सच्चे परोपकार का स्वतंत्र स्वभाव

परोपकार और सेवा ये दोनों अष्टांग योग और इसी कारणवश सनातन क्रिया के अत्यावश्यक भाग हैं। कई लोग ऐसा समझते हैं कि परोपकार का अर्थ होता है किसी जरूरतमंद हो कुछ देना।...

ललित सुरजन
सच्चे परोपकार का स्वतंत्र स्वभाव
ललित सुरजन

योगी अश्विनीजी
परोपकार और सेवा ये दोनों अष्टांग योग और इसी कारणवश सनातन क्रिया के अत्यावश्यक भाग हैं। कई लोग ऐसा समझते हैं कि परोपकार का अर्थ होता है किसी जरूरतमंद हो कुछ देना। किंतु यहाँ हमें इस तथ्य से अवगत होना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि पैरोकार करने का नाम है की नहीं। आप किसी को कुछ भी देने योग्य नहीं हैं क्योंकि किसीको आपका कुछ देने के लिए, आपके पास स्वयं का कुछ है ही नहीं। आप केवल एक सृष्टि की प्रणाली का हिस्सा अर्थात एक निम्मितमात्र हैं। परोपकार का सही अर्थ यह है कि आप किसी की सहायता बिना कोई अपेक्षा किये करें। परोपकार वह होता है जब आपके बाएँ हाथ हो मालूम न हो कि आपका दाया हाथ क्या कर रहा है, चूँकि आपके बाएँ हाथ को इससे कोई सरोकार नहीं है। जब किसी सार्वजनिक समारोह में कोई व्यक्ति जाकर अपने द्वारा किये गए परोपकार का डंका बजाता है, तो वह असल में परोपकार नहीं कहलाता, अपितु ऐसा व्यक्ति अपने अहंकार को बढ़ाकर खुद के लिए शोहरत हासिल करनेका प्रयास कर रहा होता है। इस सृष्टि में मौजूद साधन और संपदा पर हर जीव का समान रूप से अधिकार है, और अगर आपके पास इन साधनों और संपदाओं की मात्रा अधिक है तो इसका सीधा अर्थ यही है कि आप सृष्टि के बाकी जीवों के हिस्से पर भी अपना अधिकार जमाएँ बैठे हुए हैं। इसी कारणवश परोपकार बिना यह सोचे करना आवश्यक है कि, आपके द्वारा दी गई संपत्ति किसके पास जा रही है या यह संपत्ति
जिसके पास जा रही है, वह दान जा रहा है वह सुपात्र है भी या नहीं। दान करते समय बिना जाँचे परखे दान करना आवश्यक है। वह जीव जिसके प्रति आप परोपकार करते हैं और फिर वह जीव उस किये गए परोपकार का किस तरीके से इस्तेमाल करता है, इस तथ्य की जानकारी रखना आपका काम नहीं होता। भगवद गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने स्पष्ट रूप से कहा है कि, किसी भी जीव की पात्रता का फैसला केवल मेरे हाथों में ही है, हम सबके हाथों में केवल कर्म करने का विकल्प है। किसी और की पात्रता को जाँचने के लिए सर्वप्रथम हमें स्वयं परिपूर्ण होना जरूरी है, किन्तु हम यह जानते हैं कि इस दुनिया में ईश्वर के अलावा और कोई भी परिपूर्ण नहीं है। दान हमेशा द्रव्य के रूप में करना जरूरी नहीं होता, अपितु दान मीठे बोल, सहायता, सेवा या किसी को दिलासा देने हेतु मुस्कुराने के रूप में भी किया जा सकता है, किंतु यह सब बिना किसी अपेक्षा के निस्वार्थ रूप से किया जाना चाहिए। उदाहरण के तौर पर महाभारत में, इंद्रदेव ने कर्ण के समक्ष एक गरीब ब्राह्मण के रूप में आकर उससे उसके कवच की मांग की। कर्ण ने उसे पहचान लिया था, और यह जानते हुए कि उसकी इस मांग को पूरा कर वह खुद की जान को खतरे में डाल रहा है, उसने उस ब्राह्मण की मांग का मान रखकर मुस्कुराते हुए अपना कवच खुले हाथों से उसे दे दिया। ऐसा कर्म ही सच्चे रूप से परोपकार कहलाता है।
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