Interviewee : डॉ. प्रदीप मूले,वरिष्ठ इंटरवेशनल रेडि
Interviewer : देशबन्धु फीचर डेस्क
Interview Date :
06,June,2009
गर्भाशय रसौली (फायब्राइट) को हटाने की पांरपरिक सर्जरी में गर्भ को बचाना संभव नहीं था। इस प्रक्रिया में रोगी को बेहोश नहीं किया जाता। और बच्चेदानी को निकालने की आवश्यकता भी नहीं होती-डॉ. प्रदीप मूले अब बिना चीर फाड़ हो रहा है- रसौली का इलाज। देश में 35 वर्ष की उम्र के बाद औसतन प्रत्येक पांचवी महिला को गर्भाशय की रसौली का खतरा। सौली से ग्रसित महिलाओं के लिए अब एक खुशखबरी है। 'यूटीन फायब्राइट एंबोलाइजेशनÓ नामक तकनीक से कोख को बचाना संभव हो गया है। राजधानी के बत्रा अस्पताल में इस विधि से रसौली से मुक्त हुई महिला ने इस 29 जनवरी को एक बच्ची को जन्म दिया। रसौली से गर्भ को बचाने की भारत की यह पहली घटना मानी जा रही है। इस तकनीक के सहारे ही गर्भ को बचाया जा सका। इस तकनीक को अंजाम दिया बत्रा अस्पताल के वरिष्ठ इंटरवेशनल रेडियोलोजिस्ट डॉ. प्रदीप मूले ने। उन्हें इस तकनीक के जरिए अब तक सात अन्य महिलाओं के गर्भ को बचाने में सफलता मिल चुकी है। फायब्राइड स्त्रियों के बांझ बनने का बहुत बड़ा कारण बन गया है। इसके रहते कोख में गर्भ ठहर ही नहीं पाता। लेकिन अब गर्भ की रसौली से आसानी से मुक्ति पाई जा सकती है। गर्भाशय रसौली (फायब्राइट) को हटाने की पांरपरिक सर्जरी में गर्भ को बचाना संभव नहीं था। उसका केवल एक ही उपचार था कि गर्भाशय को निकाल दिया जाए। लेकिन अब इसकी आवश्यकता नहीं होगी। आजकल गर्भाशय में रसौली की समस्या काफी संख्या में देखने को मिलती है। गर्भाशय की रसौली 'फाइब्रायट' छोटे-बड़े किसी भी आकार में हो, अति कष्टïदायी और दर्दनाक होती है। अभी तक इसका इलाज ओपन सर्जरी से लेकर आधुनिक सर्जरी की विधियों से किया जाता रहा है। इस बारे में डॉ.प्रदीप मुले का कहना है कि रसौली की उपज महिला की प्रजनन क्षमता के कारण होती है। इसको विकसित करने में एस्ट्रोजन हारमोन का हाथ होता है। यह हारमोन अंडाशय में बनता है और हड्डियों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संतानहीन महिलाओं में इसका खतरा अधिक होता है। आमतौर पर जांच के लिए विशेषज्ञ भीतरी परीक्षणों के द्वारा करते है। गर्भाशय में आए बदलाव के कारण विशेषज्ञ इसकी पहचान करते है। अल्ट्रा साउंड, सी टी स्कैन व एम आर जांच के द्वारा इसकी पुष्टिï होती है। कई बार रसौली अपना लक्षण प्रकट नहीं करती है तब अल्ट्रा सांउड करने पर उसका पता चलता है। एक शोध अध्ययन के अनुसार देश में 35 के बाद औसतन प्रत्येक पांचवी महिला को गर्भाशय की रसौली का खतरा है। कभी-कभी इनका वजन किलोग्राम में भी होता है। मांसपेशियों में छोटी-छोटी गोलाकार गांठे उठ आती हैं, जो बढ़ कर कुछ मामलों में काफी बड़ी हो जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार महिलाओं में 20 वर्ष की उम्र के बाद कभी भी रसौली हो सकती है। लेकिन इसके सबसे अधिक मामले 35 से 45 वर्ष की उम्र में देखने को आते हैं। चिकित्सकों के अनुसार रसौली की उपज महिला की प्रजनन क्षमता के कारण होती है और इसको विकसित करने में एस्ट्रोजन हारमोन का काम होता है। यह हारमोन अंडाशय में बनता है और हड्डियों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संतानहीन महिलाओं में इसका खतरा अधिक होता है। इसके प्रारम्भिक लक्षणों में मासिकस्त्राव के दौरान अधिक खून आने के साथ ही पेट में दर्द और भारीपन का होना हैं। इसके कारण कई महिलाओं को कमर दर्द की शिकायत भी होती है। चिकित्सकों के अनुसार रसौली के कारण मासिक धर्म के दौरान कुछ महिलाओं में अधिक मात्रा में रक्त का स्त्राव होता है। आमतौर पर 3 से 5 दिन तक चलने वाले रक्त स्त्राव की अवधि 8 से 10 दिन हो जाती है। इस कारण वे कमजोरी व थकान का शिकार हो जाती है। ज्यादातार मामलों में मासिक चक्र पूर्ववत रहता है लेकिन रक्त स्त्राव अधिक दिन चलना है। कुछ महिलाओं में यह समय से पहले आने लगता है। कुछ मामलों में रसौली में संक्रमण के कारण स्त्राव से दुर्गंध भी आती है। लेकिन रसौली का एक आम लक्षण है, पेट में दर्द, पेट में भारीपन के साथ ही कई बार बहुत तेज दर्द भी होता है, जो असहनीय होता है। दर्द बढ़ जाने पर आसपास के अंगों पर इसका प्रभाव पडऩे लगता है। बड़ी आंत पर दबाव पडऩे से कब्ज की शिकायत हो सकती है और यूरेनली बैल्डर पर बढ़े प्रभाव के कारण मूत्र संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती है। आमतौर पर जांच एक महिला रोग विशेषज्ञ भीतरी परीक्षणों के द्वारा करते हैं। गर्भाशय में आए बदलाव के कारण विशेषज्ञ इसकी पहचान करते हैं। अल्ट्रा साउंड, सी.टी स्कैन व एम.आर. जांच के द्वारा इसकी पुष्टि' होती है। कई बार रसौली अपना लक्षण प्रकट नहीं करती है और किसी और कारण से अल्ट्रा साउंड करने पर उसका पता चलता है। उपचार के विकल्प दवाइयों द्वारा शल्य क्रिया और लैप्रोस्कोपी द्वारा अति सुक्ष्म छिद्र द्वारा रसोलियों का निदान डॉक्टरों के पास जाने के बाद बीमारी का तो पता चल जाता है लेकिन पहले अधिकतर केसों में हिस्टरटेक्टोमी कराने की जरूरत नहीं पड़ती। आधुनिक तकनीक-यूट्रीन फाइब्रोइड एंबोलाइजेशन इस आधुनिक तकनीक के द्वारा त्वचा पर अति सूक्ष्म छिद्र करके बच्चेदानी की रसौलियों का इलाज किया जाता है। इस प्रक्रिया में रोगी को बेहोश नहीं किया जाता और रोगी को अस्पताल में केवल एक ही दिन रुकना पड़ता है। इस प्रक्रिया के उपरांत अधिक महिलाएं 1-3 दिन में सामान्य रूप से कार्य करने लगती हैं और बच्चेदानी को निकालने की आवश्यकता नहीं होती है। एक ही समय में सारी रसौलियों का उपचार हो जाता है और यह अत्यधिक प्रभावशाली है। दरअसल इस प्रक्रिया के दौरान एक इंटरवैंशनल रेडियोलोजिस्ट त्वचा पर एक अति सुक्ष्म सा छिद्र करके पेट के निचले हिस्से से नली (कैथेटर) डालकर एंजियोग्राफी करता है। गर्भाशय नलिका की पहचान एंजोग्राफी द्वारा करने के उपरांत नली के जरिए राई के दाने के बराबर की दवाई इंजेक्शन द्वारा रसौली तक पहुंचाते हैं। रक्तस्राव के कारण होने वाला दर्द भी 4-6 घंटों में ठीक हो जाता है और रक्तस्राव तुरंत बंद हो जाता है। इस नई तकनीक के लाभ इस प्रक्रिया में रोगी को बेहोश करने की आवश्यकता नहीं होती। त्वचा पर एक सूक्ष्म छिद्र द्वारा यह प्रक्रिया की जाती है। रोगी दूसरे तकनीकों की अपेक्षा शीघ्र स्वस्थ होते हैं। पेट पर ऑपरेशन का कोई निशान नहीं आता, इस तकनीक को बार-बार करने की जरूरत नहीं पड़ती। रक्त का कोई नुकसान या रक्त चढ़ाने का कोई खतरा नहीं है। रसौलियों के कारण अत्यधिक रक्तस्राव की शिकायत होती है तो 12-24 घंटों के अंदर इलाज हो जाता है। यह प्रक्रिया रोगियों के लिए भावुक, आर्थिक और शारीरिक तौर पर पूर्णतया: लाभान्वित साबित हुई है।