मैं लेखक, कवि, चिन्तक, शोधार्थी और समाजिक कार्यकर्ता के रूप में जाना जाता हँू। मुझे तनावमुक्त जीवन विषय पर व्याख्याता के रूप में व्याख्यान देने हेतु बुलाया जाता रहा है। सैकडों दम्पत्तियों को निजी विवादों से बाहर निकालकर सुकूनभरी जिन्दगी जीने में सहयोग करने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ है। निराश्रितों, छोटे बच्चों, जरूरतमन्द स्त्रियों, बीमारों, निःशक्तजनों और बुजुर्गों के लिये काम करना मुझे सुकून देता है। मेरा मानना है कि धन दौलत से बहुत सारी भौतिक समस्याओं का समाधान तो हो सकता है, लेकिन जिस व्यक्ति के जीवन में प्यार, सम्मान एवं शान्ति नहीं है, उसका जीवन निरर्थक है। मेरा बास के प्रिय साथियों से केवल इतना ही कहना है कि मैंने इस दुनियाँ में नाइंसाफी से लडने और आगे बढते रहने के लिये जो सीखा है, वह निम्न पंक्तियों में बयाँ कर रहा हँू :-
1. एक साथ आना शुरुआत है, एक साथ रहना प्रगति है और एक साथ काम करना सफलता है।
2. अपने आपको बदलो। दुनिया बदल जायेगी। हम जो कुछ कहते हैं, उसे अपने आचरण से प्रमाणित करें।
3. बोलोगे नहीं तो कोई सुनेगा कैसे? दिखोगे नहीं तो कोई देखेगा कैसे?
4. यदि आप थोडा सा भी दबे, तो लोग आपको और दबायेंगे। यदि आप मुकाबला करोगे, तो वे दुम दबाकर भाग जायेंगे।
होम्योपैथ चिकित्सक, मानव व्यवहारशास्त्री, दाम्पत्य विवादों के सलाहकार, विविध विषयों के लेखक, कवि, शायर, चिन्तक तथा समाज में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव और गैर-बराबरी के विरुद्ध देश के १७ राज्यों में सेवारत राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) का राष्ट्रीय अध्यक्ष।
पंजाब और कश्मीर को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता। हाँ आतंक से निपटने के मामले में हमें स्पष्ट नीति बनानी चाहिये और देश के किसी भी कौने में सिर उठाने वाले आतंक के विरुद्ध कठोरतम निर्णय लेने से .....
मुद्दा ये है कि इस प्रकार के (राष्ट्रमण्डल खलों के) आयोजनों के समय को छोड कर सामान्य आम दिनों में भारत में सेक्स वर्कर्स का धन्धा क्या बन्द रहता है? .....
आरक्षित वर्ग के वर्गद्रोही अफसर बर्खास्त किये जायें! आरक्षित वर्ग के मुश्किल से पाँच प्रतिशत अफसरों को अपने वर्ग के नीचे के स्तर के कर्मचारियों तथा अपने वर्ग के आम लोगों के प्रति सहानुभूति .....
सूचना अधिकार के प्रति दिल्ली हाई कोर्ट जैसी सच्ची श्रृद्धा प्रदर्शित करने वाले न्यायिक निर्णय सूचना आयोग को ठीक कर सकते हैं। कुछ न कुछ तो कदम उठाने ही होंगे। अन्यथा आजादी के बाद पहली बार .....
उत्तरप्रदेश हाईकोर्ट ऐसा पहला हाई कोर्ट हो गया है, जिसमें अब किसी गरीब और आम व्यक्ति या किसी भी संस्था की ओर से आसानी से जनहित याचिका दायर नहीं की जा .....
आदिवासी गाँवों में पंचों द्वारा संयुक्त रूप से बैठकर जिस स्थान पर पंचायत कर स्थानीय मामलों में निर्णय लेकर न्याय किया जाता है, उस स्थान को स्थानीय बोली में अथाईं कहा जाता है और गाँव में .....
दुर्भाग्य है, इस देश का और इस देश की स्त्रियों का कि आज 21वीं सदी में भी कानून उसी प्रकार से काम कर रहा है, जैसे कि 17वीं और 18वीं शताब्दी में करता .....
मानव मनोविज्ञान का सुस्थापित सिद्धान्त है कि किसी भी हीन या संकीर्ण या संकुचित भावना से ग्रस्त व्यक्ति या समाज के लोगों की मनोग्रंथियों को आसानी से अन्य लोगों के प्रति नकारात्मक एवं .....