प्रधानमंत्री की भाषा, शब्द और उनके अर्थ-अनर्थ

शीतला सिंह : उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के सात चरणों में से तीन पूरे हो चुके हैं। इसमें एक-दूजे से आगे निकलने की कोशिश कर रही राजनीतिक पार्टियां स्वाभाविक ही अपना लक्ष्य पाने के लिए ...

शीतला सिंह

शीतला सिंह
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के सात चरणों में से तीन पूरे हो चुके हैं। इसमें एक-दूजे से आगे निकलने की कोशिश कर रही राजनीतिक पार्टियां स्वाभाविक ही अपना लक्ष्य पाने के लिए मतगणना के पूर्व ही अनुकूलित आंकड़े प्रस्तुत कर अपनी जीत और विरोधियों की हार की उद्घोषणाएं कर रही हैं। लेकिन इसी क्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषणों में जैसी भाषा, शब्दों, वाक्यों और मुहावरों का प्रयोग आरम्भ किया है, उन्हें लेकर प्रतिद्वंद्वी दल आपत्ति व प्रश्न उठाकर उसे विचारार्थ चुनाव आयोग को सौंपने की बात भी कर रहे हैं। स्थिति यहां तक आ गई है कि वे इसे मोदी की राजनीतिक बौखलाहट बताकर उन पर अपनी पार्टी के लिए अच्छे परिणामों हेतु वातावरण को साम्प्रदायिक बनाने का आरोप लगा रहे हैं। वैसे प्रधानमंत्री ने अपने चुनावी भाषणों में हिन्दू-मुस्लिम हित व समर्थन के बीच भेद करना आरम्भ किया तो कई निष्पक्ष प्रेक्षकों तक के दिलोदिमाग में सवाल उठे कि संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेकर देश के सर्वोच्च पद पर विद्यमान ये शख्स इन शब्दों के निहितार्थों, साथ ही जाति व धर्म के आधार पर वोट न मांगने के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश को भूल गया है या अपने राजनीतिक हितों के लिए उसका जानबूझकर ऐसा करना आवश्यक हो गया है?
जहां तक साम्प्रदायिकता व धर्मनिरपेक्षता की बात है, इन्हें हिन्दू और मुस्लिम हितों के आधार पर परिभाषित नहीं किया जा सकता है। न ही इस दृष्टि से इनकी पहचान ही संभव है। लेकिन इससे इस सवाल की धार कम नहीं होती कि क्या देश की गरिमा व सम्मान की रक्षा धार्मिक मान्यताओं के समर्थन या उनकी आलोचना से संभव है? उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर राजनीतिक दलों की पहचान व विवेचना की जाये या न्यायिक अवधारणाओं के परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो महात्मा गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे ने भी अपने कृत्य के औचित्य को व्याख्यायित व प्रतिपादित किया था, लेकिन अदालत तथा जनता ने उसे स्वीकार नहीं किया।
फिर हिन्दू हित आखिर क्या है और क्या उसे किसी निष्पक्ष संवैधानिक संस्थान या न्यायपालिका ने व्याख्यायित किया है? जनप्रतिनिधित्व कानून के निर्माण के समय संसद ने उस पर विचार किया हो और मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद भी आज तक उसे परिवर्तित करने की आवश्यकता न समझी हो तो मानना पड़ेगा कि उन्हें उस पर कोई आपत्ति नहीं। भारतीय संविधान में धर्म और मान्यता की रक्षा की बात तो की गई है और उन्हें मानने वालों को इस कार्य के लिए संस्थाएं बनाने का अधिकार भी दिया गया है। इसलिए जाति व धर्म को समाज से पृथक नहीं किया जा सकता, लेकिन जब वे वैयक्तिक कार्यों से परे समाज रचना के क्रम में प्रयुक्त हों, तो अवश्य ही उन्हें रोकने की व्यवस्था की गई है। ऐसे में जब इन्हें जनप्रतिनिधित्व कानून में प्रतिसिद्ध की श्रेणी में रखा गया है और हो रहे चुनाव के दौरान आचार संहिताओं के माध्यम से इनका इस्तेमाल रोका गया हो तो सार्वजनिक मंचों से उनसे जुड़े उछालना क्या व्यवस्था के विपरीत आचरण की श्रेणी में नहीं आता?
जरा सोचिए कि प्रधानमंत्री द्वारा कहा गया है कि यदि किसी सरकार द्वारा कब्रिस्तान के लिए भूमि की व्यवस्था की जाती है तो श्मशान के लिए भी करनी होगी। लेकिन वास्तविकता यह है कि सरकारी अभिलेखों में कब्रिस्तान और शमशान की भूमि में परिवर्तन का अधिकार निर्धारित प्रक्रिया के माध्यम से ही इस्तेमाल हो सकता है। कब्रिस्तान और शमसान की प्रकृति में कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता, लेकिन जो लोग अन्तिम संस्कार के तौर पर शवों को जलाने के लिए शमसानों का प्रयोग करते हैं, वे ही गंगा और अन्य नदियों में शवों को प्रवाहित भी करते हैं, जिसे परम्परा मानकर रोका नहीं जा सकता। वे समाधियां भी बनाते हैं, लेकिन उन्हें कब्रगाह नहीं कहा जाता। न उनका उपयोग कोई अन्य व्यक्ति ही कर पाता है। जाहिर है कि कब्रिस्तान या शमसान के चयन का प्रश्न जब भी और जैसे भी आये, उसका निर्धारित प्रणाली के अनुसार किया गया हल ही वैध या उचित होगा।
फिर यह बात भी समझ में नहीं आती कि जब मोदी कहते हैं कि तीसरे चक्र के मतदान के बाद हताश विरोधियों की भाषा व स्वर बदल गये हैं क्योंकि वे समझ गये हैं कि भाजपा चुनाव  मैदान में सबसे आगे निकल गई है, तो आगे के चरणों के मतदाताओं के संदर्भ में उन्हें ऐसे शब्दों के प्रयोग की क्या आवश्यकता थी? वे अखिलेश के थीम-सांग ‘काम बोलता है’ का मजाक उड़ाते हुए ‘कारनामे बोलते हैं’ का जुमला उछालते या उनके कार्यों को हरकत बताते हैं तो यह तो नहीं कहा जा सकता कि जानते ही नहीं कि ‘कारनामे’ और ‘हरकत’ उनके काम के सम्मानजनक पर्याय के रूप में प्रयुक्त नहीं होते और आलोचना व निन्दा के लिए ही प्रयुक्त होते हैं। साफ है कि यह प्रधानमंत्री द्वारा इन शब्दों का उदारतापूर्वक किया गया प्रयोग नहीं है, निन्दात्मक दृष्टि से किया गया उच्चारण ही है।
चुनाव में किसी पक्ष की जीत और किसी की हार लोकतंत्र के गुणों का ही परिणाम है। जनता इसका प्रयोग भी अपने विचारों एवं भावों के अनुसार करती रही है। यही कारण है कि जब उसकी इच्छा होती है, वह देश की प्रधानमंत्री और उनके बेटे को भी हरा देती  है। वे इस हार को स्वीकार भी करते हैं। प्रधानमंत्री के रूप में संसद में प्रस्तुत विश्वास प्रस्ताव पर एक वोट से हारकर अटल बिहारी वाजपेयी इस्तीफा देते हैं तो इसे उनके द्वारा लोकतांत्रिक व्यवस्था का सम्मान ही कहा जाता है। ऐसे में कहने की जरूरत नहीं कि चुनाव में जीत-हार जनता के अधिकारों के प्रयोग के अधीन है, जिसको लेकर सहमत या असहमत होने का कोई अर्थ नहीं है। जनता द्वारा जिस मतदान प्रक्रिया द्वारा अपने इस अधिकार का प्रयोग किया जाता है, उसमें उच्च शिक्षासीन से लेकर वे निरक्षर मतदाता तक भी शामिल होते हैं, कुछ लोग जिन्हें मूढ़ और कम समझ वाला बताते हैं। लेकिन लोकतंत्र में उनके मतों को भी बराबर ही रखा गया है, कम या ज्यादा नहीं।
जाहिर है कि चुनावी व्यवस्था में मतदान प्रक्रिया का प्रयोग होता रहेगा लेकिन जब श्रेष्ठ पदों पर आसीन लोग अपने हितों के लिए इस तरह नीचे उतरने लगते हैं, तो उनके भविष्य के व्यवहार को लेकर आशंकाएं उठती हैं। सबके साथ, सबके हित और सबके विकास का कोई विरोधी नहीं हो सकता, क्योंकि यह भेदभाव पर आधारित नहीं है, लेकिन इसकी परिभाषाएं और व्याख्याएं यहीं नहीं रुक जाने वाली, वे आगे भी होती रहेंगी। इस सिलसिले में आलोचना का विषय प्रधानमंत्री के रूप में मोदी की संवैधानिक स्थिति को लेकर और गंभीर हो जाता है। सवाल है कि यदि प्रधानमंत्री भी निम्न राजनीतिक स्वार्थों से ग्रस्त होगा तो क्या उसका व्यवहार सर्वमान्य, सर्वसुखदायी या सर्वजन सुखाय का पर्यायवाची होगा? जवाब है-नहीं। इसलिए उनके द्वारा प्रयुक्त अवांछनीय व अनुचित शब्दों पर आपत्तियां होंगी ही क्योंकि स्थितियों से जन्मी बौखलाहट किसी समस्या का समाधान नहीं होती। चुनाव को साम्प्रदायिक मुद्दों पर आधारित कर उनके आधार पर मतदाताओं के ध्रुवीकरण की कोशिश के रूप में भी इसे अस्वीकार ही करना होगा।


देशबंधु से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.

शीतला सिंह के आलेख