इसी बैठक में प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत करने के लिए 10 मुख्यमंत्रियों की समिति भी बनाने की घोषणा की जिसमें वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी, नागरिक कृषि आपूर्ति मंत्री शरद पवार एवं डॉ. मोंटेकसिंह अहलुवालिया सदस्य होंगे। वैसे तो भारत के आम आदमी के समक्ष समस्याएं ही समस्याएं हैं, किंतु सबसे बड़ी समस्या आसमान को छूने वाली महंगाई है। आम आदमी के लिए विकास दर, विनिवेश दर, भुगतान संतुलन आदि का कोई मतलब नहीं है। उसे तो आश्चर्य होता है कि देश की बागडोर देश के सबसे बड़ी अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहनसिंह के हाथों में होने के बावजूद कैसे बढ़ रही है। पढ़े-लिखे लोगों को भी आश्चर्य होता है कि डॉ. मोंटेकसिंह अहलुवालिया, डॉ. सीआर रंगराजन, डॉ. राजेश तेंदुलकर सरीखे लोगों के होते हुए महंगाई क्यों बेलगाम हो रही है। सही मायनों में देखा जाए तो ये लोग महंगाई पर काबू पा लेते तो मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाने की जरूरत क्यों पड़ती? 10 राज्यों के मुख्यमंत्रियों की समिति बनाने की क्यों आवश्यकता होती यदि वितरण प्रणाली ठीक-ठाक रहती। इस बैठक का उद्देश्य सम्भवत: यह दर्शाना था कि प्रधानमंत्री बढ़ती हुई महंगाई पर काबू पाने के लिए गंभीर है। पिछले वर्ष जब वैश्विक मंदी से पीड़ित उद्योगों के लिए केंद्र सरकार राजकोषीय पैकेज तथा रिजर्व बैंक द्वारा बाजार से साख उपलब्धता बढ़ाने के लिए नरम साख नीति की घोषणा की जा रही थी। उस समय भी आम आदमी के उपयोग में आने वाली उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में औसतन 10 प्रतिशत की वृध्दि हो रही थी, यह एक अलग बात है कि उन दिनों समाचारपत्रों में पढ़ने को मिलता था कि मुद्रास्फीति की दर एक प्रतिशत है या शून्य प्रतिशत है। आम आदमी तो यही समझता है कि मुद्रा स्फीति एवं महंगाई एक ही है। उस समय उसको समझ में नहीं आता था कि मुद्रा स्फीति शून्य होने के बावजूद कीमतें कैसे बढ़ गई है। अब तो भारत सरकार खाद्य पदार्थों की स्फीति दर के आंकड़े अलग से जारी करती है, किंतु ये स्फीति आंकड़े भी थोक कीमतों के सूचकांक पर आधारित होते हैं। खुदरा कीमतों एवं थोक कीमतों में व्यवहार में 10 प्रतिशत से अधिक का अंतर पाया जाता है।

हर एक सरकार कीमतों पर नियंत्रण चाहती है। हमारे देश में आर्थिक नियोजन का एक प्रमुख लक्ष्य कीमतों में स्थिरता बनाए रखना भी है। इसके बावजूद समय-समय पर कीमतों में वृध्दि के जो जोरदार उछाल आते रहे हैं, उन पर नियंत्रण हो जाने के बावजूद दीर्घकाल में कीमतें बढ़ी हुई रहती हैं। वर्तमान कीमत वृध्दि उन सभी कारकों का सम्मिलित योगदान है जो मुद्रा स्फीति के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं। वर्तमान मुद्रास्फीति को लागत प्रेरित तथा मांग प्रेरित स्फीति दोनों ही कहा जा सकता है। जिन वस्तुओं की बाजार में कीमतें बढ़ी हुई हैं, उनकी सभी की प्रत्यक्ष उत्पादन लागत बढ़ चुकी है। इसके अतिरिक्त बाजार में मुद्रापूर्ति बढ़ी है। लोगों के रहन-सहन एवं आमदनी में वृध्दि के कारण वस्तुओं के उत्पादन की तुलना में मांग बढ़ रही है। सितम्बर से दिसम्बर 2009 के चार महीनों में खाद्य पदार्थों की स्फीति दर लगभग 16 प्रतिशत थी। जनवरी के तीसरे सप्ताह में यह 17.40 प्रतिशत थी, जो अंतिम सप्ताह में बढ़कर 17.56 प्रतिशत हो गई। इस समय दाल, सब्जियों एवं चीनी की कीमतें बहुत बढ़ी हुई हैं, आम आदमियों के शब्दों में आसमान को छू रही है। केंद्र सरकार कीमतों में नियंत्रण के हर संभव उपाय कर रही है। उसने पाम ऑयल एवं सोयाबीन ऑयल पर 40 से 50 प्रतिशत तक लगने वाला आयात शुल्क हटा दिया है, रिफाइंड तेल के आयात शुल्क में 7.5 प्रतिशत की कमी कर दी है। इसीलिए तेलों की कीमतों में तो 10 से 15 प्रतिशत तक की कमी आई है। किंतु दाल के भाव बराबर चढ़े हुए हैं। पूरे विश्व के दाल उत्पादक देशों में दलहन का उत्पादन कम हुआ है। तथा स्वयं उन देशों में दाल की कीमतें भारत के समान ही ऊंची है। फिर भी सरकार मलावी, केन्या, तंजानिया से दाल आयात पर विचार कर रही है। 7 दिसम्बर को नई दिल्ली में आयोजित मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों के लिखित भाषण पर नजर डालें तो स्पष्ट नजर आता है कि सभी राज्य कीमतों पर नियंत्रण के लिए सचेष्ट रहे हैं। यही नहीं भाजपा शासित दो राज्यों मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में खाद्य पदार्थों की जमाखोरी एवं मुनाफाखोरी रोकने के लिए वहां के खाद्य एवं आपूर्ति विभाग के अमले द्वारा छापे मारने की कारवाई की पहल की गई तथा कांग्रेस तथा वामपंथी दलों द्वारा शासित राज्यों की तुलना में अधिक छापे मारे गए तथा अनाज जब्त किया गया। अन्य राज्यों ने भी खाद्य पदार्थों की कीमत पर नियंत्रण हेतु कोताही नहीं की। इसलिए केंद्र सरकार के इस आरोप में कोई दम नहीं है कि कीमतों में वृध्दि के लिए राज्य सरकारें जिम्मेदार हैं। देखा जाए तो सारी नीतियां तो केंद्र सरकार बनाती है। मौद्रिक नीतियां भी केंद्र सरकार के दृष्टिकोण के आधार पर केंद्रीय बैंक घोषित करता है। यहां पर छत्तीसगढ़ शासन की सार्वजनिक वितरण प्रणाली की चर्चा करना जरूरी है। छत्तीसगढ़ में अंत्योदय परिवारों को 1 रुपए की दर पर 35 किलो चावल तथा गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले अन्य परिवारों को 2 रुपए की दर पर 35 किलो चावल तथा 2 पैकेट नमक मुफ्त उपलब्ध करवाया जा रहा है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह का दालों को भी रियायती मूल्य पर उपलब्ध कराने का सुझाव भी स्वीकार किया जाना चाहिए। उनका एक अन्य महत्वपूर्ण सुझाव वस्तुओं के वायदा बाजार पर तत्काल रोक लगाने के संबंध में गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। सैध्दांतिक रूप में वस्तुओं के वायदा बाजार कृषि उत्पादकों के हित में है किंतु भारत में व्यवहारिकता में इससे जमाखोरी एवं सट्टे को प्रोत्साहन मिला है, इसने भी कीमतों में वृध्दि में योगदान किया है इसलिए आम उपभोक्ता के हित में वस्तु वायदा बाजार को बंद कर देना अधिक उचित होगा। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हर एक मंच से आवाज उठाते रहे हैं कि पूरे पांच साल तक चलने वाले चुनाव बंद किए जाने चाहिए। संसद और विधानसभा के चुनाव एक साथ पांच साल में एक बार कराए जाने चाहिए। उनका कथन सही है कि हर एक चुनाव महंगाई की एक खुराक लेकर आता है। इस समय भारत सरकार कनाडा से पीली मटर का आयात कर रही है। यह मूंग की दाल की तुलना में 60 प्रतिशत सस्ती है। प्रधानमंत्री का कहना है कि लोगों को इस दाल का उपयोग करना चाहिए। समस्या यह है कि मटर का उपयोग आमतौर पर दाल के रूप में नहीं किया जाता इसलिए बहुत प्रचार प्रसार किए जाने पर इसका उपयोग होना संभव है। खाद्यान्न उत्पादन में वृध्दि तथा आम आदमी की वास्तविक आमदनी में वृध्दि से इस समस्या का निदान हो सकता है, किंतु यह दीर्घकालीन उपाय है। भारत के अधिकांश पिछड़े राज्य नक्सलवाद से पीड़ित हैं। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में न तो विकास कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं, न ही सेवाओं की उपलब्धता संभव हो पाती है। आंतरिक सुरक्षा पर भारी व्यय भी महंगाई का एक कारण है। यह व्यय भी बढ़ना ही है। देखना यह है कि 10 राज्यों के मुख्यमंत्रियों की समिति सार्वजनिक वितरण प्रणाली की मजबूती तथा खाद्य पदार्थों की कीमतों पर काबू करने हेतु क्या सुझाव देती है। फिलहाल निकट भविष्य में कीमतों में गिरावट संभव नहीं दिखता।

 
 
 
 
 
 
 
 
 
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