उत्तर प्रदेश- प्रश्न प्रदेश

प्रभाकर चौबे : उत्तर प्रदेश को ‘प्रश्न प्रदेश’ बना दिया गया। 2-3 माह से सब एक ही सवाल पूछ रहे हैं-क्या हो रहा है उत्तर प्रदेश में। लेकिन कोई उत्तर मिलता नहीं। ...

प्रभाकर चौबे

प्रभाकर चौबे
उत्तर प्रदेश को ‘प्रश्न प्रदेश’ बना दिया गया। 2-3 माह से सब एक ही सवाल पूछ रहे हैं-क्या हो रहा है उत्तर प्रदेश में। लेकिन कोई उत्तर मिलता नहीं। केवल प्रश्न ही पूछे जा रहे हैं। लोग कहते हैं- पता नहीं क्या होगा? उत्तर प्रदेश तो किसी जादूगर के करतब की तरह एक खेल दिखा रहा है। एक दिन शिवपाल सिंह हटाए जाते हैं। दूसरे दिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को ही खो कर दिया जाता है। तीसरे दिन रामपाल यादव उपस्थित होते हैं। चौथे दिन सपा के अध्यक्ष जिन्हें सब नेताजी कहते हैं, अध्यक्ष पद से हटा दिये जाते हैं। अगले दिन अखिलेश वापस यथास्थान रोप दिए जाते हैं और शिवपाल यादव जी भी जैसे थे, की मुद्रा में आ जाते हैं- जनता, केवल उत्तर प्रदेश की ही नहीं पूरे देश की, देखती है कि रामपाल यादव जी एकदम गायब कर दिये जाते हैं और फिर जादूगर की टोपी से निकले कबूतर की तरह फडफ़ड़ाते बाहर उपस्थित होते हैं। दर्शक केवल तालियां पीट रहे और पूछ रहे आगे क्या? मतलब उत्तर प्रदेश में केवल प्रश्न पूछे जा रहे- उत्तर कोई दे नहीं रहा। लगता है उत्तर प्रदेश को केन्द्र का ‘उत्तर न देने’ का महारोग ने जकड़ लिया है। क्या आज देश की राजनीति में उत्तर न देने का युग चल रहा है। केन्द्र की सरकार, सत्तारूढ़ पार्टी, उसके सहयोगी कहते हैं कि सवाल न करो। केवल मूकदर्शक बने सब देखते रहो। यह राजनीति में जादूगरों के करतब का युग है- करतब देखते समय कोई सवाल नहीं पूछा जाता केवल देखते रहना पड़ता है। जादू के खेल में जादूगर के ट्रिक देखिए और तालियां पीटिए। केन्द्र सरकार की जादूगरी देखो, ताली पीटो। देखो कि 1000 का 500 का नोट कैसे अचानक एक रात चलन से बाहर कर दिया जाता है और उसके बदले दूसरा नोट लेने जनता भटकती है। यह जादू है। कैसे  हुआ? क्यों हुआ? यह मत पूछो; मत सवाल करो, देखो और तालियां बजाओ कि वाह हमारी सरकार कितनी बड़ी जादूगर है कि एक ही आवाज में इतने नोट गायब कर देती है। जिसे कालाधन कह रहे हैं वह अभी चलकर इधर आएगा... जो इस करतब का विरोध कर रहे हैं वे देशद्रोही हैं, वे जादू जैसी कला का विरोध कर रहे। घोर कला विरोधी और नराधम है। नोटबंदी की माया के खेल की तरफ से जरा ध्यान हटाकर उत्तर प्रदेश में जो खेल चल रहा है उस तरफ दें। उत्तर प्रदेश में गजब का खेल चल रहा है और शायद 70 साल के देश के लोकतंत्र के इतिहास में पहली बार इस तरह का खेल चल रहा है। कौन, कब, क्यों हटा दिया जाता है और दूसरे ही क्षण फिर प्रकट करा दिया जाता है यह जादू समझ से परे है- राजनीति भी एक तरह से जादू का खेल ही है। अब यही लो कि कल फिर मीडिया में समाचार आया और तत्काल प्रश्न भी पूछा जाने लगा कि उत्तर प्रदेश में पिता-पुत्र मतलब मुलायम सिंह और अखिलेश के बीच एक घंटा पैंतालीस मिनट तक चर्चा हुई- अन्य कोई नहीं था। यह तो हुआ समाचार और तत्काल प्रश्न उठा दिया गया कि क्या कोई निष्कर्ष निकलेगा? सवाल यह है कि मीडिया यह सवाल कर किससे रहा था, खुद से, जनता से समाजवादी पार्टी से या मुलायम सिंह से अथवा अखिलेश से या अमर सिंह से या शिवपाल सिंह से या हो सकता है मीडिया हवा में ही प्रश्न उछाल रहा हो। आजकल हमारे देश का मीडिया केवल सवाल खड़ा करने के लिए प्रसिद्ध है, एक न्यू•ा चैनल तो यह कहता भी है हम तो पूछेंगे। ठीक है, मीडिया हो तो पूछो। लेकिन भाई मीडिया क्या जनता आपसे सवाल नहीं पूछ सकती। क्या जनता यह नहीं पूछ सकती कि एक ही घटना को क्या महीनों खींचते हो।
उत्तर प्रदेश में जो चल रहा है, वह रोचक है। लेकिन मीडिया ज्यादा रोचक बना रहा है। अरे भाई, इतने साल के लोकतंत्र में कुछ दलों में टूट-फूट हुई है, दलों में गदर मची रही- कोई आया, कोई गया, कई आते रहे, कई जाते रहे लेकिन एक ही दल में चल रहे घमासान पर इतने दिन मीडिया सक्रिय नहीं रहा। लगता है मीडिया भी कहीं न कहीं किसी न किसी का पक्षधर बन गया है। इतना पापुलर बना दिया समाजवादी पार्टी के कलह को कि क्रिकेट मैच हो। सुबह कोई फोन आता है- क्या चल रहा है उत्तर प्रदेश में? दोपहर को कोई पूछता है क्या कहा अखिलेश ने। शाम को फिर कोई पूछ लेता है- शिवपाल बने रहेंगे क्या अध्यक्ष? रात को दस बजे कोई पूछता है- अमर सिंह का क्या हो रहा... जैसे क्रिकेट में हर ओवर के बाद स्कोर पूछा जाता है।
भारतीय राजनीति में समाजवादी पार्टी शुरू से ही ‘कलह का घर’ रही है। टूटना-बिखरना समाजवादी पार्टी की तासीर है। वे अलग होने के लिए ही एक होते रहे हैं। डॉ. राम मनोहर लोहिया ने एक बार कहा था- ‘लेट देयर बी डिस आर्डर एंड आर्डर विल फालो...।’ अव्यवस्था पीछे-पीछे आयेगी। एक समय ऐसा भी आया कि अपनी पार्टी की कलह से ऊबकर या घबराकर एक-एक समाजवादी कांग्रेस में जाते रहे। डॉ. लोहिया ने ही संविद सरकार की परिकल्पना की, संविद सरकारें बनीं, लेकिन यह प्रयोग जल्दी ध्वस्त हो गया। डॉ. लोहिया पं. नेहरू के व्यामोह से जनता को उबारने के उपक्रम में लगे रहे, सफल नहीं हो पाए। बहरहाल समाजवादी पार्टी के टुकड़े होते चले गए। एक समय यह गीत ‘एक दिल के टुकड़े हजार हुए, कोई यहां गिरा कोई वहां गिरा...’ समाजवादी पार्टी के टूटने पर व्यंग्य में सुनाया जाता। लगता है समाजवादी ‘बेचैन आत्मा’ होते हैं। कभी चैन से नहीं बैठते। अगर सामने दुश्मन न दिखे तो आपस में ही लडऩे लगते हैं। वे कभी चैन से नहीं रह सकते।
अब उत्तर प्रदेश में क्या होगा? यही सवाल तो रोज पूछा जा रहा है। हर एक पूछ रहा है। लेकिन उत्तर किसी के पास नहीं। समाजवादी पार्टी के कलह से सबसे ज्यादा प्रसन्नता का अनुभव कौन सी पार्टी कर रही है- यह भी एक सवाल है लेकिन उत्तर भी कठिन है। कहावत है कि दो की लड़ाई में तीसरे का फायदा-तो बाप-बेटे की लड़ाई में कौन-सा दल फायदा उठा लेगा, यह भी एक सवाल है। मतलब उत्तर प्रदेश प्रश्न प्रदेश बन गया है और हर दिन वहां एक सवाल उठ खड़ा होता है।
ऐसी खबर है कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पार्टी के बीच चुनाव में गठबंधन होने वाला है, चुनावी समझौता होने वाला है। खबर यह भी है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ इस विषय पर चर्चा हो चुकी है और औपचारिक घोषणा बाकी है- शायद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ऐसा चाहते हैं, उनके प्रयास से ही यह हो रहा है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी चाहते हैं। कुछ दिन पूर्व अखिलेश यादव ने एक पत्रकार वार्ता में कहा भी था कि कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे तो 300 सीट मिलेगी। अगर कांग्रेस और समाजवदी पार्टी के बीच चुनाव में सीटों पर समझौता होता है तो यह हमारे देश की एक बड़ी घटना व रोचक घटना होगी क्योंकि आज तक कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच कभी भी चुनावी समझौता नहीं हुआ- यह अलग बात है कि समाजवादी पार्टी से लोग कांग्रेस में गए लेकिन दोनों दलों के बीच कभी चुनावी समझौता नहीं हुआ। समाजवादी पार्टी तो कांग्रेस की घोर विरोधी रही है- डॉ. लोहिया ने ही कांग्रेस विरोध का बीजारोपण किया था- वे कांग्रेस के कट्टर विरोधी रहे, वे पूरी तरह सोशल डेमोक्रेट थे। जयप्रकाश नारायण पं. नेहरू के इस तरह विरोधी नहीं रहे, जिस तरह डॉ. लोहिया रहे। एक और बात भारतीय राजनीति में समाजवादी पार्टी और वामपंथी दलों के बीच कभी भी चुनावी गठबंधन नहीं हुआ, हो भी नहीं सकता था। क्योंकि समाजवादी पार्टी की अंतरराष्ट्रीय स्थिति की समझ और उसकी नीति वामदलों से एकदम भिन्न रही। साथ ही गैरबराबरी दूर करने की लड़ाई की रणनीति को लेकर भी दोनों में खासा मतभेद रहा- समाजवादी पार्टी रोटी-बेटी का संबंध को जाति तोड़ो मंत्र मानती रही और दाम बांधो, खर्च की सीमा बांधो को ही गैरबराबरी दूर करने के उपाय के तौर पर अपनाती रही- वर्ग विभाजित समाज में गैरबराबरी पैदा होने के मूल कारण के प्रति समाजवादी पार्टी की दृष्टि बड़ी ही भ्रामक रही है। खैर इस पर लम्बी चर्चा की जा सकती है। वैसे अब समाजवादी पार्टी के नाम पर काम कर रही पार्टी का राजनीतिक एजेंडा ही अलग है पुराना वैचारिक आधार भी खत्म हो गया है। उत्तर प्रदेश में क्या होगा, यह जल्द पता चल जाएगा लेकिन मुलायम सिंह को भाजपा कितनी हवा दे रही यह शायद ‘जादू के पिटारे’ में ही दबा रहे। खेल बड़ा है- यह केवल पिता-पुत्र के बीच सत्ता संघर्ष मात्र नहीं है। यह भविष्य की राजनीतिक को प्रभावित करने वाला जबरदस्त द्वन्द्व है। इसमें भाजपा अपनी सम्भावनाएं टटोलकर सावधानी से चाल चल रही है तो कांग्रेस ने भी कुछ सोचकर ही अखिलेश के साथ चुनावी समझौते के लिए हाथ बढ़ाया है। उत्तर प्रदेश का संघर्ष दक्षिणपंथी ताकतों की अपनी स्थिति मजबूत करने बनाई जा रही रणनीति तथा पूंजीवादी बुर्जुआ दलों के बीच टकराहट है। देश में दक्षिणपंथी ताकत को कमजोर करने उत्तर प्रदेश में उभर रहा नया चुनावी गठबंधन शायद कारगर भूमिका निभाए। वैसे समाजवादी पार्टी ने सत्ता के लिए दक्षिणपंथी दलों से समझौता करने में परहेज नहीं किया है।
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