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महिलाएं निखारेंगी भविष्य के भारत की तस्वीर
(08:46:11 PM) 05, Feb, 2010, Friday
इंदिरा मिश्र

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इंदिरा मिश्र

अभी तक भारत में महिलाएं द्वितीय दर्जे के नागरिक का जीवन जीती आई थीं। उस जीवन में उनका अपनी मर्जी से कोई काम करना, पढ़ना-लिखना, विवाह करना, किसी यात्रा पर जाना, मित्र-बंधुओं से मेल-जोल, खान-पान आदि करना, कुछ भी नहीं आता था। हर बात के लिए उन्हें अपने परिवार के मुखिया अर्थात् पिता, अथवा विवाह के बाद पति अथवा पुत्र से अनुमति लेनी पड़ती थी।

उनकी स्वतंत्रता में विशेष बाधा उस समय से आई थी, जब पश्चिम से भारत पर आक्रमण होने लगे। इन आक्रमणों से न केवल हिन्दी भाषी समस्त प्रदेश, बल्कि महाराष्ट्र, उड़ीसा तथा आंध्रप्रदेश तक में पर्दा प्रथा फैली, और सार रूप में यह प्रथा यह कहती थी, कि अकेले कहीं बाहर न जाओ, अजनबियों से बात न करो, घर की चहारदीवारी में असूर्यंपश्या बन कर रहना तुम्हारी सर्वोच्च उपलब्धि है। ऐसे में घर के बड़े पुरुषों से जैसे, सास-ससुर, जेठ आदि से किसी बात पर असहमति या तकरार का तो प्रश्न ही नहीं उठता था।

अक्सर लड़कियों का विवाह बचपन में ही हो जाता था और वे ससुराल चली जाती थीं। किसी विवाहित बालिका का स्कूल में विद्या अर्जित करने जाना एक विरली घटना होती थी। सावित्री बाई फुले और उनके पति ज्योतिबा फुले ने स्त्री शिक्षा के लिए जो भागीरथ प्रयास किया है, वैसा कीर्तिमान अन्य किसी ने शायद ही बनाया हो।

बालिका के ससुराल में सास-ससुर का उसी परिपाटी पर शासन चलता था। बालिका वधु कब बालिका से मां बन जाती थी, उसे भी पता न चलता था। होने वाली संतानों की सेवा सुश्रूवा ही महिलाओं की दिनचर्या थी। कालक्रम में वे भी सास बनती और इसी तरह यह चक्र चलता रहता था।

उस दौर के अपने फायदे भी हुए इन मायनों में कि हमारी जनसंख्या में खूब वृद्धि हुई। कृषि तथा उसके अनुषांगिक अनेक व्यवसाय चलते रहे। स्त्रियों पर तो ''पूतो फलो'' का आशीर्वाद खूब हावी रहा। उधर माल्थस का कृषि उत्पादकता का सिद्धांत बता रहा था कि चाहे कितनी भी मेहनत की जाए, कृषि के उत्पाद दुगुने से तिगुने या चौगुने अर्थात् गणितीय अनुपात में बढ़ते हैं, जबकि जनसंख्या एक से दूसरी पीढ़ी में दुगुनी से चौगुनी और फिर सोलह गुनीं। इस तरह बढ़ जाती है।

लेकिन यह घटना क्रम अनन्त काल तक नहीं चल सकता था। बढ़ती जनसंख्या का बोझ कृषि पूरी तरह नहीं उठा पा रही थी। आज उस विसंगति का नतीजा यह है कि 54 प्रतिशत, जनसंख्या कृषि से जुड़ी है, जबकि देश के सकल उत्पाद में कृषि का योगदान 20 प्रतिशत है। कृषि मजदूर वर्ग को पर्याप्त आय नहीं हो रही है। गरीबी की मार उनके स्वास्थ्य और आत्मविश्वास को ग्रस रही है। उनको कृषि से निकाल कर अन्य कामों में लगाना बहुत जरूरी है। इसमें लंबी तैयारी लगेगी। वर्तमान शिक्षा पद्धति इसके लिए अपर्याप्त है कि ग्रामीण युवा अन्य रोजगार आसानी से पा सकें। उन सभी की सामान्य प्रवृत्ति होती है कि शिक्षक की, अथवा कहीं टेबल कुर्सी पर सफेदपोश बनकर बैठने की नौकरी मिल जाए। विशेषत: महिलाओं के लिए अन्य विकल्प बहुत कम होते हैं। हर जगह नियम कानून, परिपाटी, उनके सामने दीवार बन कर खड़े हो जाते हैं। कहीं किसी प्रशिक्षण के लिए उनके पास आधारभूत परीक्षा पास करने का प्रमाण पत्र नहीं है, तो कहीं उनके घर से दूर जाकर न पढ़ पाने की मजबूरी है, जिसमें आर्थिक कारण भी प्रमुखता से शामिल है। देश के विकास की गति इसलिए भी बहुत तेज नहीं हो पाई है चूंकि महिलाएं बहुतायत से उसमें योगदान देने के लिए सामने नहीं आईं। नरेगा जैसी योजनाएं स्थायी रोजगार देने के लिए अपर्याप्त है। यों कृषि संबंधी कार्यों में महिलाओं का योगदान कम नहीं होता। धान उत्पादन करने वाले क्षेत्रों में विशेषत: निंदाई, गुड़ाई धान की रोपाई, खरपतवार की सफाई, फसल कटाई, मिंजाई, कूटकर दाने को अलग कर के उनका भंडारण बीज के लिए अनाज को रखना, फसल को नष्ट होने से बचाना, विक्रय के लिए वर्गीकृत करना और अन्तत: अनाज को भोजन में बदलना, अधिकांश ये महिलाओं के काम हैं। उत्तर प्रदेश में कृषि मजदूरों के लिए दिन का भोजन बनाकर भेजना- यह घर की महिलाओं का काम है। कृषि से सीधे जुड़े या परोक्ष रूप से जुड़े अनेक कार्य कठोर परिश्रम मांगते हैं। उदाहरण के लिए- मक्का के दाने निकालना, मूंगफली छीलना, मसाला कूटना, पीसना आदि। घर के कामों में भी पानी भरकर लाना, लकड़ी की आग जलाना, जानवरों के लिए चारा लाना, उनकी सफाई, सेवा आदि। यदि इन कामों को करने के लिए घरों में बिजली की, गैस की सप्लाई व गैस, प्रेशर कुकर, मिक्सी जैसी कुछ मशीनों की उपलब्धता हो जाए तो सभी आयु वर्ग की महिलाएं बचे हुए समय का सदुपयोग करके पढ़ाई -लिखाई कर सकती है। कुछ अन्य रोजगारमूलक काम सीख कर अपने परिवार की आय बढ़ा सकती हैं। वे स्वास्थ्य संबंधी शिक्षा प्राप्त करके अपने और अपने परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य में सुधार ला सकती हैं। स्वास्थ्य शिक्षा का पहला पाठ है, कि स्वच्छ जल का उपयोग करके 90 प्रतिशत बीमारियों को टाला जा सकता है। मच्छरों को दूर करके मलेरिया से बचा जा सकता है। अनाज को अंकुरित करके खाने से या दो अनाजों को मिलाकर पकाने से पोषक तत्व अधिक प्राप्त किया जा सकता है। अपने शरीर की संरचना और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी प्राप्त कर महिला अवांछित संतानोत्पादन से बच सकती है तथा वर्तमान परिवार पर अधिक ध्यान दे सकती हैं, इससे हमारी जनसंख्या वृद्धि पर भी प्रभावी रोक लगेगी। अगली सहस्राब्दी (मिलेनियम) के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने जो लक्ष्य अंगीकृत किए हैं- जैसे कि 100 प्रतिशत साक्षरता, शिशु मृत्यु दर तथा मातृमृत्यु दर को घटाना। महिलाओं के प्रभावी योगदान से इन सभी की ओर हम तीव्र गति से बढ सकते हैं। जरूरत है कुछ मदद देने वाले ठोस कार्यक्रमों की। तब प्रगति सूचक मापदंडों पर हम कहीं आगे बढ़ जाएंगे।

सदियों से विदेशी आक्रमणों को तथा अपनी ही कमजोरियों के बोझ को झेलते कुछ समय पहले तक हम एक गरीब, अनपढ़ देश समझे जाते रहे हैं। यद्यपि आध्यात्मिक, कलात्मक, सांस्कृतिक वैभव और वैविध्य की दृष्टि से हम बेहद सम्पन्न हैं। 62 वर्ष की आजादी और योजनाबद्ध विकास ने हमें फलने-फूलने का मौका दिया, तो हमने भी दुनिया को अपनी मेधा, लगन और परिश्रम से दिखला दिया, कि हम किसी से कम नहीं हैं। इक्कीसवीं सदी हमारी है। क्या सूचना प्रौद्योगिकी, क्या विज्ञान, क्या चिकित्सा शास्त्र, क्या गणित व अभियांत्रिकी, क्या शिल्प, चित्रकला, नृत्य और संगीत तथा साहित्य, सभी के लिए हममें नैसर्गिक प्रतिभा है। आध्यात्म के क्षेत्र में तो दुनिया हमारी कायल है ही। इस क्षेत्र में भारत दुनिया का गुरू है यह हमारे ऋषि, मुनियों की दिव्य दृष्टि ने कब से पहचान लिया है।

आगे बढ़ने की महत्वाकांक्षा के साथ-साथ मितव्ययिता हमारा अनुवांशिक परिचय है। हमारे अभावों ने हमें सिखाया है कि अपने साधनों का इस्तेमाल संभल कर करें। साहस करके हम देश-विदेश घूमें, खूब नाम कमाएं, सम्पत्ति अर्जित करें, किन्तु फिर भी अपनी संस्कृति को न छोड़ें। अपनी मर्यादा और नैतिक मूल्यों को लेकर जीएं। दुनिया ठोकरें खाकर इन मूल्यों की ओर घूम रही है, लेकिन हमें तो ये मूल्य जन्म के समय छुट्टी की तरह मिली हैं। अब इसके आगे सिवाय इसके हम क्या कह सकते हैं, कि जननी तेरी जय हो!

 
 
 
 
 
 
 
 
 
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