Dr. Purushottam Meena
मैं लेखक, कवि, चिन्तक, शोधार्थी और समाजिक कार्यकर्ता के रूप में जाना जाता हँू। मुझे तनावमुक्त जीवन विषय पर व्याख्याता के रूप में व्याख्यान देने हेतु बुलाया जाता रहा है। सैकडों दम्पत्तियों को निजी विवादों से बाहर निकालकर सुकूनभरी जिन्दगी जीने में सहयोग करने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ है। निराश्रितों, छोटे बच्चों, जरूरतमन्द स्त्रियों, बीमारों, निःशक्तजनों और बुजुर्गों के लिये काम करना मुझे सुकून देता है। मेरा मानना है कि धन दौलत से बहुत सारी भौतिक समस्याओं का समाधान तो हो सकता है, लेकिन जिस व्यक्ति के जीवन में प्यार, सम्मान एवं शान्ति नहीं है, उसका जीवन निरर्थक है। मेरा बास के प्रिय साथियों से केवल इतना ही कहना है कि मैंने इस दुनियाँ में नाइंसाफी से लडने और आगे बढते रहने के लिये जो सीखा है, वह निम्न पंक्तियों में बयाँ कर रहा हँू :- 1. एक साथ आना शुरुआत है, एक साथ रहना प्रगति है और एक साथ काम करना सफलता है। 2. अपने आपको बदलो। दुनिया बदल जायेगी। हम जो कुछ कहते हैं, उसे अपने आचरण से प्रमाणित करें। 3. बोलोगे नहीं तो कोई सुनेगा कैसे? दिखोगे नहीं तो कोई देखेगा कैसे? 4. यदि आप थोडा सा भी दबे, तो लोग आपको और दबायेंगे। यदि आप मुकाबला करोगे, तो वे दुम दबाकर भाग जायेंगे।
होम्योपैथ चिकित्सक, मानव व्यवहारशास्त्री, दाम्पत्य विवादों के सलाहकार, विविध विषयों के लेखक, कवि, शायर, चिन्तक तथा समाज में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव और गैर-बराबरी के विरुद्ध देश के १७ राज्यों में सेवारत राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) का राष्ट्रीय अध्यक्ष।
आदिवासी गाँवों में पंचों द्वारा संयुक्त रूप से बैठकर जिस स्थान पर पंचायत कर स्थानीय मामलों में निर्णय लेकर न्याय किया जाता है, उस स्थान को स्थानीय बोली में अथाईं कहा जाता है और गाँव में .....
दुर्भाग्य है, इस देश का और इस देश की स्त्रियों का कि आज 21वीं सदी में भी कानून उसी प्रकार से काम कर रहा है, जैसे कि 17वीं और 18वीं शताब्दी में करता .....
मानव मनोविज्ञान का सुस्थापित सिद्धान्त है कि किसी भी हीन या संकीर्ण या संकुचित भावना से ग्रस्त व्यक्ति या समाज के लोगों की मनोग्रंथियों को आसानी से अन्य लोगों के प्रति नकारात्मक एवं .....