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भारत की क्षेत्रीय नीति में सुधार की जरूरत
(09:04:24 PM) 09, Feb, 2010, Tuesday
प्रफुल्ल बिदवई


प्रफुल्ल बिदवई

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बारे में, जो ऐसे देश हैं जहां अशांति फैली हुई है और जो भारत की सुरक्षा पर काफी बडा असर डाल सकते हैं। क्या भारत की कोई निश्चित और संगत नीति है? हाल में जो घटनाएं घटी हैं, उन्हें देखते हुए इस सवाल का ईमानदार जवाब होगा-नहीं। अपने पडाेस के इस अहम हिस्से में, क्षेत्र के लोगों के हित में, स्थिरता लाने में मदद करने के लिहाज से भारत एक के बाद एक अवसर खोता चला गया है। अफगानिस्तान को लेकर इस्तांबुल और लंदन में जो सम्मेलन हुए थे, उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत हाशिए पर चला गया है।

अफगानिस्तान के नाटक में शामिल सभी अदाकार अब तालिबान के साथ सौदा करने, अपने नुकसानों में कमी करने और अपना पिंड छुडाने के फिराक में हैं। 'अच्छे तालिबान' और 'बुरे तालिबान' के बीच फर्क करने के खिलाफ भारत की दलील को किसी ने नहीं माना। चुनाव में अपनी विवादास्पद जीत के बाद राष्ट्रपति हमीद करजाई बहुत कमजोर पड ग़ए हैं। राजनीतिक तौर पर वे अलग-थलग पडते जा रहे हैं और विधानमंडल के द्वारा मना किए जाने के कारण उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने वाले उम्मीदवारों को छोड देना पडा। अमरीकियों के उनके खिलाफ हो जाने के कारण वे परेशान हो गए हैं।

इस उम्मीद में कि अमरीकी सरकार की ''आतंक के खिलाफ विश्व स्तर पर लडाई'' बडे चरमपंथी खतरे पर काबू पा पाएगी, उसका पिछलग्गू बनने की बजाए यदि भारत ने 2001 से ही दृढतापूर्वक एक स्वतंत्र रुख अपनाया होता, तो अमरीकी नेतृत्व वाले गठबंधन को कुछ संतुलित हिदायत देकर वह अफगानिस्तान के भविष्य को बेहतर बनाने में कुछ मदद कर सकता था। अमरीकी नेतृत्व वाले गठबंधन ने सैनिक कार्रवाई का छोटा रास्ता अपनाया और वह लोगों के युध्द-विनष्ट जीवन और बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण और विकास को बढावा देने और शासन की संस्थाओं की स्थापना के लिए पर्याप्त राहत और सहायता जुटाने में नाकाम रहा। भारत ने अफगानिस्तान को बेहतरीन असैनिक सहायता पहुंचाकर बहुत अच्छी साख बना ली है। इस सहायता का कार्यक्रम बेहद गरीब और पिछडे देश के हालात को समझते हुए कार्यान्वित किया गया है। इन हालातों में शामिल हैं, खराब सडक़ें- जिसके लिए भारत में निर्मित ट्रक बहुत उपयुक्त हैं और कम से कम बिचौलियों और उपठेकेदारों को रख कर सहायता जुटाना। भारत ने अस्पतालों, स्कूलों और सडक़ों का निर्माण भी किया है। लेकिन भारत ने जो रुख अपनाया है कि ''सभी तालिबान आतंकवादी हैं'' और इस बात पर जोर दिया गया है कि अमरीका अफगानिस्तान में बना रहे और पाकिस्तान पर दबाव डाले कि वह नवंबर 2008 में मुंबई के हमलों के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई करे और जिहादी आतंकवादी बुनियादी ढांचे को नष्ट कर दे, उससे वह अपनी अच्छी साख को प्रभाव में नहीं बदल पाया। ''अच्छे तालिबान और बुरे तालिबान'' के बीच फर्क के खिलाफ भारत का आग्रह, विद्रोही और अलगाववादी समूहों के बारे में उसके अनुभव अपने अनुभव के विपरित है। ये समूह अलग-अलग हद तक चरमपंथी हैं। इसके अलावा कुछ पश्तूनों और तालिबानों की पहचानें भी एक जैसी हैं जो यह महसूस करते हैं कि श्री करजाई के शासन में उनके कबीले को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला। उनकी सहानुभूति तालिबान के साथ है, यद्यपि वे अंधाधुंध हिंसा और संगीत पर प्रतिबंध का समर्थन नहीं करते।

भारत को अफगानिस्तान के प्रति क्षेत्रीय दृष्टिकोण का समर्थन करना चाहिए। इसमें पाकिस्तान की भूमिका अहम है। अफगानिस्तान के स्थायित्व और पश्तूनों के प्रतिनिधित्व और कल्याण में पाकिस्तान का यथार्थ हित है। अफगानिस्तान में चरमपंथ पर लगाम लगाने में भारत का भी हित है क्योंकि उसके साथ हमारे सदियों पुराने संबंध हैं-गांधार सभ्यता से लेकर आधुनिक काल तक और ये संबंध संस्कृति, व्यापार, भाषा, संगीत और खानपान पर आधारित हैं। तार्किक दृष्टि से, न कि अयथार्थवादी दृष्टि से, देखा जाए, तो भारत और पाकिस्तान को यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि उनके अपने-अपने और मिलेजुले हित अफगानिस्तान को मजबूत बनाने और उसके विकास में निहित हैं। इसके लिए सबसे अच्छा तरीका यह होगा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और राष्ट्रपति हमीद करजाई को आमंत्रित करके दिल्ली में एक क्षेत्रीय शिखर सम्मेलन आयोजित करें। लेकिन इतनी अच्छी पहलकदमी के लिए एक पूर्वशर्त है। भारत-पाकिस्तान के बीच वार्तालाप जल्द ही फिर शुरू किया जाना चाहिए। नवंबर 2008 के बाद पाकिस्तान के साथ बातचीत करने से भारत का इनकार लंबी नाराजगी दिखाई देता है, न कि ऐसी परिपक्व कूटनीति, जो पाकिस्तान को, दोषियों को सजा देने और जिहादियों के खिलाफ कडी क़ार्रवाई करने के लिए प्रोत्साहित कर सके। पाकिस्तान के साथ दोनों देशों और उनके लोगों के लिए फौरी तौर पर प्रासंगिक मुद्दों पर चर्चा करने से इनकार करने पर भारत को कोई फायदा नहीं हुआ है।

भारत ने पाकिस्तानियों को जारी किए जाने वाले विजाओं की संख्या में भारी कटौती की है जिससे सीमा पार आने-जाने वाले लोगों की संख्या में 80 प्रतिशत से भी ज्यादा कमी हुई है। इस कार्रवाई का शिकार बने हैं विभाजित परिवारों के साधारण लोग, या फिर सभ्य समाज के वे समूह जो शांति, जिहादी चरमपंथी के खिलाफ कडी क़ार्रवाई और दोनों देशों के बीच बेहतर आपसी मैत्री को बढावा देने के लिए सांस्कृतिक आदान-प्रदान के समर्थक हैं। इंडियन प्रीमियर लीग द्वारा पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाडियों का बायकाट करने के बारे में लिया गया निर्णय खेल और सार्वजनिक शालीनता के प्रति घोर अपमान का सूचक है। इस प्रकार के बयानों से पाकिस्तान में भारत-विरोधी भावनाओं को बल मिल सकता है और शत्रुता और ज्यादा भडक़ सकती है। भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत जितनी कम होगी, भारत सरकार अपने हितों की उतनी कम रक्षा कर पाएगी। दोनों देशों के बीच जितनी दूरी बढती चली जाएगी, एक दूसरे के बीच की दुश्मनी भी उतनी ही बढती जाएगी।

रास्ता सुधारने का समय अब आ गया है। भारत को आगामी सार्क गृहमंत्रियों के सम्मेलन से मिले मौके का फायदा उठाना चाहिए। इतना ही नहीं भारत को विदेश मंत्री स्तर की बातचीत के लिए भी कदम आगे बढाना चाहिए। ऐसा कोई कारण नहीं कि सियाचीन और सरक्रीक के मुद्दों को जल्द ही न सुलझाया जा सके। भारत यदि यह चाहता है कि पाकिस्तानी सरकार आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करे, तो उसके लिए सबसे बेहतर होगा कि वह बातचीत फिर से शुरू करे और पाकिस्तान को आश्वस्त करे कि भारत पाकिस्तान पर हावी नहीं होना चाहता और न ही वह उसे घेरना चाहता है या हाशिये पर धकेलना चाहता है।

 
 
 
 
 
 
 
 
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