क्या वास्तव में काम के अवसर बढ़ेंगे?

शीतला सिंह : केन्द्र सरकार ने ऐलान किया है कि वह शीघ्र ही बम्पर भर्तियां करेगी। संख्या के लिहाज से ये भर्तियां 2.83 लाख आंकी जा रही हैं।...

शीतला सिंह

शीतला सिंह
केन्द्र सरकार ने ऐलान किया है कि वह शीघ्र ही बम्पर भर्तियां करेगी। संख्या के लिहाज से ये भर्तियां 2.83 लाख आंकी जा रही हैं। बजट अनुमान के अनुसार केन्द्र सरकार को 35.65 लाख कर्मचारियों की आवश्यकता है, जबकि इस समय आंकड़ों के अनुसार उनकी संख्या 32.84 लाख है। हम जानते हैं कि देश की जनसंख्या लगातार बढ़ रही है। साथ ही शिक्षा का अनुपात और उसके कारण बेकारी भी। ऐसे में सवाल है कि ये 2.83 लाख भर्तियां उस बेकारी की समस्या का कितना समाधान कर पायेंगी, जो देश की अर्थव्यवस्था को पटरी से उतारने और सामाजिक अपराधों को बढ़ाने में सहायक है? अगर ज्यादा नहीं तो इनसे वास्तविक लाभ क्या और कितना होगा? यही वह मूल प्रश्न है, जिस पर सरकार और व्यवस्था के संचालकों को गम्भीर रूप से सोचना होगा।
पुरानी घोषणाओं के अनुसार, केन्द्र सरकार की अपने कार्यरत कर्मचारियों की संख्या में दस प्रतिशत हर साल कमी करने की योजना है। इस योजना को कर्मचारियों की वर्तमान संख्या को ही आधार मानकर लागू किया जाये तो तीन लाख से ज्यादा कर्मचारी तो हर साल सेवामुक्त ही हो जायेंगे। तब 2.83 लाख की भर्ती का अर्थ यह होगा कि जितने कर्मचारी कम होंगे, उनकी भी पूर्ति नहीं हो पायेगी। तब सवाल होगा कि कमी वाले क्षेत्र कौन-कौन से होंगे और तब शिक्षित व अशिक्षित बेकारों का अनुपात कैसे कम होगा?
फिलहाल, सरकारी नौकरियों के अभ्यर्थियों की योग्यता, प्रतिभा व क्षमता आदि के मानक निर्धारित हैं।  प्रथम और द्वितीय श्रेणी की नौकरियों की भर्तियां प्रतिस्पर्धाओं पर आधारित हैं, जिनकी संख्या बहुत बड़ी नहीं है। ऐसे में भर्तियों के लाभों व उद्देश्यों में अशिक्षित बेकारों की संख्या घटाना शामिल होगा तो उनको खपाने के क्षेत्र भी बनाने होंगे। इस रूप में मनरेगा का नाम लिया जा सकता है, लेकिन उसका लाभ भी वर्ष में अधिकतम 100 दिन के लिए ही दिया जाता है और उसका लक्ष्य भी पूरा कर लिया गया है, इसका दावा अभी तक किसी सरकार ने नहीं किया है।
सवाल फिर वही है कि आर्थिक दृष्टि से सर्वाधिक पीडि़त और कमजोर तबके को मनरेगा के अलावा और कहां खपाया जा सकता है, खासकर जब तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों में भर्तियोंं की संभावनाएं भी सीमित हैं? सरकार और उससे अनुदानप्राप्त संस्थाओं में थोड़े पद हैं, तो उनके बारे में कहा गया है कि वे साक्षात्कार के आधार पर नहीं बल्कि स्कूल और कॉलेज के योग्यता प्रमाणपत्रों के आधार पर भरे जायेंगे। तृतीय श्रेणी की भर्तियां भी शिक्षित क्षेत्र को ही जाती हैं और चतुर्थ श्रेणी की भर्तियों के लिए भी आमतौर पर दर्जा आठ पास का मानक अपनाया जाता है।
इस प्रकार अशिक्षित बेरोजगारों के लिए निजी क्षेत्र ही बचा है, जिनमें सबसे अधिक अशिक्षित कृषि क्षेत्र में खपाए जाते हैं, लेकिन कृषि मजदूरों को साल में दो महीनों का भी काम नहीं मिल पाता। तो क्या यह मान लिया जाये कि भूखा रहना उनकी नियति है और उसमें कभी कोई बदलाव आता है तो वे उसे अपना सौभाग्य मान लें? कृषि क्षेत्र में किसान भी सबसे अधिक संख्या में अलाभकर जोतों वाले हैं, जिनकी क्षमता ही नहीं है कि वे मजदूर रख सकें।  सवा तीन एकड़ से अधिक जोत वालों को ‘छोटे किसान’ कहा जाता है, लेकिन उनमें भी रोजगार उपलब्ध कराने की क्षमता नहीं है। दस्तकारों की संख्या भी निरंतर घटती जा रही है क्योंकि अभिनवीकरण का दौर तेज हो रहा है और पुराने कौशल बेकार होते जा रहे हैं। यही कारण है कि सडक़ व नालों आदि के निर्माण और दूसरे इस प्रकार के काम शुरू होते हैं तो सब काम मशीनें ही करती हैं। वही गड्ढे बनाती हैं, मिट्टी उठाती हैं और बराबर करती हैं, ताकि काम समय पर पूरा हो सके। मशीनों के इस्तेमाल से कुछ ड्राइवर, क्लीनर व मिस्त्री आदि बढ़ सकते हैं और उन्हें लाभ हो सकता है, लेकिन वे बड़ी संख्या में लोगों को बेरोजगार ही बनाती हैं।
यह देखें कि रोजगार सृजन के क्षेत्र में कहां और किस रूप में परिवर्तन हो रहे हैं, तो आधुनिकीकरण को युग की आवश्यकता बताया जाता है, जिसके चलते लोगों में शिक्षा की ललक पैदा हुई है और स्कूल-कॉलेजों व विश्वविद्यालयों की संख्या और उनमें दाखिलों का अनुपात बढ़ा है, लेकिन क्या कारण है कि ये संस्थाएं भी बेरोजगार पैदा करने वाली मशीनें हो रही हैं और जो युवावर्ग इनसे निकल रहा है वह ‘न घर का न घाट वाला’ हो गया है। क्योंकि मेहनत-मशक्कत का या मोटा काम करने की उसकी इच्छा ही नहीं है। नौकरी की इच्छा तो बड़ी है लेकिन नियुक्ति मिल जाने पर वह उस काम में भी रुचि नहीं लेता। पिछले दिनों सफाई मजदूरों की भर्ती में स्नातक भी शामिल हुए, लेकिन नियुक्ति के बाद वे अपना निर्धारित काम उस क्षेत्र के अशिक्षित बेरोजगारों से कम पैसा देकर करा रहे हैं। ऐसे में यह कैसे मान लिया जाये कि जो नियुक्तियां हो रही हैं, काम की प्रकृति के प्रति अभ्यर्थियों की इच्छा का परिणाम है? यह तो सिद्ध ही नहीं हो पा रहा। इस क्षेत्र में जो लोग पहले से कार्यरत थे, उनके बच्चे नये क्षेत्रों में काम के अवसर तलाशते हैं, क्योंकि यह सामाजिक सम्मान वाले क्षेत्र नहीं थे। इसी प्रकार कोई काम छोटा नहीं इसे करना राष्ट्रीय आवश्यकता है यह भावना पैदा ही नहीं हो पा रही है।
अब चुनावों या राजनीतिक लाभ पाने के दूसरे अवसरों पर बेकारों की संख्या घटाने पर चर्चा होगी ही, लेकिन है कोई बताने वाला कि इनको खपाने के क्षेत्र कहां-कहां बढ़ सकते हैं? शत प्रतिशत शिक्षा का लक्ष्य पूरा हो जाये और साथ ही देश का अभिनवीकरण व मशीनीकरण भी पूर्ण हो जाये तो क्या बेकार कम होंगे? जवाब है-नहीं, वे तो बढं़ेगे ही। ऐसे में यह पूछा जाना और जरूरी है कि यदि इससे नयी समस्याएं और अव्यवस्थाएं पैदा हो रही हैं तो कौन-सी नयी समाज व्यवस्था अपनाएं जिससे काम के अवसर बढ़ सकें? अभी स्वीकार्य योजनाएं तो यही बताती हैं कि नये बाबू वर्ग का विस्तार हो रहा है और कामचोरी, घूस, बेईमानी, दगाबाजी, शोषण व अन्याय उसके गुण के रूप में दिख रहे हैं।  हमने भूमंडलीकरण की जो नयी योजना स्वीकार की है, उससे पिछड़े क्षेत्र में वही उभर रहे हैं, जो पूंजी के बल पर अपना आर्थिक विस्तार कर सके। इस प्रकार के पूंजीविनियोजन का सामाजिक उत्थान का कोई लक्ष्य भी नहीं दिखाई देता और इसकी मार्फत वैयक्तिक और संस्थागत लाभ की ओर बढऩे के प्रयत्न ही चारों ओर दिखते हैं।
ऐसे में समाज का भावी स्वरूप क्या होगा? विचार करें तो यह संकट तो उन देशों में भी है जो मशीनों की मार्फत तीव्र आर्थिक विकास कर चुके हैं और जिनसे सकल विश्व कई रूपों में प्रभावित है। हमें देखना होगा कि उनका समाज, उसकी आवश्यकताएं, प्रकृति, संस्कृति और पूंजी, जो नये भगवान का स्थान ले रही हंै, हमारी व्यवस्थाओं को किस रूप में प्रभावित कर रही है? गुण और मूल्य शाश्वत नहीं हो सकते, लेकिन यह तो देखना होगा कि उनका नया स्वरूप हमें कितना लाभ पहुंचा पा रहा है?
इस प्रकार केन्द्र की बम्पर भर्ती की घोषणा सच पूछिए तो हमें भुलावे में ही डालने वाली है। इससे यह नहीं माना जा सकता कि हमें वास्तव में समाज में काम के अवसर और समस्त मानव के सुख जीवन की सम्भावनाओं में विस्तार हो रहा है। वास्तव में यह आंकड़ों का भरमाने वाला खेल ही है।


 

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