फिरोज अशरफ
अमन की राह में रोड़ा अटकाने के लिए पाकिस्तान को कोई न कोई बहाना चाहिए। यह वहां की परम्परा है। दो कदम आगे जाकर चार कदम पीछे हटना। वर्षा से यह सच्चाई साफ है कि पाकिस्तानी नौकरशाही के साथ-साथ फौज, सियासत और सिविल सोसायटी में भी कुछ ऐसे लोग हैं जो दोनों देश के बीच शांति और अमन नहीं, बल्कि कुछ न कुछ तनाव बनाए रखना चाहते हैं। उसी तनाव भरे माहौल में वे अपना हित साधते हैं और अपनी दुकानदारी चलाते हैं। इस बात का पक्का सबूत है आईपीएल में पाकिस्तानी क्रिकेटरों का अंजाम। आईपीएल में खिलाड़ियों पर बोली लगाने वालों का अपना हित है। लाखों, करोड़ों रुपयों का मामला है। वह दुनिया जानती है। वहां नफा नुकसान की बात है। पैसा लगाने वाले, बोली बोलने वाले खरीदार स्वयं अपना फैसला लेने के लिए आजाद हैं। उन पर किसी का दबाव नहीं। उनके फैसले, उनके अपने फैसले होते हैं। सरकारी मशीनरी, और सियासी जमातों और हुकुमती संस्थानों का उनसे कुछ भी लेना देना नहीं। हमारा देश एक डेमोक्रेटिक देश है। खेलकूद और कई तरह की सांस्कृतिक गतिविधियां स्वतंत्र रूप से की जाती हैं। यह सब कुछ लिखने या बोलने की जरूरत नहीं है। क्रिकेट की संस्थाएं भी सौ फीसदी आजाद हैं। उनसे जुड़े लोग भी अपने फैसले आप करते हैं। यहां तक कि खिलाड़ियों पर भी किसी तरह का दबाव नहीं है। इतना सब कुछ होते हुए भी अगर बोली लगाने वालों ने पाकिस्तानी क्रिकेटर्स पर बोली नहीं लगाई, तो उससे हमारी सरकार और जनता को क्या लेना देना। इस सिलसिले में बोली लगाने वालों की भी अपनी शिकस्त याने हार को अलग-अलग ऐनक से देखता है। पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने भी इस मौके पर अपनी खेल भावना को किनारे रखकर परंपरागत भारत दुश्मनी के बल्ले फेंकने शुरू कर दिए। उनके साथ जुड़ी हुकुमत। फिर क्या था सारा मामला सियासी हो गया।
पाकिस्तानी हुकुमत पिछले कई दिनों से जिस संकट से गुजर रही है, उसके लिए जरूरी था कि कोई प्रेशर कुकर का स्टीम वाल्व खुले। आईपीएल के वाकिये ने वह सुनहरा मौका उन्हें दिया। उसके बाद खिलाड़ी उनके देश के एंबेसेडर (राजदूत) बन गए। गृहमंत्री रहमान मलिक के अनुसार आईपीएल का मामला गंभीर है और अगर हिन्दुस्तानी हुकूमत पाकिस्तान के साथ खुश्गवार ताल्लुक (मधुर संबंध) रखना चाहती है, तो उसे आईपीएल में हमारे खिलाड़ियों को शामिल करना चाहिए। हिंदुस्तान को हमारे खिलाडियों के साथ इात (सम्मान) से पेश आना चाहिए, क्योंकि हमारे क्रिकेटर और हॉकी खिलाड़ी हमारे मुल्क के सफीर (राजदूत) हैं। उनकी हितक (अपमान) हमें मंजूर नहीं, 'वैसे भी हॉकी वर्ल्ड कप में' पाकिस्तानी हॉकी टीम नहीं आ रही है। इस मुद्दे पर हमारे विदेश मंत्री ने बिलकुल सही कहा कि आईपीएल का भारत सरकार से कोई संबंध नहीं है। पाकिस्तान को समझना चाहिए कि भारत सरकार इस मामले में कुछ नहीं कर सकती है। यह आईपीएल और खिलाड़ियों का अपना मामला है। विदेश मंत्री, एस.एम. कृष्णा ने स्पष्ट किया कि भारत सरकार का आईपीएल से कोई संबंध नहीं है।
वैसे क्रिकेट दोनों देशों के बीच हमेशा तनाव का कारण बना है। इसे एक खेल भावना से खेला ही नहीं गया है। पिछले कुछ वर्षों से इस सोच में थोड़ा फर्क आया है। उससे पहले क्रिकेट मैच नहीं हुआ, मैदान जंग हुआ। खेल भावना, राष्ट्र भावना थी। इसे महंज खेल के रूप में नहीं लिया गया। अंफसोस! आज भी पाकिस्तान अपने खिलाड़ियों को एम्बेसडर समझता है। हमारी दिक्कत यह है कि अगर किसी पाकिस्तानी शायर ने हमारे मुशायरे में घटिया कलाम पढ़ा, तो भी हमें वाह-वाह करना ही पड़ेगा।
कुछ भी हो! सच्चाई यह भी है कि एक साथ कई समस्याओं को लेकर पाकिस्तानी हुकूमत घोर संकट में है। सबसे बड़ा संकट, तालिबान या धमाके नहीं। सुप्रीम कोर्ट के 17 जजों की बेंच का वह फैसला, जिसके अंतर्गत राष्ट्रपति आसिफ जरदारी से लेकर नवाज शरीफ की गर्दन फंसी हुई है। उनके साथ लगभग 800 अन्य उच्च राजनीतिक और प्रशासनिक हिम्मत भी हैं। उन सबों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे, जिसे विशेष अध्यादेश के द्वारा जनरल मुशर्रफ ने हटा लिया था उसके बाद ही बेनजीर, आसिफ जरदारी इत्यादि 2009 के चुनाव में भाग ले सके। कोर्ट के फैसले पर अमल हुआ तो शायद जरदारी को भी हटना पड़े। फैसले को लेकर पक्ष-विपक्ष सभी परेशान हैं। ऐसे में क्रिकेट संकट यकीनन उन्हें राहत पहुंचाएगा। लोगों का ध्यान बंटेगा मगर क्या वाकई में लोगों को बेवकूफ बनाया जा सकेगा?
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