-मेधा पाटकर
छत्तीसगढ़ के राज्यपाल और मुख्यमंत्री द्वारा प्रधानमंत्री से विरोध प्रकट करने के कारण केंद्रीय गृहमंत्री चिदंबरम द्वारा स्वीकृति के बावजूद 7 जनवरी 10 को दंतेवाड़ा में हो रही जनसुनवाई में न पहुंचना वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण है। सवाल उठता है कि क्या गुजरात दंगों या कश्मीर में हिंसा को लेकर भी 'राज्य की मंजूरी' को अनिवार्य माना गया था? बस्तर व दंतेवाड़ा के सुदूर, सघन आदिवासी अंचल में फैली हिंसा और आतंक आज की राजनीति के चरित्र को स्पष्ट तौर पर रेखांकित करता है।
चिदंबरम द्वारा 72 घंटों में नक्सली हिंसा समाप्त करने का आत्मविश्वास और 'ऑपरेशन ग्रीन हंट' को विवादास्पद घोषित करने के बाद स्थानीय निवासियों की अपेक्षा थी कि वे जनसुनवाई में आकर आदिवासियों की बात सुनें और अपने निष्कर्ष पर पहुंचे।
वनवासी चेतना आश्रम के हिमांशु कुमार ने दंतेवाड़ा में प्रेक्षक के रूप में सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी आमंत्रित किया था जिससे कि वे क्षेत्र की पूरी स्थिति को समझें और हिंसा की समाप्ति और विकास के संबंध में अपनी राय दे सकें। साथ ही सलवाजुडुम के कार्यकर्ताओं को विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) बनाने के बाद उनके द्वारा किए गए अत्याचारों और गोलाबारी का मूल्यांकन भी कर सकें। परंतु बजाय सहयोग के सरकार ने पहले आश्रम तोड़ा तथा बाद में पहुंचे सामाजिक कार्यकर्ताओं को पदयात्रा व सत्याग्रह तक से बलात् रोका। आदिवासियों की पहली टोली द्वारा गोमपाट में दी जा रही गिरफ्तारी को रिपोर्ट करने गए पत्रकारों से भी पुलिस ने तीखी बहस की। जब हमें गिरफ्तार नहीं किया गया तो हमने पुलिस अधीक्षक व कलेक्टर से मिलने हेतु समय मांगा। अधीक्षक ने समीप के सुखमा ग्राम में नक्सली हमले में घायल पुलिसकर्मी की बात करते हुए शाम 4 बजे का और कलेक्टर ने 6 बजे का मिलने का समय दिया। हम पैदल उनसे मिलने चले। पुलिस के 20-25 लोग गाड़ियों में हमारी सुरक्षा के लिए भी थे। एसपी कार्यालय से कुछ दूरी पर एक क्रोधित जमावड़ा हमें रोकने को खड़ा था। पुलिस ने हमें इसकी जानकारी नहीं दी थी।
आमने-सामने होने पर एक व्यक्ति ने संदीप पांडे पर मोटर साइकिल गिरा कर झूमाझटकी आरंभ कर दी। इस भीड़ में भाजपा से मिले हुए कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा के बेटे सोयम कर्मा भी थे। हमारे साथ वे आदिवासी थे जिन्हें सलवाजुडुम ने आंध्रप्रदेश भागने पर मजबूर कर दिया गया था। इसी बीच हम सब पर अंडे फेंकना, पत्थर मारना व कीचड़ फेंकना प्रारंभ हो गया। कुछ पुलिस अधिकारी जिसमें एसपी शामिल थे, ने दिखावटी रोकथाम की कोशिश भी की। उनका कहना था कि हमारी कार्रवाईयों से नक्सलवादियों को हिंसा में मदद ही मिलेगी। इसी बीच कलेक्टर महोदया से भी संपर्क हुआ तो उन्होंने कहा कि हिमांशु कुमार तो उनसे कभी मिले ही नहीं जबकि वास्तविकता यह है कि वे उनसे कई बार मिल चुके थे। एक महिला होने के बावजूद बलात्कार के मामलों में उनका ठंडा रवैया चौंकाने वाला था। हिंसा पर उनसे कोई बातचीत नहीं हुई क्योंकि उनके कार्यालय में ही लिखा हुआ था, 'अहिंसा की परीक्षा हिंसा का सामना अहिंसा से करने से होती है।' इसके बाद क्या कहा जा सकता था? फिर भी हम आश्वासन लेकर निकले।
इस सबके बावजूद कुवेर गांव तक पहुंचने के कोई आसार नहीं थे। बंदूकों से लैस पुलिस व एसपीओ डरावना वातावरण निर्मित कर रहे थे। गांव के भूतपूर्व सरपंच लच्छू भाई के सामने गांव के एक बच्चे ने कहा कि उसकी आंखों के सामने रात को 3 बजे सीआरपीएफ वाले उसके पिता को उठाकर ले गए।
अनेक लोग बिना किसी अपराध के जेलों में बंद हैं। शिकायत तक दर्ज नहीं की जा रही है। जब हम पुलिस अधीक्षक के पास शिकायत दर्ज करवाने पहुंचे तो उनका कहना था, 'ये सब तो अब जेल में हैं तो अब क्यों शिकायत कर रहे हैं।
आप जिनकी सहायता करना चाहती हो वे झूठे हैं। ये गांव वाले कसाई हैं। ये गोमवाड़ा धमाके में शामिल हैं।' इसके अलावा भी उन्होंने काफी कठोर शब्दों का प्रयोग किया। तब मैंने उनसे कहा कि एसपी को ऐसी भाषा शोभा नहीं देती। इस पर उन्होंने अपना रवैया थोड़ा बदला। मेरा तो यही कहना था, कि यदि आपने गिरफ्तारी की है तो चौबीस घंटे के अंदर आपको गिरफ्तार व्यक्ति के माता-पिता या संबंधी को सूचित करना चाहिए। इसका उनके पास कोई जवाब नहीं था। परंतु उन्होंने बताया कि इस इलाके करीब 600 गांव पूरी तरह से खाली हो गए हैं। इनमें से अधिकांश आंध्रप्रदेश में जाकर बस गए हैं। कई स्थान से उन्हें जबरदस्ती भगाया जा रहा है। रोजगार के नाम पर नौजवानों को 'एसपीओ' बना दिया गया है। अनौपचारिक चर्चा में गांव वालों का कहना था, कि हम तो नक्सली व पुलिस आतंक के मारे गांव छोड़ने को मजबूर हो गए हैं। हमें नहीं मालूम कि हम अपने गांव वापस जा भी पाएंगे या नहीं?
उनका कहना था कि हमें शांति चाहिए। हमें अपने गांवों में दोबारा बसना हैं। दंतेवाड़ा के पुलिस अधीक्षक ने भी माना कि 50,000 लोग उजड़े हैं। उनके अनुसार आंध्रप्रदेश में कम लोग गए हैं। परंतु छत्तीसगढ़ के शिविरों में करीब 45-50 हजार ग्रामीण रह रहे हैं। दंतेवाड़ा में ही 3000 सलवाजुडुम कार्यकर्ताओं को पहले एसपीओ के रूप में एवं बाद में विशेष पुलिस बल में शामिल कर लिया गया। वे यहां की घटनाओं को मानवाधिकारों से नहीं जोड़ते क्योंकि उनका मानना है कि नक्सलवादियों ने भी बात न मानने पर आदिवासियों की हत्याएं की हैं। उनके अनुसार अब इन्हें 'युध्द' द्वारा ही रास्ते से हटाया जा सकता है।
हमें यह भी समझना होगा कि मात्र सशस्त्र संघर्ष रुकने से ही शांति स्थापित नहीं होगी। आवश्यकता है विकास के नजरिए, संसाधनों के उपयोग-दुरुपयोग, आदिवासियों, दलितों, श्रमिकों को कुचलने वाली एवं किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाली नीतियों और कंपनियों और बिल्डरों को लाभ पहुंचाने वाले नीतियों पर पुनर्विचार हो। जीविका के कम होते साधनों पर भी विचार करना आवश्यक है। अहिंसक आंदोलनों को भी अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा। अन्यथा हम अपने संविधान में निहित समता, न्याय, बंधुत्व, समाजवाद और लोकतंत्र की ठीक से रक्षा नहीं कर पाएंगे।