हम परवरिश-ए- लौह-ओ- क़लम करते रहेंगे/ जो दिल पे गुजऱती है, रक़म करते रहेंगे

आखिर क्यों हमारे शैक्षणिक संस्थान ऐसे तंग नजरिए की राजनीति का अड्डा बनते जा रहे हैं ? छात्र राजनीति का इस्तेमाल क्या राजनीतिक दल अपने संकीर्ण स्वार्थ साधने के लिए कर रहे हैं?...

हम परवरिश-ए- लौह-ओ- क़लम करते रहेंगे/ जो दिल पे गुजऱती है, रक़म करते रहेंगे

राजीव रंजन श्रीवास्तव

हम परवरिश-ए- लौह-ओ- क़लम करते रहेंगे

जो दिल पे गुजऱती है, रक़म करते रहेंगे

आज से 50 साल पहले 1967 में जब अमेरिका ने वियतनाम युद्ध छेड़ा था और तबाही की नई दास्तां लिख रहा था, तब महान मुक्केबाज मोहम्मद अली ने अमेरिका के इस युद्ध की मुखालफत करने की न केवल हिम्मत दिखाई थी, बल्कि युद्ध में शामिल होने से साफ-साफ इंकार कर दिया था।

तमाम आलोचनाओं और खतरों के बावजूद अली ने कहा था, मेरा जमीर मुझे अपने भाइयों या किसी अश्वेत व्यक्ति या किसी गरीब भूखे पर एक ताकतवर अमेरिका के लिए गोली चलाने की इजाजत नहीं देता।

वियतनाम युद्ध के खिलाफ खुलकर अपनी राय जाहिर करने पर मोहम्मद अली के जेल जाने की नौबत तक आ गई थी। लेकिन अन्याय और हिंसा के विरूद्ध अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करने से वे डरे नहीं, पीछे नहीं हटे।

आज आधी सदी गुजर गई, वक्त बदल गया, सरकारें बदल गईं और देश भी बदल गया है। तब मोहम्मद अली को जिस तरह का विरोध झेलना पड़ा, उसकी तीव्रता तो महसूस नहीं की जा सकती, लेकिन रामजस प्रकरण, उस पर गुरमेहर कौर की प्रतिक्रिया और देशप्रेम बनाम देशद्रोह का जिन्न जिस तरह से बाहर आया है, उससे समझा जा सकता है कि युद्ध और फसाद की बातें करना कितना आसान है और अमन के साथ, अमन के लिए खड़ा होना कितना चुनौतीपूर्ण है।

तो, एक साल पहले जेएनयू में देशद्रोह और देशप्रेम का जो अनावश्यक विवाद खड़ा हुआ था, वह एक साल बाद डीयू में दोहराया जा रहा है।


आखिर क्यों हमारे शैक्षणिक संस्थान ऐसे तंग नजरिए की राजनीति का अड्डा बनते जा रहे हैं ? छात्र राजनीति का इस्तेमाल क्या राजनीतिक दल अपने संकीर्ण स्वार्थ साधने के लिए कर रहे हैं?

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान क्यों नहीं हो रहा और सबसे बड़ा सवाल कि क्या विरोध का जवाब तर्कों से देने की संस्कृति खत्म हो रही है?

दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कालेज में “विरोध की संस्कृति” विषय पर आयोजित सेमिनार में जेएनयू के छात्र उमर खालिद और शेहला राशिद को आमंत्रित किया गया था। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद इसका विरोध कर रही थी, क्योंकि उसके मुताबिक ये देशद्रोही हैं।

विरोध इस कदर बढ़ा कि एबीवीपी व आईसा के समर्थकों के बीच काफी हिंसा हो गई, जबकि मौके पर मौजूद दिल्ली पुलिस स्थिति को संभाल नहीं पाई।

दोनों ही छात्र संगठन एक-दूसरे पर हिंसा और अभद्र व्यवहार करने का आरोप लगा रहे हैं। अपने-अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए सोमवार को एबीवीपी ने मोर्चा निकाला और मंगलवार को आइसा, एसएफआई समेत कई अन्य छात्र संगठनों की अगुवाई में मोर्चा निकला।

इन सब पर चर्चा के लिए हमारे साथ मौजूद हैं देशबंधु के रोविंग एडिटर भारत शर्मा। आइये देखते हैं ये रिपोर्ट-

 

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