बीजिंग ओलंपिक के बाद लोगों को मुझसे काफी उम्मीदें बढ़ गई है, मैं इस पर खरा उतरने की कोशिश करूंगा, इसके लिए कड़ी मेहनत कर रहा हूं, मेरा अगला लक्ष्य दिल्ली में होने वाले अगले वर्ष राष्ट्रमंडल खेलों में शानदार प्रदर्शन कर भारत को पदक दिलाना है और उसके बाद लंदन ओलंपिक 2012 की तैयारियों में जुट जाना है - विजेंदर
पढिए - आतंकवाद
संवाददाता. कमलेश कुमार राय
बात लगभग तीन दशक पुरानी है। जब भारत से मात्र एक या दो मुक्केबाज अंतरराष्ट्रीय स्तर के मुकाबले में खेलने या यूं कहें कि अपनी उपस्थिति दर्ज कराने जाते थे। लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं है। एक छोटे से अंतरराष्ट्रीय स्तर के मुकाबले के लिए भारतीय मुक्केबाजों की पूरी फौज खड़ी हो जा रही है और उसमें बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रही है और अपने 'घूंसो' के दम पर न केवल पदक ला रही है बल्कि पूरी दुनिया में भी अपना डंका बजा रही है खासतौर पर एशिया में। पहले जहां भारत में एक या दो मुक्केबाज ही बड़ी मुश्किल से तैयार हो पाते थे वहीं अब भारत बॉक्सिंग का नया पावरहाउस बनता जा रहा है। दिन प्रतिदिन विश्व मानस पटल पर भारतीय मुक्के की गूंज बढ़ती ही चली जा रही है। अगर भारत के ओलंपिक इतिहास में झांका जाए तो ज्यादा कुछ देखने को नहीं मिलेगा। भारत ने 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में इस खेल में पहली बार हिस्सा लिया था लेकिन लंबे अंतराल के बाद 2004 में सिडनी ओलंपिक के दौरान गुरुचरण सिंह ने क्वार्टरफाइनल में पहुंचकर पदक की आस जगाई थी जो पहले यहां तक का सफर तय करने वाले पहले भारतीय मुक्केबाज भी रहे थे। लेकिन अब परिदृश्य बदल चुका है। बीजिंग ओलंपिक में जहां विजेंदर कुमार ने कांस्य पदक जीता वहीं अखिल और जितेंदर कुमार कांस्य पदक के करीब पहुंचकर चूक गए। भारत में विजेंदर और अखिल आज यूथ आइकॉन बन चूके हैं। इन तीनों की सफलता के बाद भारत में मुक्केबाजी को लेकर जबर्दस्त उत्साह और जूनून पैदा हो गया। एशियाई मुक्केबाजी चैंपियनिशप में भारतीय मुक्केबाजों ने कुल सात पदक जीतकर एशियाई मुल्कों को सावधान रहने की सूचना दे दी। बच्चों में दिनोंदिन मुक्केबाजी का खुमार बढऩे लगा है। देश के छोटे-छोटे बच्चों को भी अब गलब्स व हुक पंच सीखते देखा जा सकता है। नीचे हम उन चुनिंदा मुक्केबाजों का जिक्र करेंगे जिन्होंने अपने घूंसों से दुनिया को यह बता दिया है कि आने वाला समय हमारा और सिर्फ हमारा है।
विजेंदर कुमार
बीजिंग ओलंपिक के कांस्य पदक विजेता विजेंदर आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। खेलों के महाकुंभ ओलंपिक में इसी मुक्केबाज ने भारत को मुक्केबाजी में पहला पदक दिलवाया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चार रजत व तीन कांस्य पदक जीत चुके इस मुक्केबाज का जन्म मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। विजेंदर ने सातवीं-आठवीं क्लास से ही मुक्केबाजी का गुर सिखना शुरू कर दिया था। जिस प्रकार से शहरों में क्रिकेट लोकप्रिय है उसी तरह भिवानी में बच्चे मुक्केबाजी सीखते हैं। भारतीय मुक्केबाजी के बारे में विजेंदर का कहना है कि बीजिंग ओलंपिक के बाद हमारे देश में मुक्केबाजी की तस्वीर ही बदल गई है। विजेंदर कहते हैं कि इसी का नतीजा है कि आज हमें विश्व सीरीज मुक्केबाजी की मेजबानी भी मिली है। अब मुक्केबाजी में पैसे के साथ-साथ ग्लैमर का तड़का भी लगेगा। मेरी ख्वाहिश है कि जिस प्रकार से क्रिकेट हमारे देश में लोकप्रिय है ठीक उसी तरह से मुक्केबाजी भी हो। मुक्केबाजी को आगे बढ़ाने के लिए मुझसे जितना मदद हो सकेगा मैं उसे अवश्य पूरा करूंगा। लड़कियों के बीच ज्यादा फेमस हो चुके विजेंदर की नजरें अब लंदन ओलंपिक पर टिकी है।
अखिल कुमार
इस होनहार मुक्केबाज का लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ स्वर्ण पदक है। अबतक कुल 25 अंतररराष्ट्रीय मुकाबलों में 10 स्वर्ण, एक रजत व 5 कांस्य पदक जीत चुके अखिल एथेंस ओलंपिक के रजत पदक विजेता को भी हरा चुके हैं। अर्जुन अवार्डी अखिल को कलाई की चोट की वजह से बॉक्सिंग छोडऩे तक की नौबत आ गई थी, लेकिन तारीफ करनी होगी इस बहादुर मुक्केबाज की जिसने दिन-रात एक कर गजब का जज्बा दिखाते हुए अपनी फिटनेस पर काम कर रिंग में शानदार वापसी कर सबको चौंका दिया। अखिल की नजरों में भारतीय कोच ही बेहतर हैं बशर्ते की उन्हें विदेशी कोचों की तरह सभी सुविधाएं और वेतन मिलने चाहिए। हरियाणा पुलिस में बतौर डीएसपी कार्यरत इस मुक्केबाज का कहना है कि अब भारतीय मुक्केबाजी का लोहा पूरी दुनिया मानने लगी है। उन्होंने कहा कि भारतीय मुक्केबाजों को अब विश्व स्तर पर एक चुनौती के रूप में लिया जाने लगा है। इसके अलावा उनका कहना है कि मुक्केबाजी में विश्वस्तर पर प्रोफेशनल प्राईजमनी प्रारंभ होने से अब इस खेल में नाम के साथ दाम भी मिलने लगेगा। इससे मुक्केबाजों में कड़ी प्रतिस्पर्धा देखने को मिलेगी। अपने अगले लक्ष्य के बारे में अखिल का कहना है कि दिल्ली में होने वाले 2010 राष्ट्रमंडल में स्वर्ण पर पंच जडऩा है।
जितेंदर कुमार
हरियाणा का यह मुक्केबाज मेलबर्न में कॉमनवेल्थ और विश्वकप में कांस्य पदक जीतकर अपने बुलंद इरादों को जता चुका है। चीते की तरह फुर्ती के लिए मशहूर जितेंदर रिंग में अपने कदमों का इस्तेमाल बड़ी ही खूबसूरती से करते हैं। इस मुक्केबाज ने जब मुक्केबाजी में कदम रखा था तब उनकी परिवार की आर्थिक हालत ठीक नही थी लेकिन तारीफ करनी होगी इस नौजवान मुक्केबाज की जिसने इन विषम परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी और निरंतर मेहनत कर आगे बढ़ते गए। जितेंदर जहां मुक्केबाजी के गुर सीखने जाते थे वह ट्रेनिंग सेंटर घर से काफी दूर था। वह वहां पहुंचने के लिए दूसरे वाहन चालकों से लिफ्ट मांगते थे और अभ्यास के लिए वहां पहुंचते थे। हाल ही में संपन्न हुए एशियाई मुक्केबाजी चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीत जितेंदर ने कड़ी मेहनत का सबूत दे दिया है। अखिल कुमार को अपना रोल मॉडल बताने वाला यह मुक्केबाज अपनी सफलता का श्रेय भी अखिल को ही देता है। अपने खेल के बारे में जितेंदर कहते हैं कि मुझे तकनीक और ताकत पर और ज्यादा ध्यान देना है और दोनों को बढ़ाना है। भारतीय मुक्केबाजी के बारे में जितेंदर का कहना है कि अभी तो यह शुरुआत है आगे-आगे देखिए होता है क्या।
अंतरेश ललित लाकड़ा
पिछले वर्ष हुई विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में यूरोपियन रजत पदक विजेता को हराकर लाकड़ा ने भारत के लिए सबसे पहले ओलंपिक टिकट कटाया था। जमशेदपुर के टाटा स्टील के ट्रेनिंग सेंटर में अपनी प्रतिभा को निखारने वाले इस मुक्केबाज का कोच कोई और नहीं बल्कि उनके पिता परमेश लाकड़ा हैं। भारतीय नेवी में कार्यरत लाकड़ा राष्टï्रमंडल खेल में स्वर्ण पदक जीत चुके हैं। भारत में मुक्केबाजी की लोकप्रियता के बारे में लाकड़ा का कहना है कि अभी तो हमें और पदक लाने बाकी हैं। दिल्ली में होने वाले 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में आपकों इसकी झलक मिल सकती है। लंदन ओलंपिक के लिए हमें और मेहनत करनी है और समूचे विश्व में अपने पंच का डंका बजानी है। लाकड़ा इन-दिनों काफी मेहनत कर रहे हैं और अपने आप को फिट रखने के लिए सावधानियां भी बरत रहे हैं।
दिनेश कुमार
भारत में मुक्केबाजी की बढ़ती लोकप्रियता को देखकर दिनेश बहुत खुश हैं। हैवीवेट वर्ग में लडऩे वाले दिनेश ने बहुत ही कम समय में मुक्केबाजी रिंग में अपनी उपस्थिति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दर्ज कराई है। दिनेश कहते हैं कि मुक्केबाजी का असली मुकाबला नॉकआउट दौर होता है। मैं इसी में विश्वास रखता हूं। राष्ट्रीय खेलों में दो स्वर्ण अपने नाम कर चुके दिनेश अपने आक्रामक रवैये के लिए जाने जाते हैं। पिछले दिनों विश्वकप मुक्केबाजी में दिनेश ने कांस्य पदक जीता था। फिलहाल दिनेश हरियाणा पुलिस में बतौर इंस्पेक्टर कार्य कर रहे हैं। दिनेश कहते हैं कि अब हमारी मेहनत रंग ला रही है। यह खेल अब और आगे बढ़ेगा। भिवानी में तो यह खेल काफी लोकप्रिय हो चुका है। अब छोटे-छोटे बच्चे भी रिंग की तरह रूख कर रहे हैं।
थोकचोम ननाओ सिंह
भारत में मुक्केबाजी की नई पौध माने जाने वाले ननाओं सिंह ने विश्व यूथ चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर देश के लिए मुक्केबाजी में नया सितारा बनने का संकेत दे दिया है। इससे पहले ननाओ यूथ राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीत चुके हैं। दोस्तों के कहने पर मुक्केबाजी में अपना कॅरियर बनाने वाले इस नन्हें मुक्केबाज ने जब मुक्केबाजी शुरू कि थी उस समय इन्हें अपने पिता से काफी डांट-फटकार व मार पड़ी थी। लेकिन ननाओं के ऊपर मुक्केबाजी का भूत कुछ इस कदर सवार था कि वह उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था। पिता जी ने ननाओं को स्कूल जाने तक के लिए मना कर दिया। अंत में जीत ननाओं की ही हुई। पिता को इस मुक्केबाज के जिद् के आगे झुकना पड़ा। ननाओं के पिता ने इस मुक्केबाज को एक मुक्केबाजी सेंटर में दाखिला करा दिया। उसके बाद से वह पिछे मुड़कर नहीं देखे। ननाओं कहते हैं कि अब उनके पिता जी को उनसे कोई शिकायत नही है। थोकचोम कहते हैं कि विश्व स्तर पर कजाकिस्तान व उजबेकिस्तान से अब हम कहीं आगे हो चुके हैं। पहले यह देश मुक्केबाजी में हमसे कहीं आगे थे। देशी-विदेशी मुक्केबाजों में अतर के बारे में ननओं का कहना है कि हममें और उनमें सिर्फ खान-पान का अंतर है। हाल ही में एशियाई चैंपियनशिप में रजत पदक जीतने वाले ननाओं की नजरें अब राष्ट्रमंडल और लंदन ओलंपिक पर टिकी है। मा
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