Last Updated: 09:19:46 AM 03, Sep, 2010, Friday
साइन इन   संपर्क करें

खबरे लगातार 06:49:50 PM 03, Sep, 2010, Friday समाचार सेवाएँ डेस्कटॉप पर मोबाइल पर घर पर आर एस एस फीड
होम आज का अंक पिछले अंक      ब्लॉग्स
ताजा समाचार
    तेंदुलकर बन गए वायुसेना के मानद ग्रुप-कैप्टन    सागर में छात्रा ने की खुदकुशी    सेंसेक्स में 17 और निफ्टी में 7 अंकों की गिरावट    त्रिपुरा में आईएसआई एजेंट गिरफ्तार    हिमाचल उच्च न्यायालय ने वीरभद्र की याचिका खारिज की    केंद्रीय सचिवालय से कुतुबमीनार तक मेट्रो सेवा शुरू    मुंबई के एसीपी के बेटे-बहू ने खुदकुशी की    बच्चों ने की नक्सलियों से पुलिसकर्मियों को छोड़ने की अपील    मैच फिक्सिंग विवाद : 'बट्ट के पास मिली स्टिंग ऑपरेशन वाली नकदी'    झारखण्ड के गरीब जनजातीय परिवार से थे लुकस    अवैध खनन के पीछे कई केंद्रीय और राज्य के मंत्री : येदियुरप्पा    दिल्ली में डेंगू के बढ़ते मामलों को लेकर बैठक   
 आपका देशबन्धु
अन्य
कार्टून
इंटरव्यू
ई-पेपर
राशिफल
सहयोगी संस्थाएं
जनदर्शन
मायाराम सुरजन फ़ाउन्डेशन
देशबन्धु लाइब्रेरी
हाईवे चैनल
अक्षर पर्व
बाल स्वराज
सेवाएँ
Jobs
Shopping
Matrimony
Web Hosting
लेख
  प्रिंट संस्‍करण     ईमेल करें   प्रतिक्रियाएं पढ़े     सर्वाधिक पढ़ी     सर्वाधिक प्रतिक्रियाएं मिली
शिवसेना, मनसे का क्या करें!
(08:18:49 PM) 08, Feb, 2010, Monday
प्रभाकर चौबे

अन्य लेख
लड़कियां ज्यादा पढ़ क्यों नहीं पातीं?
नेताओं को पता ही नहीं कि होना क्या चाहिए
मध्यान्ह भोजन में बदइंतजामी का आलम
जी.एम. खाद्य : अब जबरन खाइए
बाजार के युग में योजना आयोग की प्रासंगिकता
''पीपली (लाइव)'' का सच
भ्रष्टाचार की लंका के सद्कर्मी 'विभीषण' को सुरक्षा
विनाश को रफ्तार देते एक्सप्रेस मार्ग
पश्चिम में लम्बी होती छायाएं

शिवसेना और मनसे न तो महाराष्ट्र के हितचिंतक हैं, न मराठी से प्रेम है और न उन्हें मुंबई की चिंता है। दोनों ही मराठी के नाम पर उन्माद फैलाकर अपना राजनीतिक हित में वृध्दि करना चाहते हैं। एक जीवंत शहर (मुम्बई) को आग के हवाले कर वे उसे नष्ट करने में तुले हैं और उसकी राख पर शासन करेंगे। अगर मुम्बई की चिंता होती तो किशोर छात्र-छात्राओं की आत्महत्या पर अध्ययन दल बिठाने और उन कारणों को दूर कर किशोरों-युवकों में आत्मविश्वास भरने का काम करते। अगर महाराष्ट्र के हित की सोचते तो किसानों की आत्महत्या पर आंदोलन करते और आत्महत्या के लिए दोषी व्यवस्था को बदलने के प्रयास में जुटते। लेकिन मुम्बई में मराठी और गैरमराठी के बीच घृणा पैदा कर ही शिवसेना ने अपना प्रभाव बढ़ाया है।

शिवसेना के पास एक ही मुद्दा है, घृणा फैलाना। जिस दिन शिवसेना घृणा फैलाना छोड़ देगी उस दिन उसका पराभव हो जाएगा और क्योंकि उसके पास न राजनीतिक, न आर्थिक, न सामाजिक, न सांस्कृतिक सोच है इसलिए शिवसेना इतिहास में कहीं गुम हो जाएगी। रोज-रोज मराठी की बात करना और प्रचार में बने रहकर कुछ सीटें जीत लेना यही शिवसेना की उपलब्धि है। मीडिया भी विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रोज ही दिनभर शिवसेना और मनसे के नेताओं के हिन्दी विरोध, मराठी प्रेम के बयान प्रसारित करते हैं। अगर मीडिया उनके बयानों की उपेक्षा करने लगे तो एक दिन शिवसेना और मनसे टांय-टांय-फिस्स हो जाए। लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी किसानों की आत्महत्या, मजदूरों की बदहाली, युवकों की बेरोजगारी का कहां सरोकार है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को अपनी कमाई की पड़ी है। शिवसेना के मराठी उन्माद पर टीवी चैनल्स दर्जनों बार स्टूडियो में चर्चा करवा चुके और हर बयान के बाद चर्चा कराने लगते हैं।

शिवसेना और मनसे आदेश देते हैं कि मुम्बई में मराठी ही चलेगी। मुम्बई में रहना है तो मराठी बोलना पड़ेगा। ऐसा आदेश नादानी भरा है। जो व्यक्ति जहां रहता है वहां की भाषा बोले बिना उसका काम नहीं चल सकता। घर में भले मातृभाषा बोले, लेकिन बाहर तो उस क्षेत्र की ही भाषा बोलने पर ही काम चलेगा। तमिलनाडु में राजस्थान से गए हजारों लोग व्यापार कर रहे हैं, वे घर में भले अपनी भाषा बोलें, बाजार में तमिल बोलते हैं। मुम्बई हो या और कोई शहर, यही चलता है। और स्थानीय लोग जो बाजार में बैठे हैं, जो टैक्सी, रिक्शा, टांगा चलाते हैं, बसें चलाते हैं वे भी अपने ग्राहक की भाषा समझते हैं। मुम्बई का हर ऑटो, टैक्सी चालक हिन्दी समझ लेता है।

दु:खद यह कि शिवसेना और मनसे के साथ ही महाराष्ट्र सरकार (कांग्रेस और एनसीपी) भी ''मराठी'' को भुनाने कूद पड़ी है। मनसे के मराठी बोलने का आदेश जारी किए जाते ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने टैक्सी चालकों को मराठी ज्ञान होना अनिवार्य करने का आदेश-सा दे दिया। मुख्यमंत्री को क्या पड़ी थी। जब मोटर व्हीकल एक्ट में मूल निवासी होना अनिवार्य है तो टैक्सी चलाने का लाइसेंस लेने जाने वाले के मूल निवास प्रमाणपत्र, जन्म प्रमाणपत्र, वार्षिक आय आदि के प्रमाणपत्र देखने का काम विभाग करता। मुख्यमंत्री का काम प्रमाणपत्र देखना तो है नहीं।

प्रमाणपत्रों में त्रुटियां होतीं या अधूरे प्रमाणपत्र प्रस्तुत किए जाते तो संबंधित विभाग लाइसेंस नहीं देता। लेकिन मुख्यमंत्री को मनसे से ज्यादा मराठीप्रेम दर्शाना था और मुम्बई के मराठी भाषियों का जताना था कि वे मराठी प्रेम तथा मराठीहित देखने में किसी से कम नहीं हैं।

इस तरह शिवसेना, मनसे और कांग्रेस, एन.सी.पी. सब मराठी के लिए एक से बढ़कर एक दिखाने में लग गए हैं। वे मुम्बई को जो क्षति पहुंचा रहे हैं सो तो पहुंचा ही रहे हैं, पूरे देश में भाषायी उन्माद की ज्वाला प्रज्वलित करने में लगे हैं।

भारतीय जनता पार्टी द्विविधा में पड़ी है। बड़ा संकट है। मराठी का राग अलापना छोड़ती है तो शिवसेना का साथ छूटेगा और महाराष्ट्र में सत्ता पाने की आस धरी की धरी रह जाएगी। अगर मराठी के उन्माद का साथ देती है तो बिहार यू.पी. व अन्य हिन्दी प्रदेशों में आज से ज्यादा नुकसान उठाना पड़ेगा- मराठी उन्माद को लेकर भाजपा की ''भई गति सांप छछुंदर की'' हो गई है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भाजपा का संकट दूर करने के प्रयास में शिवसेना और मनसे का मराठी उन्माद का विरोध किया है। इसका कारण यह भी है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का उद्देश्य ''हिन्दुत्व'' है, ''मराठी'' नहीं है और अकेले महाराष्ट्र या मराठा में सिमटकर नहीं रह सकता। इसलिए उसने विरोध किया। लेकिन इस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि आर.एस.एस. प्रमुख मोहन भागवत ने मुम्बई में हिन्दी बोलने वालों की रक्षा में उतरने की बात कही है- मतलब आर.एस.एस. रक्षक है, शिवसेना का सीधे विरोध नहीं है।

मुम्बई सबकी है- कहते रहना इसका पाठ करते रहना प्रवचन से ज्यादा कुछ नहीं है। इस समय मुम्बई में महाराष्ट्र सरकार भी मराठी और क्षेत्रीयता के खेल में टीम के एक खिलाड़ी के रूप में भूमिका अदाकर रही है। मुम्बई दहशत में है, पूरा देश चिंतित है और राजनीतिक दल देश की एकता पर प्रवचन कर रहे हैं। मुंबई सबकी है। हर भारतीय मुम्बई में जाने स्वतंत्र है- ऐसा कहने की क्या जरूरत। देश के किसी भी कोने में आने-जाने के लिए हर भारतीय स्वतंत्र है, -जा रहा है, किसी की अनुमति या वीजा की जरूरत नहीं है। शिवसेना या मनसे ऐसे कैसे कह रहा है कि मुम्बई मराठी की है।

मुम्बई को बनाने में मराठी से कई गुना ज्यादा योगदान पारसियों, गुजरातियों और काफी योगदान हिन्दी प्रदेश के लोगों का है। इस बहस में न पड़ें तो भी मनसे और शिवसेना जो विष वमन कर रहे हैं उस पर रोक लगाना जरूरी है। उन्हें छुट्टा छोड़ दिया गया है और उन्हें उपदेश ही दिया जा रहा है। भाजपा को शिवसेना का साथ छोड़ने कहना क्या मतलब रखता है। भाजपा अगर शिवसेना का छोड़ दे तो क्या शिवसेना का और भाजपा का भी राजनीतिक उद्देश्य बदल जाएगा। शिवसेना का साथ भाजपा छोड़ भी दे तो भी शिवसेना मराठी का अपना मुद्दा नहीं छोड़ेगी और इसी तरह घृणा फैलाती रहेगी। दरअसल, राजनीतिक दलों, सरकार को ऐसा करना चाहिए कि जो भी राजनीतिक दल भाषा, धर्म, क्षेत्र, जाति के नाम पर विद्वेष फैलाएं उन्हें देश की राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाए- ऐसे नियम बनें। और शिवसेना को भी राजनीति से बाहर किया जाना चाहिए। उसकी राजनीतिक शक्ति छिन जाने पर वह प्रभावहीन होगी और जनता के द्वारा नकार दी जाएगी तब विवेक शायद उसमें जागे।

 
 
 
 
 
 
 
 
 
Home Online Hindi News About us latest news from chhattisgarh
Sitemap chhattisgarh news Contact
Privacy Policy Terms & Conditions Disclaimer
Online Hindi news | Latest news from Chhattisgarh | Chhattisgarh Newspaper | Newspaper in Hindi | Hindi News Blogs | Chhattisgarh hindi news | IPL Cricket News | Business News in Hindi | National News in Hindi | Sport News in Hindi | Hindi Entertainment News | Political News Headlines | Latest news from India
  Powered By: S W T G R O U P