क्या संवैधानिक दृष्टि से उचित है चुनाव घोषणापत्र

एल.एस. हरदेनिया चुनाव का मौसम आते ही राजनीतिक पार्टियों के बीच में एक अस्वस्थ प्रतियोगिता प्रारंभ हो जाती है। इस प्रतियोगिता के चलते राजनीतिक पार्टियां मतदाताओं को लुभाने के लिए बढ़ा-चढ़ा कर घोषणाएं क...

एल.एस. हरदेनिया

एल.एस. हरदेनिया
चुनाव का मौसम आते ही राजनीतिक पार्टियों के बीच में एक अस्वस्थ प्रतियोगिता प्रारंभ हो जाती है। इस प्रतियोगिता के चलते राजनीतिक पार्टियां मतदाताओं को लुभाने के लिए बढ़ा-चढ़ा कर घोषणाएं करती हैं। इन घोषणाओं द्वारा वे महिलाओं, युवकों, अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति तथा अल्पसंख्यकों को तरह-तरह के आश्वासन देते हैं। इस तरह के आश्वासनों में मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, सस्ता अनाज, यहां तक कि टेलीविजन, वाशिंग मशीन, प्रेशर कुकर आदि नि:शुल्क देने का वायदा होता है।
आधुनिक तकनीकी आविष्कारों के मद्देन•ार अब स्मार्टफोन, लैपटॉप आदि भी शामिल कर दिए गए हैं। विशेषकर विद्यार्थियों को लैपटॉप दिए जाने की घोषणाएं की जाती हैं। इस तरह के आश्वासनों को दो भागों में बांटा जा सकता है। पहला, जो चुनाव की घोषणा के पूर्व दिए जाते हैं और दूसरा, जो चुनाव की तिथियां घोषित होने के बाद दिए जाते हैं। चुनाव के पहले घोषणाएं सत्ताधारी पार्टी द्वारा की जाती है। सत्ताधारी पार्टियों द्वारा इस तरह की घोषणाएं चुनाव के बाद सत्ता में रहने के तीसरे वर्ष से घोषित की जाती हैं। इनमें कभी-कभी यह भी नहीं देखा जाता है कि जो घोषणाएं की जाती हैं वे संवैधानिक दृष्टि से उचित है कि नहीं। जैसे कई पार्टियों ने चुनाव के पहले यह  घोषणा की कि सभी लोगों को तीर्थयात्रा कराई जाएगी। वैसे इस बात की शुरूआत बहुत पहले केन्द्रीय सरकार ने की थी, जिसके अनुसार हज पर जाने वाले यात्रियों को व्यय का एक बड़ा हिस्सा केन्द्र सरकार की ओर से दिया जाता है। इस प्रथा का सहारा लेकर लगभग अनेक राज्यों ने लोगों को तीर्थयात्रा कराने का सिलसिला प्रारंभ कर दिया है। यदि बारीकी से देखा जाए तो तीर्थयात्रियों को वित्तीय सहायता देना हमारे धर्मनिरपेक्ष संविधान की मंशा के विपरीत है। शायद मध्यप्रदेश सरकार ने सबसे पहले इस तरह की तीर्थयात्रा की शुरूआत की थी।
चुनाव घोषणा होने के बाद आदर्श चुनाव संहिता लागू हो जाती है। परंतु वह चुनाव संहिता राजनीतिक पार्टियों द्वारा जारी किए गए घोषणापत्र पर लागू नहीं होती। उन्हें इस बात की पूरी छूट है कि वे जो चाहें वैसी घोषणा करें। आदर्श चुनाव संहिता के अनुसार इस तरह की घोषणाएं भ्रष्ट आचरण की परिधि में नहीं आएंगी। जो राजनीतिक पार्टियां चुनाव घोषणापत्र के माध्यम से विभिन्न प्रकार के आश्वासन मतदाताओं को देते हैं, उसके बाद एक बहस प्रारंभ हो जाती है। चुनाव आयोग को तरह-तरह की शिकायतें भेजी जाने लगती हैं। चूंकि चुनाव घोषणापत्र एक कानून सम्मत गतिविधि है इसलिए चुनाव आयोग इस संबंध में किसी प्रकार का सवाल राजनीतिक पार्टियों से नहीं पूछ सकता। चुनाव घोषणापत्र में दिए गए आश्वासनों से संबंधित मामला सर्वोच्च न्यायालय में भी पहुंचाया गया।
5 जुलाई, 2013 के अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना था कि जनप्रतिनिधि कानून के अनुसार घोषणापत्र में दिए गए आश्वासन भ्रष्ट आचरण की सीमा में नहीं आते हैं। परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने भी यह स्वीकार किया था कि इस तरह की घोषणाओं से मतदाता प्रभावित होता है और कुुछ हद तक निष्पक्ष चुनाव भी इससे प्रभावित होते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को परामर्श दिया था कि वह चुनाव घोषणापत्र के संबंध में कुछ दिशानिर्देश जारी करे और यह भी परामर्श दिया था कि इस तरह के दिशानिर्देश राजनीतिक पार्टियों से परामर्श के बाद किए जाएं।  सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार चुनाव आयोग ने राजनीतिक पार्टियों से सलाह की थी। परंतु लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों ने किसी भी प्रकार के दिशानिर्देश दिए जाने का विरोध किया।
राजनीतिक पार्टियों की राय थी कि यह उनका अधिकार और कर्तव्य है कि वे चुनाव घोषणापत्र के माध्यम से मतदाताओं को महत्वपूर्ण आश्वासन दें और यह बताएं कि सत्ता में आने के बाद वे उनके कल्याण के लिए क्या-क्या कदम उठाएंगे। सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार चुनाव घोषणापत्र के संबंध में चुनाव आयोग ने कुछ दिशानिर्देश निर्धारित किए। इन दिशानिर्देशों के अनुसार आयोग ने राजनीतिक पार्टियों से यह अपेक्षा की है कि वे जो भी आश्वासन देते हैं उनका तार्किक आधार बताएं और यह भी बताएं कि इन आश्वासनों को पूरा करने के लिए वित्तीय साधन कैसे और कहां से जुटाएंगे? यह दिशानिर्देश आदर्श चुनाव संहिता में शामिल किए गए हैं।
पिछले वर्ष अगस्त माह में एआईडीएमके से यह स्पष्टीकरण मांगा गया था कि उसने जो भी आश्वासन दिए थे उनके लिए तार्किक आधार क्या था परंतु एआईडीएमके ने स्पष्टीकरण नहीं दिया। उसकी इस असफलता को आदर्श चुनाव संहिता का उल्लंघन माना गया था। एआईडीएमके के साथ-साथ तमिलनाडु के डीएमके से भी इसी तरह का स्पष्टीकरण मांगा गया था। चुनाव आयोग द्वारा जारी किए गए दिशानिर्देशों का पालन राजनीतिक पार्टियां नहीं कर रही हैं और इससे एक प्रकार की वित्तीय अनुशासनहीनता बढ़ रही है। इस संदर्भ में यह प्रश्न उठता है कि आखिर सत्ता में आने वाली पार्टी को स्वयं एक वित्तीय अनुशासन संहिता बनानी चाहिए।
वर्तमान में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को असाधारण वित्तीय अधिकार प्राप्त हैं। अनेक अवसरों पर यह देखा गया है कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों ने बिना मंत्रिमंडल की सहमति के बड़ी-बड़ी घोषणाएं की हैं जिनके वित्तीय परिणाम गंभीर होते हैं। कई मुख्यमंत्रियों ने इस तरह की घोषणाएं करने के बाद मंत्रिमंडल की सहमति प्राप्त की है। मध्यप्रदेश में जब श्यामाचरण शुक्ल मुख्यमंत्री थे तब वे अनेक घोषणाएं बिना मंत्रीपरिषद की स्वीकृति के करते थे और बाद में उन घोषणाओं पर मंत्रीपरिषद की स्वीकृति प्राप्त करते थे। इससे मंत्रीपरिषद के सदस्यों ने अपना असंतोष भी जाहिर किया था। बाद के लगभग सभी मुख्यमंत्रियों ने भी ऐसा ही किया।
इस अनुभव के मद्देन•ार यह आवश्यक प्रतीत होता है कि सत्ता के मुखियाओं पर किसी न किसी प्रकार का वित्तीय अनुशासन लागू किया जाए। कम से कम एक ऐसी वित्तीय सीमा निर्धारित की जाए जिससे मुख्यमंत्री बिना मंत्रीपरिषद की स्वीकृति के कोई ऐसी घोषणा न करें जिसका प्रदेश के वित्तीय साधनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो।
वैसे यह कहना उचित नहीं होगा कि राजनीतिक पार्टियों द्वारा चुनाव के पूर्व दिए गए सभी आश्वासन जनहित में नहीं थे। जैसे जब से दो रुपए और एक रुपए प्रति किलो के भाव से चावल और गेहूं दिए जाने लगे उसके बाद से देश में भूख से लोगों के मरने की घटनाएं नहीं हो रही हैं। इसी तरह बच्चियों को नि:शुल्क साईकिल देने से उनकी शिक्षा में भागीदारी में बढ़ोतरी हुई है। बिहार का इस संबंध में अनुभव अत्यधिक सकारात्मक है।  इसी तरह किसानों का कर्ज माफ करने से उनके द्वारा आत्महत्या करने की घटनाओं में कमी आई है। रोजगार गारंटी संबंधी अनेक योजनाओं ने भी ग्रामीण इलाकों में सकारात्मक प्रभाव डाला है।
परंतु कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें नि:शुल्क लाभ आम आदमी को नहीं दिए जाने चाहिए। जैसे किसानों को पांच हार्स पॉवर तक की बिजली नि:शुल्क देना, झुग्गियों में निवास करने वाले लोगों को नि:शुल्क बिजली देना। इस तरह की नीतियों से बिजली के उत्पादन की क्षमता बढ़ाने में बाधाएं उत्पन्न हुई थीं। अभी उत्तरप्रदेश में जो चुनाव हो रहे हैं उनमें भी राजनीतिक पार्टियों ने अनापशनाप आश्वासन दिए हैं।
अंत में यह कहना प्रासंगिक होगा कि राजनीतिक पार्टियों को यह बताना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए कि वे जो भी आश्वासन दे रहे हैं उनके लिए वित्तीय साधन कहां से उपलब्ध कराए जाएंगे और इसके संबंध में उनकी स्पष्ट रणनीति क्या है। क्योंकि राज्य की आय के स्रोत सीमित हैं और उन स्रोतों के अंदर ही बहुत सारे काम राज्य सरकार को करने पड़ते हैं। यदि नि:शुल्क आश्वासन दिए जाएंगे तो राज्य सरकार को अपने बुनियादी उत्तरदायित्वों को पूरा करने में निश्चित रूप से बाधा पहुंचेगी। यदि भविष्य में संसद से लेकर पंचायत तक चुनाव एक साथ होने लगें तो इस तरह के आश्वासन चुनाव घोषणापत्र में देने की प्रवृत्ति पर काफी हद तक अंकुश लगेगा।


 

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