कैशलेस व्यवस्था का लाभ किन्हें और कैसे?

शीतला सिंह : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस कैशलेस व्यवस्था के लिए आतुर हैं और दावा कर रहे हैं कि वह भ्रष्टाचार व कालेधन समेत हमारे सारे दुखों को समाप्त करने वाली सिद्ध होगी, ...

शीतला सिंह
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस कैशलेस व्यवस्था के लिए आतुर हैं और दावा कर रहे हैं कि वह भ्रष्टाचार व कालेधन समेत हमारे सारे दुखों को समाप्त करने वाली सिद्ध होगी, उसमें पहला व्यवधान तमिलनाडु पेट्रोलियम डीलर्स ऐसोसियेशन की ओर से आया, जब उसने अपने सभी सदस्य पेट्रोल पम्पों को निर्देश दिया कि वे 8 जनवरी को आधी रात के बाद किसी बैंक के डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड या भुगतान की अन्य डिजिटलीकृत प्रणालियों के तहत पेट्रोल-डीजल न बेचें। ऐसे में पेट्रोलियम पदार्थों की खरीद केवल कैश भुगतान से ही हो पाती। सरकार हस्तक्षेप न करती तो यह स्थिति विभिन्न राज्यों में फैलती हुई देशव्यापी हो जाने का अंदेशा था क्योंकि जिन यह बैंकों या कि सरकार की ओर से इस घोषणा के बाद पैदा हुई थी कि पम्पों पर क्रेडिट या डेबिट कार्ड वगैरह से भुगतान पर मर्चेन्ट डिस्काउन्ट रेट (एमडीआर) से एक प्रतिशत कर लगेगा, जिसे पेट्रो डीलरों को वहन करना होगा। गनीमत थी कि इन डीलरों ने इसे अपने मुनाफे पर अंकुश लगाने की व्यवस्था मानकर प्रतिरोध शुरू किया तो सरकार ने बिना देर किये घोषणा कर दी कि एक प्रतिशत की उक्त प्रस्तावित कटौती अब नहीं होगी।
फिलहाल, मुद्रा के इतिहास, लेन-देन में भूमिका और स्वरूप पर विचार करें तो यह इसलिए अस्तित्व में आयी जब बाजार अस्तित्व में आ रहा था और लेनदेन के सर्वस्वीकार्य साधन की जरूरत थी। स्वीकार्यता के ही लिहाज से प्राचीन मुद्रा सोने या चांदी की ही थी और उसे देकर कोई भी वस्तु खरीदी जा सकती थी। तब उसकी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए सरकार की गारंटी या उसकी एजेंसी से मान्यता भले ही दिलायी गई हो, वास्तव में यह उसका अपना मूल्य था, जिसकी एवज में सामान खरीदा जा सकता था। इसी प्रकार वस्तुओं के मूल्य भी उनकी उपयोगिता पर आधारित थे। यानी आपके हाथ में सोने या चंादी की जो मुद्रा थी, उन मानकों के अनुसार थी और उसे लेकर चिंतित होने की जरूरत नहीं थी।
 आगे चलकर मुद्रा में राज्य का हस्तक्षेप बढ़ा तो उसका मूल्य राज्य की साख पर छोड़ दिया गया, जिसे जनता ने भी स्वीकार कर लिया। लेकिन नयी व्यवस्था में नोट, जो प्रोनोट का संक्षिप्त रूप हैं, अमल में आये और मुद्रा कागजी बन गयी तो उस पर यह उल्लेख ही काफ ी हो गया कि ‘हम धारक को उस पर उल्लिखित मूल्य देने का वादा करते हैं।’ कागज की यह मुद्रा सरकार के अमान्य करते ही रद्दी कागज का टुकड़ा भर हो जाती है।
 राज्य के पास अधिकार है कि वह प्रचलित नोटों को कभी भी कागज के टुकड़ों में बदल सकता और वैकल्पिक व्यवस्था कर सकता है। उसके इस अधिकार की पृष्ठभूमि यह है कि समाज के विकास के साथ वन व खेती पर आधारित व्यवस्था के बाद कल-कारखानों का जन्म हुआ तो मुद्रा को किसी ऐसे मध्यस्थ की जरूरत थी जो उसका संरक्षण करे, ब्याज पर ले और दे भी। इस प्रकार बैंकिंग व्यवस्था अस्तित्व में आयी, विस्तारित होती गयी और अब डिजिटाइजेशन तक जा पहुंची है।
जिसे प्रधानमंत्री कैशलेस व्यवस्था बताते हैं, वह भी बिना माध्यमों के सम्भव नहीं है। उसका नियमन और नियंत्रण उपभोक्ता या उपयोगकर्ता के पास नहीं बल्कि मध्यवर्तियों के पास ही होता है। वही उसका स्वरूप, यानी भुगतान करने या पाने के तरीके भी तय करते हैं। ऐसे में  मध्यवर्ती, जिसे बैंक कहते हैं, अति महत्वपूर्ण बन गये हैं। उनके नियमन के लिए सरकार ने रिजर्व बैंक जैसी संस्था बना रखी है, जो उनके अधिकार, दायित्व व स्वरूप तय करता है। नोटों का प्रमाणीकरण और गारंटी भी अब रिजर्व बैंक के ही पास है। केवल सिक्के और एक रुपये के नोट ही सरकार द्वारा प्रचालित हैं। एक रुपये के नोट पर वित्त सचिव के हस्ताक्षर बिना किसी उद्धरण के होते हैं, इसलिए वे राज्य की साख व विवेक पर आधारित होते हैं। राज्य अपने अधिकारों का प्रयोग करके उनकी स्वीकार्यता की गारंटी देता है और अस्वीकार करने वालों को दण्ड देने का अधिकार भी उसे है। कहीं राज्य मुद्रा प्रसार की स्थिति को असंतुलित न कर दें, इसलिए राज्य पर जनप्रतिनिधियों द्वारा निर्वाचित संसद का नियंत्रण है।
सवाल है कि जिस कैशलेस व्यवस्था की बात हो रही है, उस पर किसका नियंत्रण होगा? अब सारे बैंक राज्य द्वारा संचालित नहीं बल्कि वे निजी क्षेत्र में भी है। वे भारतीय रिजर्व बैंक के लाइसेंस पर निर्भर करते हैं जो सभी वित्तीय संस्थाओं के लिए आवश्यक हैं। बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया तो प्रमुख विचारणीय प्रश्न यही था कि इन्हें सार्वजनिक नियंत्रण में होना चाहिए। मनमानी करके लाभ उठाने के बजाय इन्हें रिजर्व बैंक के नियमों को भी मानना चाहिए। ब्रिटिश सरकार द्वारा 1911 में कोआपरेटिव एक्ट बनाया गया था, जिसके तहत सहकारी बैंक स्थापित हुए। अब उन्हें भी रिजर्व बैंक ही अपनी शर्तों के अनुसार लाइसेंस देता है। लेकिन अब निजी क्षेत्र का वर्चस्व कुछ ज्यादा ही बढ़ता जा रहा है।
   अब दावा है कि कैशलेस व्यवस्था का नियमन और नियंत्रण भी रिजर्व बैंक की शर्तों के अनुसार ही होगा, जिसे स्वशासी बनाया गया है, की शर्तो के अनुसार होगा। लेकिन जिनके पास यह माध्यम हैं, उन्होंने उन्हें घाटा उठाने के लिए नहीं बल्कि लाभ कमाने के लिए बनाया हैं। इनके पीछे प्रतिस्पर्धा भी है, जो सुविधाओं के विस्तार में सहायक होती है। लेकिन बड़ा मुद्दा व्यवस्था पर प्रभुत्व और वर्चस्व का है क्योंकि उन्हें स्वार्थमुक्त सेवा नहीं कहा जा सकता। तभी तो यह लाभ कमाने वाले माध्यम अवसरों के अनुसार सुविधाओं, नियंत्रण और शर्तों की व्यवस्था करते हैं। जैसे अभी हाल में ही रिलायंस ग्रुप ने 6 महीने तक बिना किसी भुगतान के ऐसे स्मार्ट फोन की व्यवस्था की जो आपको मुफ्त में बात भी करायेगा और डाटा भी प्रदान करेगा। लेकिन जानने की बात यह है कि इस मुफ्त के पीछे क्या है? इतना घाटा सहकर कौन सा दूसरा लाभ उठाया जा रहा है?
  व्यावसायिक दृष्टि से देखें तो अपने व्यवसाय में आप नियंत्रक व निर्णायक बन सकें, इसके लिए प्रतिस्पर्धियों को समाप्त या कम करना करना आवश्यक माना जाता है। इसके लिए ‘सस्टेनिंग कैपासिटी’ का प्रयोग भी खूब होता है क्योंकि प्रतिस्पर्धा समाप्त हो जाने पर एकाधिकार बन जाता है और उसका लाभ उसी को मिलता है, जो जिन्दा हैं।
    इस लिहाज से देखें तो कैशलेस व्यवस्था के जितने भी माध्यम मौजूद हैं, उनके नियंत्रकों में बड़े पैमाने पर विदेशी हैं। उदाहरण के लिए पेटीएम चीन की अलीबाबा कम्पनी द्वारा निर्मित है। हम उस देश से कितनी भी घृणा करें, इस व्यवस्था को चलायेंगे, तो लाभ किसे मिलेगा, आसानी से समझा जा सकता है। अन्य देश भी ऐसे माध्यमों के विकास व विस्तार में जुटे हैं। भारत सरकार भी उन्हें इस आधार पर प्रोत्साहित कर रही है कि वे राष्ट्रीय लाभ में सहायक होंगे। मगर उसे यह नहीं मानना चाहिए कि विदेशी पूंजी के नियंता भारत के हितैषी के रूप में मदद के लिए आ रहे हैं। वे इस देश में इस व्यवस्था को अपने लाभ के लिए ही ललचा रहे हैं,  पूर्ण उपयोग से सम्पूर्ण लाभ की मेजिल तक पहुंचने के लिए। सरकार सहयोगी बन जायेगी तो अन्तत: लाभ भी उन्हीं को होना है।
   विडम्बना यह कि सरकार इस तर्क को निरर्थक बता रही है कि हमारे हाथ में जो पूंजी है, उसे खर्च करने का अधिकार भी हमारा ही होना चाहिए। जाहिर है कि कैशलेस व्यवस्था वास्तव में विदेशी पूंजी व कारोबार को संरक्षण व लाभ पहुंचाने का प्रयत्न है, जिससे व्यक्ति अंतत: इतना मजबूर हो जायेगा कि अपने पैसे का ही अपनी इच्छा के अनुसार उपयोग नहीं कर सकेगा। हम देख ही रहे हैं कि कैशलेस व्यवस्था में लाभ के नये प्रयोग सरकार की भागीदारी के साथ आरम्भ किए गए हैं। वे चेतावनी मात्र हैं कि भविष्य में ये माध्यम ही निर्णायक होंगे और इनका समग्र लाभ इनके मालिकों और संचालकों के खाते में विदेश ही जायेगा।


 

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