कविता-Kavita

स्वागत में
मन में
जगह है जितनी
उस सब में मैंने
फूल की
पंखुरियां
बिछा दी हैं यों
कि जो कुछ
मन में आए
मन उसे
फूल की पंखुरियों पर
सुलाए !
- भवानीप्रसाद मिश्र

मेरे बच्चों,
तुम्हारे अपने भी कुछ दु:ख होंगे
सौंपकर तुम्हें मैं अपने दु:ख
तुम्हारे दु:खों को और नहीं बढ़ाना चाहता
तुम्हारे अपने सिद्धांत
अपने आदर्श होंगे
उन पर मैं
अपने सिद्धांतों, अपने आदर्शों का
मुलम्मा चढ़ाना नहीं चाहता।

मेरे बच्चों
तुम्हें देने के लिए मेरे पास धन-दौलत,
जमीन जायदाद कुछ भी नहीं
हां,
विरासत में देकर जाना चाहता हूं तुम्हें
अपना ऐसा नाम
जिसे लेते वक्त,
शर्मसार होकर तुम्हें
अपना सिर न झुकाना पड़े

मूलचंद तिवारी

हे प्रभु
ये कैसी लीला है
नोट खातिर ठेलम-ठेला है।
कब सोते हैैं, कब जाग जाते हैं
ये मेरे बच्चे भी नहीं जान पाते हैं।
मोदीजी दिल्ली में गरजते हैं ढाई लॉंख मिलेंगे
मेरे गॉंव में तो दो हजार देकर बाहर कर देते हैं।
नोट खातिर मरने की खबर सुन-सुन कर
मेरे बीबी-बच्चें भी डरने लगे हैं।
अब की खेत बंजर रहेंगे
बिटिया के हाथों की मेंहदी भी छूट जायेंगी।
क्या करें?
हे प्रभु!
रोना तो हमारी किस्मत है
रो-रो के ये दिन भी कट जायेगा.., कट जायेगा।

- प्रवीण कुमार सिंह

बाज़ार सबको नचाता है अपने इशारे पर
कहता है निरर्थक है भावना-सम्वेदना
असली चीज़ है खनखनाता हुआ सिक्क़ा
इसे हासिल करने के लिए बेच दो
जो कुछ भी है तुम्हारे पास बेचने लायक
अगर बेचेने लायक कुछ भी नहीं है
तो बाज़ार कहता है तुम्हें भूमंडलीकरण के सवेरे में
जीवित रहने का कोई हक़ नहीं है

बाज़ार सबको नचाता है अपने इशारे पर
इसीलिए तो खोखले हो रहे हैं मानवीय-रिश्ते
बढ़ती जा रही है गणिकाओं की तादाद
बढ़ते जा रहे हैं सम्वेदन-शून्य चेहरे
यंत्र की तरह दौड़ती-भागती भीड़
बाज़ार के इशारे पर जीना
बाज़ार के इशारे पर मरना ।

दिनकर कुमार

 हे मेरी तुम
डंकमार संसार न बदला
प्राणहीन पतझार न बदला
बदला शासन, देश न बदला
राजतंत्र का भेष न बदला,
भाव बोध उन्मेष न बदला,
हाड़-तोड़ भू भार न बदला
कैसे जियें?
यही है मसला
नाचे कोैन बजाये तबला?
-केदारनाथ अग्रवाल

नींद
मेरी पसंद की जगह है

शत्रुता का इतिहास बड़ा है
मित्रता के इतिहास से

ज्ञान उत्पन्न होता है
रहकर मूर्खों के बीच

विद्वान
दूसरी तरह से होता है मूर्ख

बुरा समय होता है
अच्छा करने के लिए सबसे अच्छा।
-सुधीर रंजन सिंह

 

हरे पत्ते
खुशकिस्मत हैं
रात की नमी में
उन्हें दुलारती
ओस की बूंदें
जब उन पर गिरती हैं
वे और निखर आते हैं

बात करे उन पीले पत्तों की-
ओस की बूदों की नमी से भी
जो हरिया नहीं पाते
और शाख से टूट कर गिर जाते हैं।
-सुधा अरोड़ा

रास्ते उजले किये
लीक काटी खुलेपन की प्यास ने
पग बढ़ाये विश्व में विश्वास ने।

जहां पर आगास है, उत्साह है
उसी मन को राहत की परवाह है
रास्ते उजले किये अभ्यास ने।

प्यार को जो रास्ते भर पायेगा
राग से, अनुराग से भर जायेगा
खुद कहा मरते विरोधाभास ने।
रमेश रंजक

हम और सडक़ें
सूर्यास्त मे समा गयीं
        सूर्योदय की सडक़ें,
जिन पर चलें हम
तमाम दिन सिर और सीना ताने,
महाकाश को भी वशवर्ती बनाने,
        भूमि का दायित्व
        उत्क्रांति से निभाने,
और हम
    अब रात में समा गये,
स्वप्न की देख-रेख में
सुबह की खोयी सडक़ों का
जी-जान से पता लगाने
केदारनाथ अग्रवाल

लौट आ, ओ धार!
टूट मत ओ साँझ के पत्थर
हृदय पर।
(मैं समय की एक लंबी आह!
मौन लंबी आह!)
लौट आ, ओ फूल की पंखडी!
फिर
फूल में लग जा।
चूमता है धूल का फूल
कोई, हाय!!
- शमशेर बहादुर सिंह

यह सब कुछ मेरी आंखों के सामने हुआ!

आसमान टूटा,
उस पर टंके हुये
ख्वाबों के सलमे-सितारे
बिखरे।
देखते-देखते दूब के दलों का रंग
पीला पड़ गया
फूलों का गुच्छा सूख कर खरखराया।

और ,यह सब कुछ मैं ही था
यह मैं
बहुत देर बाद जान पाया।
कन्हैयालाल नंदन

मनुष्यता पहाड़ ही ढोती 
भोर के हंस चुग गए मोती,
बैठ कर तमिस्त्रा कहीं रोती ।

मौत बेवक्त भला क्यों आती ?
जिंदगी  यदि जहर  नहीं बोती ।

अस्मिता चिंतन की हरने को,
चिंता रात भर नहीं सोती ।

आदमी व्यक्त जब नहीं होता,
चेतना, चेतना नहीं होती ।

वक्त बदले कि व्यवस्था बदले
मनुष्यता, पहाड़ ही ढोती ।
लाला जगदलपुरी

शिक्षा कोई प्रकाश नहीं है
अपने आप में
सिर्फ तरीका है
हमें अंधकार से
प्रकाश में ले जाने का।
- नरेश अग्रवाल

क्या है मेरी बारी में।

जिसे सींचना था मधुजल से
सींचा खारे पानी से,
नहीं उपजता कुछ भी ऐसी
विधि से जीवन-क्यारी में।
क्या है मेरी बारी में।

आंसू-जल से सींच-सींचकर
बेलि विवश हो बोता हूं,
स्रष्टा का क्या अर्थ छिपा है
मेरी इस लाचारी में।
क्या है मेरी बारी में।

टूट पडे मधुऋतु मधुवन में
कल ही तो क्या मेरा है,
जीवन बीत गया सब मेरा
जीने की तैयारी में।
क्या है मेरी बारी में
- हरिवंशराय बच्चन

ओ देशवासियों, बैठ न जाओ पत्थर से,
ओ देशवासियों, रोओ मत यों निर्झर से,
दरख्वास्त करें, आओ, कुछ अपने ईश्वर से
वह सुनता है
ग़मज़ादों और
रंजीदों की।
जब सार सरकता-सा लगता जग-जीवन से,
अभिषिक्त करें, आओ, अपने को इस प्रण से-
हम कभी न मिटने देंगे भारत के मन से
दुनिया ऊँचे
आदर्शों की,
उम्मीदों की।
माधना एक युग-युग अंतर में ठनी रहे
यह भूमि बुद्ध-बापू-से सुत की जनी रहे;
प्रार्थना एक युग-युग पृथ्वी पर बनी रहे
यह जाति
योगियों, संतों
और शहीदों की।
-हरिवंशराय बच्चन

क्या अमर सिंह का कहना सही है कि यादव परिवार की कलह मुलायम सिंह की लिखी स्क्रिप्ट का हिस्सा थी