विद्यार्थी का अर्थ न बदलें

आज का विश्व बड़े खतरनाक दौर से गुजर रहा है, मानव मन भारी तनावों से आक्रांत है। वह कू्ररता, घृणा, ईष्र्या के दावानल में झुलस रहा है। ...

देशबन्धु
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रावलमल जैन मणि


आज का विश्व बड़े खतरनाक दौर से गुजर रहा है, मानव मन भारी तनावों से आक्रांत है। वह कू्ररता, घृणा, ईष्र्या के दावानल में झुलस रहा है। होठों पर पत्थर सी खमोशी, आंखों में विवशता के आंसू, भृकुटि पर क्रोध की चिंगारियां, विश्वास की टूटती इमारतें, गमों का लम्बा काफिला, पर्यावरण में भारी प्रदूषण इन विकट परिस्थितियों में वह बेबसी की जिन्दगी बसर कर रहा है। विज्ञान के बढ़ते चरण, सुख-सुविधा की भरपूर सामग्री उसे भान नहीं दे पा रही है। देश के मूर्धन्य हितचिन्तक विचारक इस स्थिति में बहुत चिंतित हैं। पर सफलता के आसार नजर नहीं दे पा रहे हैं, आखिर ऐसे क्यों रहा है? शिक्षाविद् इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि- आज की शिक्षा प्रणाली दोषपूर्ण है, इसलिए शिक्षण संस्थानों से निकलने वाले विद्यार्थी- समाज में अच्छे ढंग से जीवनयापन नहीं कर पाते हैं। विद्यार्थी जीवन अग्रिम सम्पूर्ण-जीवन जीने की आधारशिला है।
शिक्षा पद्धति गलत है या दोषपूर्ण कहा जाता है। यदि ऐसा होता तो अच्छे डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, वैज्ञानिक कहां से आते? टेक्नोलॉजी, फिजियोलॉजी, इकोलॉजी आदि क्षेत्रों में कुशलता आज प्रकट हुई है, उतनी शताब्दियों में नहीं हुई, इस दृष्टि से मैं शिक्षा को दोषपूर्ण नहीं, अपूर्ण मानती हूं। वह अपूर्ण या अधूरी इसीलिए है- कि उसे विद्यार्थी की शारीरिक और बौद्धिक क्षमता का विकास तो होता है पर मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए उसमें कोई स्थान नहीं है।  यही कारण है कि उच्च कोटि के वैज्ञानिक आदि भी आवेश की स्थिति में आत्महत्या तक कर बैठते हैं। शिक्षा का मूलभूत उद्देश्य है- व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास। विचारों को ऐसे आत्मसात कराया जाय कि चरित्र का गठन किया सकें, मनुष्य बन सकें यदि पांच विचारों को ही आत्मसात कर तदनुसार चरित्र गठन किया जा सकता है। आज संतुलन, सहिष्णुता और प्रमाणिकता का दुर्भिक्ष पड़ रहा है, उससे मानव मन बेचैन हो उठा। ऑक्सीजन और हाइड्रोजन; गैस मिलाने से पानी बनता है। यह जितना सत्य है, निश्चित है उतना ही सच और असंदिग्ध है कि जीवन विज्ञान से एक स्वतंत्र और सर्वांग सुन्दर व्यक्तित्व का निर्माण होता है।
वह समग्र व्यक्तित्व विधिवत प्रयोगों की थीम से संवरता है, सजता है, बढ़ता है, गढ़ता है। श्रद्धा, घृति, शांति एवं शक्ति के नए प्रतिमान, उसकी सत्यनिष्ठा की चट्टान में कभी छेद नहीं हो पाता, हिम्मत का हिमालय खंडित नहीं होता, संवेदनशीलता का सिंधु भाप बनकर नहीं उड़ता, शुभ भावों की भीतर खड़ी फसल कभी सूखती नहीं। जिसका चित्र निर्मल वाणी पवित्र और आचरण विशुद्ध है, वह विकास की ऊंचाईयों का स्पर्श कर लेता है उसके जीवन क्षितिज पर एक नया सूरज उदित हो जाता है। जहां निस्पृहता है वहीं टिकता वीराग है, जहां निर्ममता है वहीं साधना का पराग है।
शिक्षा के अंचल में प्रगति चाहने वालों, जहां विनम्रता है वहीं ज्ञान का जलता चिराग है।
 

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