राजेंद्र जोशी
यह युवा क्रांति का दौर है और हर क्षेत्र में युवाओं की सक्रिय भागीदारी बढ़ती जा रही है। राजनीति का क्षेत्र हो या उद्योग व्यवसाय का, कला-साहित्य-सांस्कृतिक का क्षेत्र हो या फिर सेवा का, हर तरफ युवा नेतृत्व परवान चढ़ रहा है। राजनैतिक पार्टियों ने अपनी बुजुर्ग पीढ़ी के संरक्षण में अपनी भावी रणनीतियों के तहत युवाओं के नेतृत्व के महत्व को समझा और अपने-अपने दलों के युवाओं को आगे लाकर अपनी विचारधाराओं को पुष्ट करने का अभियान चला रखा है।
देशभर के युवाओं में समाज, राष्ट्र और स्वयं के हित में कुछ कर गुजरने का हौसला बुलंद हो, इस उद्देश्य से युवा नेता राहुल गांधी ने अपने मैदानी अभियान का शंखनाद कर दिया है। युवाओं को अपनी विचारधारा से जोड़ने और उन्हें सही दिशा में अपने कदम बढ़ाने के लिए राहुल आगे-आगे चल रहे हैं और उनके विचारों से प्रभावित होकर उनके पीछे-पीछे कदमताल करते हुए अधिकांश युवा उनकी यात्रा में शामिल होते जा रहे हैं। युवाओं को देश के समक्ष उपस्थित अनेक चुनौतियों के मुकाबले के लिए उनमें निष्ठा, साहस और उत्साह की भावना जगाने के राहुल गांधी के अभियान की केवल यह मानकर अनदेखी नहीं की जानी चाहिए, कि वे किसी पार्टी विशेष के पदाधिकारी हैं। बल्कि राहुल के बज रहे युवा-बिगुल के स्वर की मूल भावना को महत्व दिया जाना चाहिए। जगह-जगह अपनी यात्राओं में राहुल गांधी राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका बढ़ाने जैसे मुद्दों पर जोर दे रहे हैं। युवाओं में जोश पैदा कर उन्हें अपने अस्तित्व की पहचान करा रहे हैं। राहुल जिन उद्देश्यों को लेकर मैदानी प्रभाव कायम करते जा रहे हैं, वह प्रजातांत्रिक व्यवस्था वाले इस देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सकारात्मकता का प्रतीक है।
विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के लोग राहुल गांधी के तेवरों का प्रेस विज्ञप्तियों के माध्यम से भले ही विरोध प्रकट कर रहे हों और उनके प्रभाव को रीफ्यूज करने का प्रयास कर रहे हों किंतु राहुल गांधी की आंधी से वे भीतर ही भीतर विचलित होते भी दिखाई दे रहे हैं। राहुल का युवाओं को दिया जा रहा संदेश का असर तो दिखने लगा है किंतु उनके विरोधी उनसे इस प्रभाव को केवल राजनैतिक हथकंडा करार करते जा रहे हैं। यह सही है कि देश में युवा भागीदारी के प्रतिशत के आंकडे में वृध्दि हुई है और स्वाभाविक है कि इन बढ़ते आंकड़ों का राजनैतिक लाभ उस पार्टी खाते में जुड़ रहा है जिससे राहुल गांधी जुड़े हैं।
राहुल गांधी के विचारों और उनके द्वारा उठाए जा रहे कदमों से यह बात भी खुलकर सामने आ रही है कि वे अपनी कांग्रेस पार्टी में आए विकारों के खिलाफ भी पब्लिक मंच पर बोलने में नहीं चूक रहे हैं। वे चाहते हैं कि राजनीति में ऐसे युवाओं को भी प्रवेश के अवसर मिल सके जिनका कोई धनी-धूरी नहीं है। वे साफ तौर पर इस बात को कहने में संकोच नहीं कर रहे हैं कि राजनीति में केवल उन्हीं लोगों को प्रवेश मिल पाता है जो राजनैतिक खानदान के हों, जिनकी पहुंच राजनेताओं तक हो, जो धन बल और बाहुबल का प्रभाव रखते हाें। राजनीति में आए कतिपय विकारों का जिक्र करते हुए वे अपनी कांग्रेस पार्टी के माइनस बिन्दुओं पर प्रहार करने में पीछे नहीं रहते हैं। राजनीति के क्षेत्र में राहुल गांधी जैसे बिरले ही लोग कहीं होंगे जो छाती ठोंककर सरेआम घोषणा करते हैं कि राजनीति में प्रवेश के लिए पारिवारिक पृष्ठभूमि भी महत्व रखती है और वे स्वयं इसके एक उदाहरण हैं। अपने पारिवारिक, राजनैतिक, पारंपरिक बुलंदियों में पल बढ़कर युवा नेतृत्व संभालने वाले राहुल गांधी राजनैतिक पार्टियों के भटकते कदमों पर चिंता जाहिर की है और स्वयं अपनी कांग्रेस पार्टी की खामियों को दूर करने का उन्होंने बीड़ा उठा लिया है। अपनी पार्टी के कतिपय नेताओं से अपनी वैचारिक भिन्नता दर्शाते हुए वे पीढ़ियों के बीच की वैचारिक खाई पाटने के लिए मजबूत पुल की आवश्यकता से भलीभांति भिन्न। इस दृष्टि से उनके कदमों की आहट से अग्रज पीढ़ी भी आशान्वित नजर आने लगी है। हालांकि बीच-बीच में कभी-कभी ऐसे मौके भी उपस्थित हो जाया करते हैं जब लगने लगता है कि क्या राहुल पीढ़ियों के वैचारिक अंतर को भरने के लिए पुल की मजबूती को बनाए रखने में सक्षम हैं? देखा जाय तो यह प्रश्न इसलिए भी गौण हो जाता है क्योंकि राहुल कांग्रेस की उस मजबूत पारिवारिक पृष्ठभूमि से जुड़े हैं जिसने राष्ट्रहित में अपने जीवन का सर्वस्व न्यौछावर कर दिया है। पंडित नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के त्याग और बलिदान तथा पार्टी के साथ ही देशसेवा और समाजसेवा के प्रति अपनी प्रतिबध्दता का इतिहास रच डाला है।
राहुल गांधी उस इतिहास के पृष्ठों को आगे बढ़ाने का एक सफल और सार्थक प्रयास करते हुए दिखाई दे रहे हैं। राहुल की पार्टी में भी युवाओं की बढ़ती दिलचस्पी और उत्साह के कारण अग्रज पीढ़ी के कतिपय नेताओं को अपने राजनैतिक भविष्य पर प्रश्नचिन्ह सा लगता दिखाई देने लगा है। ऐसे में राहुल के इस युवा जागृति अभियान में पूर्व पीढ़ी के नेताओं का सहयोग मार्गदर्शन और अनुभवों का उपभोग कर उनके सम्मान को चोट पहुंचाए बगैर, उन्हें भी मुख्यधारा से जोड़ने वाले पुल के रूप में अपनी भूमिका का चुनौतीपूर्ण निर्वहन में रहना होगा।
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