पेड न्यूज का नियमन और नियंत्रण कैसे हो?

शीतला सिंह : पेड न्यूज और उसके द्वारा पैदा की जा रही विडम्बनाओं से मुक्ति की चाहे जितनी चिंता की जाये, संसद की सामूहिक इच्छाशक्ति पर आधारित विधि-निर्माण के बिना इनसे मुक्ति सम्भव नहीं है।...

शीतला सिंह

शीतला सिंह
पेड न्यूज और उसके द्वारा पैदा की जा रही विडम्बनाओं से मुक्ति की चाहे जितनी  चिंता की जाये, संसद की सामूहिक इच्छाशक्ति पर आधारित विधि-निर्माण के बिना इनसे मुक्ति सम्भव नहीं है। दु:ख की बात है कि अभी तक इस सम्बन्ध में कोई नया प्रयास ही नहीं हुआ है और न ही इस बात को समझने की ईमानदार कोशिश हो रही है कि पत्रकारिता का स्तर बनाये रखने और मर्यादाएं निर्धारित करने का कोई भी प्रयास तब तक निरर्थक होगा, जब तक वह निर्णायक स्थिति न ले पाये।
 प्रेस काउंसिल आफ इण्डिया का गठन प्रथम प्रेस आयोग की संस्तुतियों पर आधारित था। ऐसी काउंसिलें भारत में नहीं बल्कि कई अन्य देशों में भी हैं और वहां के कानून से आधार पर कार्यरत हैं। लेकिन पत्रकारिता के भावी स्वरूप को लेकर जिस चिंता की अभिव्यक्ति प्रथम प्रेस आयोग के गठन के वक्त या उसकी रिपोर्ट में हुई थी, चूंकि तब तक पत्रकारिता की इलेक्ट्रॉनिक विधा अस्तित्व में ही नहीं आ सकी थी,  केवल छपे माध्यमों तक सीमित रह गयी। लेकिन आज विज्ञान और टेक्नालाजी के विस्तार के फलस्वरूप जानकारियां देने व प्रस्तुत करने के माध्यमों में छपे हुए समाचार पत्र इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के बाद द्वितीय स्थान पर हैं। पहले भी माना जाता था कि एक स्टिल फोटो का प्रभाव एक हजार शब्दों के बराबर होता है। अब जब वह टीवी चैनलों पर सचल और सवाक भी हो गया है तो उसके प्रभाव में वृद्धि का सहज ही अनुमान लगा सकते हैं। फोटो बोलने लगता है तो स्वाभाविक ही उसके शब्द उसकी शक्ति बढ़ा देते हैं।
 लेकिन अभी जिसे हम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कहते हैं और जिसमें आकाशवाणी व दूरदर्शन आदि शामिल हैं, वह वही भूमिका निभाता है, जो सिनेमा घर फिल्मों को प्रदर्शित करके निभाते थे। अलबत्ता, अब इस मीडिया का क्षेत्र खासा बढ़ गया है और टीवी के नाम से दुकानों व कार्यालयों के साथ घरों व ड्राइंग रूमों आदि तक पहुंच चुका है। एक ओर उसमें नयी-नयी तकनीकों का समावेश हो रहा है तो दूसरी ओर उसके स्वरूपों में भी वृद्धि हुई है। जिसे हम मोबाइल कहते हैं, उसके माध्यम से इसका क्षेत्र बहुविस्तारित हो गया है। इसका एक रूप सोशल मीडिया का भी है। मोबाइल फोन करने और तस्वीरें  खींचने के अलावा वीडियो आडियो के आदान-प्रदान का माध्यम भी बन रहा है।
इस सिलसिले में उचित व स्वाभाविक नयी सोच यही हो सकती है कि संवाद माध्यमों का प्रयोग जैसे भी हो, प्रस्तुति में उनकी स्वतंत्रता बनी रहे और व्यवस्थापिका द्वारा उनका नियमन ऐसा हो कि वे लाभ कमाऊ माध्यम न बन सकें। हम जानते हैं कि संसद द्वारा बनाये गये चुनाव कानून में धन के माध्यम से मतदाताओं को अनुचित रूप से प्रभावित करने पर रोक है। उत्तर प्रदेश में एक समाचारपत्र में छपी पेड न्यूज को मतदाताओं को प्रभावित करने का ऐसा ही प्रयास मानकर उसके दोषी एक विधायक की विधानसभा की सदस्यता समाप्त की जा चुकी है, लेकिन इस प्रवृत्ति से मुक्ति का तरीका नहीं ढूंढा जा सका है।
जहां तक इलेक्ट्रॉनिक संवाद माध्यमों का सम्बन्ध है, चुनाव पद्धति को निष्पक्ष बनाए रखने तथा उसे दूषित करने में इन माध्यमों का दुरुपयोग न होने देने का प्रश्न कई बार चर्चा और विचार का विषय बन चुका है, लेकिन अभी तक इन माध्यमों के लिए प्रेस काउंसिल जैसी नियामक संस्था का जन्म नहीं हो पाया है। इस सिलसिले में एक सुझाव यह भी आया था कि संसद के इस सम्बन्धी पुराने कानून में संशोधन कर इन माध्यमों के संचालकों, नियामकों और प्रतिनिधियों को भी उसके दायरे में लाया जाये। नये कानूनी प्रावधान से यह कार्य किया जा सकता है। सवाल है कि यह संभव कैसे हो? देश में कानून बनाने का अधिकार निर्वाचित जनप्रतिनिधियों वाले संस्थानों को ही है। विधानसभाएं इस बड़े काम को नहीं कर सकतीं और संसद में यह अभी तक विचारणीय विषय ही नहीं बन सका है क्योंकि उसका स्वरूप व दिशा ही तय नहीं हो पाई।
यह स्थिति बनी रहे तो क्या जनप्रतिनिधित्व कानून के उन प्रावधानों की रक्षा हो सकती है, जो चुनाव प्रक्रिया को दूषित होने से रोकने के लिए बनाये गये हैं? इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोग कहते हैं कि उन्होंने अपने स्वनियमन के लिए एक संस्था बना रखी है। लेकिन इस संस्था के सदस्यों की संख्या अत्यन्त ही न्यून है और उसे किसी को बुलाने के लिए नोटिस देने या सुनवाई के लिए बाध्य करने का अधिकार नहीं मिला है। ऐसे में वे इस मीडिया के छोटे से सहमत वर्ग के लिए कोई भी व्यवस्था बना लें, उसे संवैधानिक प्रावधान के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
कई लोग कहते हैं कि अब ये माध्यम इतने प्रभावशाली हो गए हैं कि कानून बनाने वालों में भी इन्हें लेकर भयग्रस्तता विद्यमान है। अगर यह सच है तो इस सवाल को और जटिल होना ही है कि जिन दोषों की खोज व निराकरण के लिए प्रेस आयोग चिंतित था, उनका निवारण मीडिया के इस क्षेत्र में कौन करेगा? यह भी कि इन माध्यमों में समाचार, विचार और कार्टून या मनोरंजन के रूप में जो कुछ प्रस्तुत किया जा रहा है, उसके निर्धारण का आधार या मानक क्या होगा? क्या इस बाबत अंग्रेजों द्वारा बनाई गई दण्ड प्रक्रिया संहिता ही निर्णयकारी की स्थिति में रहेगी? हो भी तो उसके तहत किसी को सजा तो दी सकती है लेकिन अनुकूल स्थितियां पैदा नहीं की जा सकतीं।
फिलहाल, इस स्थिति के लिए जनता को नहीं राज्य को ही दोषी माना जाएगा। क्योंकि राज्य की तीन प्रमुख शक्तियों-कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका हैं, उन्होंने अपनी विधायी शक्ति का प्रयोग इस प्रयोजन के लिए किया ही नहीं। इसलिए यह मीडिया अपनी परम स्वतंत्र भूमिका निभा रहा है और जो उस पर आपत्ति करने वाले हैं, उनके सामने यही विकल्प है कि वे कानूनी प्रक्रिया के लिए अदालत पहुंचने हेतु मामले दर्ज करायें या स्वयं ही वहां ले जाएं। यह सवाल फिर भी अनुत्तरित रह जाता है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्षेत्र में किस प्रकार के अपराध हो रहे हैं, यह कौन देखेगा? इस सवाल का जवाब दिया जाना इसलिए भी जरूरी है कि मीडिया के इलेक्ट्रॉनिक चैनलों के संचालन के लिए भारी पूंजी नियोजन की आवश्यकता पड़ती है। ऐसा एक चैनल लगभग 6 हजार करोड़ के संसाधनों की मांग करता है। इसे कुछ कम भी किया जाये तो यह कितने लोगों की सामथ्र्य की सीमा में आएगा? तो क्या हाथ पर हाथ धरे प्रतीक्षा की जाये कि वैश्वीकरण के इस दौर में और विदेशी कम्पनियां और लाभ के लिए इन माध्यमों की स्थापना के और-और प्रयोग करें?
जो भी हो, प्रयोग व संचालन की स्वतंत्रता के साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दूषित प्रभावों से भी मुक्त रहे, इसका रास्ता निकालना ही पड़ेगा। यह काम लोकतंत्र में संसद को ही करना है। उसका ध्यान कब इसकी ओर जाएगा, यही मुख्य चिन्ता का विषय है।


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