मानवाधिकार के लिए काम

प्रभाकर चौबे सत्ता (सरकार) की मंशा से चलता है तंत्र। तंत्र की मंशा से चलते हैं पुर्जे-इन-पुर्जों से तंत्र काम लेता है। लेकिन व्यवस्था की मंशा से चलती है सरकार। इस पूंजीवादी लोकतांत्रिक सरकार भी पूंजी ...

प्रभाकर चौबे

प्रभाकर चौबे
सत्ता (सरकार) की मंशा से चलता है तंत्र। तंत्र की मंशा से चलते हैं पुर्जे-इन-पुर्जों से तंत्र काम लेता है। लेकिन व्यवस्था की मंशा से चलती है सरकार। इस पूंजीवादी लोकतांत्रिक सरकार भी पूंजी की मंशा से चलेगी। बस्तर में नक्सली-विरोधी अभियान भी सरकार की मंशा के अनुरूप चलेगा-चलता रहा है। यह जरूरी नहीं कि किसी समूह की रक्षा-सुरक्षा-उसकी प्रगति की मंशा से ही कोई अभियान चलाए। यह भी हो सकता है कि पूंजीवादी लोकतंत्र में सजोरों की मंशा के अनुरूप सरकार कोई अभियान चलाए, इस अभियान में कमजोरों- जिनकी कोई आवाज नहीं है, अथवा जिनकी आवाज ‘प्रजातंत्र’ के सरोकार से बाहर है, उनके हित को कोई नुकसान पहुंचे। व्यवस्था या कहें पूंजीवाद की मंशा के अनुरूप अपनी मंशा बनाने सरकारें ऐसे नुकसान पर कान नहीं देतीं। बड़ी विडम्बना है। बस्तर कुछ वर्षों से चर्चा में है। लेकिन गत कुछ माह से कुछ ज्यादा ही चर्चा में है और मानवाधिकार के लिए काम कर रहे व्यक्तियों, संस्थाओं की वहां मौजूदगी के कारण, उनकी उपस्थिति का विरोध किए जाने को लेकर बस्तर राष्ट्रीय मीडिया में भी आ रहा है। वहां का आदिवासी परेशान है-सोचता है, ‘कहां जाई, का करी।’ कबीर ने कहा है- दोऊ पाटन के बीच में साबूत बचा न कोय...। लेकिन बस्तर की बात यह कि दोनों ही ताकतें बस्तर को बचाने के लिए काम करने का दावा कर रही हैं। सरकार खुद को बस्तर के विकास के लिए दृढ़ संकल्पित बताती है। विकास से सरकार का आशय होता है- सडक़ें, पुल-पुलिया, कॉलेज खोलना आदि। पढ़ाई हो रही है कि नहीं, डॉक्टर हैं कि नहीं, दवाइयां हैं कि नहीं यह ‘रहस्यवाद’ में खो जाते हैं। आदिवासियों के विकास का पूंजीवादी माडल शोषण की नई तकनीक के साथ उपस्थित होता है इसमें आदिवासी कुछ अच्छे कपड़े पहन लेते हैं, मोबाइल की सुविधा पा लेते हैं... आदि-आदि। लेकिन उनकी बुनियादी जरूरतों के लिए वे गिड़गिड़ाते ही मिलेंगे- जल-जंगल-जमीन के अधिकार की मांग करते उम्र बीत जाएगी। बड़ा संकट है। आदिवासी कवि महादेव टोप्पो ने लिखा है-
बहसों के प्रेशर कूकर में
उबलते हमारे सपने
कर दिये जाते हैं ठंडे-
संसद के शीत नियंत्रित
सभा कक्षों में...।

सरकारें क्या मानवाधिकार के लिए काम कर रही संस्थाओं, व्यक्तियों से डरती हैं, क्या परहेज करती है, क्या घृणा करती हैं या उनकी उपस्थिति ही उन्हें पसंद नहीं है? अगर ऐसा है तो क्यों है ऐसी सोच सरकारों की? मानवाधिकार कोई ‘दानपत्र’ में दिया गया अधिकार तो है नहीं। लम्बे संघर्ष के बाद  मानवाधिकार अवधारणा को मान्यता मिली। इसे संयुक्त राष्ट्र संघ ने माना और दुनिया भर की सरकारों ने इस पर हस्ताक्षर किए- मानवाधिकार कोई खैरात में नहीं मिल गया। लम्बा संघर्ष किया गया- पराधीनता से स्वतंत्रता ही मानवाधिकार की प्राप्ति नहीं हो जाती। एक मुल्क किसी विदेशी गुलामी से मुक्त हो और आ•ााद हो जाए तो इसका मतलब यह नहीं कि  मानवाधिकार की समग्रता में प्राप्ति हो गई। हो सकता है ऐसी मुक्ति कभी-कभी भ्रम की स्थिति पैदा करे। हो सकता है एक की गुलामी से छूटकर मनुष्य अपने ही लोगों का गुलाम बन जाए- बन जाने मजबूर हो। यह भी सही नहीं कि यह लोकतंत्र ही मानवाधिकार की गारंटी है- यह लोकतंत्र भी लूट का माध्यम बन जाता है। मानवाधिकार की सम्पूर्ण अवधारणा है- मनुष्य को अपने लिए उन्मुक्त वातावरण- मनुष्य इतना उन्नत हो जाए कि वह अपनी स्वनियंत्रित स्थिति से अपना समस्त व्यवहार चलाए- उसे न डर हो न कहीं से प्रताडऩा मिले। मानवाधिकार एक आदर्श व्यवस्था है और मानवाधिकार के लिए काम करने वाले ‘अपने लिए नहीं’ मानवाधिकार को उसके पूरे अर्थ में लागू करने के लिए काम करते हैं। मानवाधिकार का अर्थ दरअसल एकदम सीमित कर दिया गया है- मतलब मानवाधिकार का उल्लंघन का आशय है पुलिस प्रताडऩा, जबकि इतना सीमित अर्थ नहीं है। हर वह काम जो मनुष्य को उसकी मर्जी से करने रोड़े अटकाता है, उसे भय के वातावरण में रखता है, उससे उसका अधिकार हड़पता है और उसका प्राप्य उसे मिलने नहीं देता, मानवाधिकार का उल्लंघन है। और मानवाधिकार के लिए काम करने वाले इस सोच को, इस व्यवस्था को, तंत्र को बदलने और उनमें सच्चे लोकतंत्र की सोच लाने के लिए काम करते हैं। मानवाधिकार के लिए काम करने वाले कभी भी किसी भी तरह की हिंसा का समर्थन नहीं करेंगे। वे एक विचार की रोपण की लड़ाई लड़ते होते हैं जो केवल जनशिक्षा से ही आ सकती है। जनशिक्षा से उठ खड़ी हुई जनता ही सरकारों का चरित्र बदल सकती है- हिंसा किसी भी समस्या का हल नहीं है। महात्मा गांधी सत्य और अहिंसा की प्रतिमूर्ति थे। मानवाधिकार के काम करने वाले हमेशा ही हिंसा का विरोध करते आए हैं। और मानवाधिकार के लिए केवल अपने देश में ही काम नहीं किया जा रहा, केवल यहां ही मानवाधिकार आयोग हो ऐसा भी नहीं है। लेकिन पूंजीवादी लोकतंत्र में सरकारें पूंजीवादी मंशा से ही परिचालित होती हैं। इस व्यवस्था में सरकारें अपने हित को ध्यान में रखकर कभी कठोर हो जाती हैं तो कभी नरम। मजेदार बात यह कि कोई भी सरकार मानवाधिकार के लिए काम करने को नकार नहीं सकतीं क्योंकि इसे स्वीकार करते रहने में ही इनके अस्तित्व की रक्षा सम्भव है। यह पूरी वैश्विक व्यवस्था का दबाव है इन पर। अगर एक ही देश का सवाल होता या किसी अंचल मात्र का सवाल होता तो ‘डाकू समस्या’ से निपटने की तरह मानवाधिकार की मांग से सरकारें निपट लेतीं। क्या बात है कि आदिवासियों को भूखा मरना ही मीडिया में खबर बनता है- उनका अपने सम्मान के लिए संघर्ष मीडिया में खबर नहीं बनता। क्या बात है कि मीडिया में कराई जा रही इतनी ढेरों चर्चा, ढेरों लेख, ढेरों विचार और मीडिया की अहंकारपूर्ण घोषणा कि हम आदिवासियों पर बात करते हैं, इन सब के बाद भी आदिवासी विवश, बेबस क्यों हैं?
एक और बात यह कि मानवाधिकार के लिए काम कर रहे व्यक्ति, संस्था को तड़ाक से माओवादी समर्थक कह दिया जाता है। इसका मकसद होता है मानवाधिकार काम को कमजोर करना। इन्हें भी पता होता है कि मानवाधिकार के लिए काम करने का आशय नक्सल समर्थन नहीं होता- हो भी नहीं सकता। माओवादियों से चर्चा का सुझाव देना एक बात है- लोकतंत्र में ऐसा सुझाव दिया जाता रहा है लेकिन उनके तौर-तरीकों का समर्थक एकदम जुदा है। जो हिंसा का समर्थन करते हैं वे या वह संगठन उसके प्रमुख कभी भी मानवाधिकार के लिए काम करने वाले नहीं हो सकते। उल्टे हिंसा का समर्थन करना मानवाधिकार के खिलाफ है। इसलिए नक्सली क्षेत्र में मानवाधिकार के लिए काम करने वाले नक्सली समर्थक नहीं माने जा सकते- और नक्सली समर्थक का संदेह हो तो सरकार तथा उसका तंत्र कार्रवाई करे- ये क्या कि एक अलग ही ‘कानूनेत्तर संस्था’ नक्सल समर्थक की खोजबीन करे और कानून अपने हाथ में ले। नक्सलवाद के खिलाफ जनजागरण एक बात है लेकिन नक्सलवादी समर्थक कहकर मारपीट करना एकदम गैरकानूनी और अलोकतांत्रिक है।
एक और बात यह कि सत्ता या कहें सरकार की नीतियों का विरोध देशद्रोह किस तरह से हो गया- देशद्रोह को इस स्तर पर लाया जा रहा है। हमारे संत कवियों ने स्थापित धर्म-सत्ता को चैलेंज किया मानवतावादी धर्म की शिक्षा दी वे धर्मविरोधी नहीं माने गए- धर्म को मनुष्य के करीब लाने के लिए इन संत कवियों ने रूढि़बद्ध कर दिए गए धर्म का डटकर विरोध किया और जनता उनके साथ चली। इसी तरह सत्ता, राजनीतिक सत्ता का विरोध करना देशद्रोह नहीं है। असल में लोकवादी-जनवादी अवधारणा हो और जनवादी रास्ता अख्तियार किया जाए तो विकास का फल या हिस्सा सबको बराबरी से मिले। घोर गैरबराबरी भी मानवाधिकार का हनन किया जाना है। हर व्यक्ति को बराबर का हिस्सा मिलना चाहिए। ऐसा नहीं कि-
भूखे-अधनंगों के बीच
भाषण देने पहुंचे, बोले
सबकी जय हो...।

लोकतंत्र में मानवाधिकार का हनन लोकतांत्रिक सरकारों की बदनीयती का परिणाम होता है। इससे उबरना जरूरी है। सत्ता डरा-धमकाकर अपनी सोच में ढालना चाहती है। मानवाधिकार के लिए काम कर रहे लोगों में कुछ नकली हो सकते हैं। लेकिन मानवाधिकार नकली या केवल नारेबाजी में उछाली गई अभिव्यक्ति नहीं है। सवाल है मानवाधिकार के क्षेत्र में काम कर रहे लोग मानवाधिकार के लिए ही काम कर रहे, उसकी अवधारणा के अनुरूप काम कर रहे तो करने दिया जाना चाहिए। एक जरूरी काम है। मुक्तिबोध की कविता की पंक्तियां:-
जन-जन के लक्ष्यों के
संघर्षों मार्गों पर
चलने को आतुर उन
श्रद्धावत युगों के
अंतर में, मन में है
आलोकित...।

prabhakarchaube@gmail.com


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