उप्र चुनाव: भाजपा को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का ही सहारा

राजेंद्र शर्मा : किरण रिजजू अगर केंद्रीय गृहराज्य मंत्री नहीं होते और खासतौर पर देश के सबसे बड़े राज्य, उत्तर प्रदेश में सात चरणों के विधानसभाई चुनाव के छ: चरण बाकी नहीं होते, ...

राजेंद्र शर्मा

राजेंद्र शर्मा
किरण रिजजू अगर केंद्रीय गृहराज्य मंत्री नहीं होते और खासतौर पर देश के सबसे बड़े राज्य, उत्तर प्रदेश में सात चरणों के विधानसभाई चुनाव के छ: चरण बाकी नहीं होते, तो उनके बयान की मूर्खता पर हंसा भी जा सकता था। लेकिन, मौजूदा संदर्भ में नहीं। बेशक, चाहे जूनियर ही सही, पर देश का गृहमंत्री अगर यह कहे कि भारत में हिंदुओं की आबादी घट रही है, तो गृहमंत्रालय की दुर्दशा पर तरस ही खाया जा सकता है। इसे न सिर्फ पूर्वाग्रह का मामला माना जा सकता है और न जानकारी का। यह तो नासमझ से नासमझ व्यक्ति भी बता देगा कि अगर इस देश की आबादी का करीब 80 फीसद (ठीक-ठीक कहें तो 79.80 फीसद) हिस्सा बनाने वाले हिंदुओं की आबादी सचमुच घट रही होती, तो इस देश के सामने कम से कम आबादी में बढ़ोतरी का कोई मुद्दा ही नहीं होता। यह मुद्दा इसीलिए बना हुआ है कि अपेक्षाकृत छोटे अल्पसंख्यक समुदायों को छोड़ दें तो भारत में हिंदू और मुसलमान, दोनों प्रमुख समुदायों की आबादी बढ़ रही है और ठीक-ठाक रफ्तार से बढ़ रही है। हां! उनके मामले में आबादी में बढ़ोतरी की रफ्तार अलग-अलग जरूर है। जहां 2001 और 2011 की जनगणनाओं के बीच की अवधि में हिंदुओं की आबादी में 16.76 फीसद बढ़ोतरी हुई थी, मुसलमानों की आबादी में इसी अवधि में 24.60 फीसद बढ़ोतरी हुई थी।
एक इसी तथ्य का सहारा लेकर कि मुस्लिम समुदाय के मामले में आबादी में बढ़ोतरी की दर ‘अब तक’ हिंदू समुदाय के मुकाबले ज्यादा है, जो तरह-तरह का ऊल-जूलूल व बेतुका सांप्रदायिक प्रचार किया जाता है, जूनियर गृहमंत्री होने के बावजूद रिजजू उसी को आगे बढ़ा रहे थे। लेकिन, यहां भी ‘अब तक’ महत्वपूर्ण है क्योंकि इतना ही महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि जहां दोनों बड़े समुदायों की आबादी में वृद्घि की दर घट रही है, वहीं पिछली दो जनगणनाओं के बीच, मुसलमानों की आबादी में बढ़ोतरी की दर में दर्ज हुई कमी, हिंदुओं की आबादी में बढ़ोतरी की दर में इसी अर्से में हुई कमी से, काफी ज्यादा रही है। दो दशकों के बीच अगर हिंदुओं की आबादी की वृद्घि दर 19.92 फीसद से घटकर, 16.79 फीसद रह गयी, मुसलमानों के मामले में यही दर 29.52 फीसद से गिरकर 24.60 फीसद पर आ गयी। यानी आज अगर देश के दो सबसे बड़े समुदायों की आबादी में वृद्घि की दरों में अंतर बना होना एक सच्चाई है, तो इस अंतर का तेजी से घट रहा होना भी उतनी ही महत्वपूर्ण सच्चाई है। यह सच्चाई कम से कम इस तरह के झूठे हिंदुत्ववादी प्रचार को बेनकाब करने के लिए काफी है कि वह दिन दूर नहीं है जब इस देश में हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएंगे और मुसलमान बहुसंख्यक!
बेशक, किरण रिजजू अपने विवादित बयान में इतनी दूर तक नहीं गए हैं। फिर भी उनके बयान का सांप्रदायिक मंतव्य स्वत: स्पष्टï है। और यह मंतव्य तब और भी स्पष्टï हो जाता है जब अपने उसी बयान के उत्तराद्र्घ में वह यह दलील पेश करते हैं कि हिंदुओं की आबादी घटने की वजह है, उनका धर्मांतरण नहीं करना! पुन: देश के जूनियर गृहमंत्री की हैसियत से किरण रिजजू का यह दलील पेश करना, खासतौर पर ‘घर वापसी’ के नाम पर देश भर में छेड़ी गई मुहिम की सच्चाई के सामने, हैरान करने वाला ही कहा जाएगा। लेकिन, रिजजू यहां सिर्फ तथ्यों की तरफ से आंखें मूंदने के ही दोषी नहीं हैं। धर्मांतरण के मामले में हिंदुओं की दूसरे समुदायों से भिन्नता की उनकी यह दुहाई, वास्तव में हिंदुओं की आबादी घटने के उनके झूठे दावे के सांप्रदायिक चरित्र की ही पुष्टिï करती है। अपनी बात को और नाटकीय रूप देने के लिए वह एक पूरी तरह से झूठा वैपरीत्य भी गढ़ते हैं—भारत में हिंदुओं की आबादी घट रही है, जबकि कई पड़ोसी देशों के विपरीत अल्पसंख्यक फल-फूल रहे हैं। हिंदुओं की कीमत पर अल्पसंख्यकों का फलना-फूलना—क्या यह अल्पसंख्यकों के तुष्टïीकरण के जाने-पहचाने संघ परिवारी गोयबल्सीय प्रचार का ही मामला नहीं है!
बेशक, विवाद बढऩे पर रिजजू ने यह सफाई दी है कि उनका उक्त बयान वास्तव में अरुणाचल प्रदेश कांग्रेस के आरोपों के जवाब में था। अरुणाचल प्रदेश कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी की सरकार पर अरुणाचल प्रदेश को एक हिंदू राज्य में बदलने की कोशिश करने का आरोप लगाया था। विडंबना यह है कि उक्त आरोप का रिजजू का कथित खंडन, एक प्रकार से सांप्रदायिक आचरण के अरुणाचल प्रदेश कांग्रेस के बयान को सही साबित करता ही न•ार आता है। फिर भी यह संघ परिवारी मिजाज की स्वाभाविक सांप्रदायिकता का ही मामला नहीं है। जैसा कि हमने शुरू में ही कहा, किरण रिजजू का उक्त बयान, उत्तर प्रदेश के चुनावों के संदर्भ में आया है। इस अर्थ में यह बयान, इस अति-महत्वपूर्ण चुनाव में सांप्रदायिक धु्रवीकरण का यथासंभव इस्तेमाल करने की भाजपा-आरएसएस जोड़ी की कोशिशों का ही हिस्सा है। यह संयोग ही नहीं है कि अनेक जमीनी रिपोर्टों में, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुए पहले चरण के चुनाव में, मुजफ्फरनगर के दंगे से लेकर कैराना से हिंदुओं के कथित पलायन तक के मुद्दों के गिर्द और मुसलमानों की गोलबंदी की काट करने के नाम पर, उल्लेखनीय सांप्रदायिक धु्रवीकरण की उपस्थिति दर्ज की गई है। और दूसरे चरण के लिए, बिजनौर में हुई एक हिंदू युवक की हत्या की ताजा घटना को उछालकर, सांप्रदायिक गोलबंदी की कोशिशें हो रही होने की सच्चाई को भी रिपार्टों में दर्ज किया गया है। पहले दो चरणों में उत्तर प्रदेश विधानसभा की एक-तिहाई सीटों का फैसला होना है।
याद रहे कि यह सिर्फ जमीनी स्तर पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का पता चले जाने का मामला नहीं है। आदित्यनाथ की लगभग बगावत को उन्हें स्टार प्रचारक बनाकर और हैलीकाप्टर उपलब्ध कराने के जरिए, स्टार प्रचारकों में भी खास बनाए जाने के जरिए शांत कराए जाने के बाद, दूसरे चरण से स्टार प्रचारकों में भाजपा द्वारा विनय कटियार और वरुण गांधी के शामिल किए जाने के संकेत स्वत: स्पष्टï हैं। बेशक, वरुण गांधी का भाजपा के स्टार प्रचारकों में शामिल किया जाना, उनकी नाराजगी को शांत करने के लिए भी था। लेकिन, यह नहीं भूलना चाहिए कि वरुण गांधी को उनकी घोर-सांप्रदायिक बयानबाजी के लिए भी जाना जाता है और चुनाव के मौके पर संप्रदायों के बीच विद्वेष बढ़ाने वाली बोली बोलने के लिए, कुछ साल उन्हें जेल भी जाना पड़ा था, हालांकि जैसा कि आम तौर पर ऐसे मामलों में होता है, बाद में पूरा केस ठंडा पड़ गया। यह संयोग ही नहीं है कि चुनाव के इस मौसम में इस प्रसंग की याद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक भाजपा नेता ने ही यह कहकर दिला दी है कि ‘अगर किसी ने हमारी गाय माता की पूंछ के पास हाथ भी लगा दिया तो वहीं से काट देंगे, जहां से काटने के लिए वरुण गांधी ने कहा था!’ और जैसे इसका ऐलान करते हुए कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का ऐसा प्रयास सिर्फ जमीनी स्तर का या अमित शाह समेत कुछ खास नेताओं का ही मामला नहीं है, भाजपा के उत्तर प्रदेश के चुनाव घोषणापत्र में एक बार फिर अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की पुकार की गई है। यह दूसरी बात है कि ऐसी चीजों की गिनती रखने वालों के अनुसार, यह भाजपा का 14वां चुनाव घोषणापत्र है, जिसमें मंदिर निर्माण का वादा किया गया है। वैसे इसका ऐसा 14वां चुनाव घोषणापत्र होना अपने आप में यह बताने के लिए काफी है कि भाजपा इस मुद्दे को और दुहकर, कुछ खास हासिल करने की उम्मीद नहीं कर सकती है।
इस तरह, जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ रहा है, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर भाजपा की निर्भरता खुलकर सामने आती जा रही है। कुछ ऐसी ही निर्भरता, सवर्ण ध्रुवीकरण पर भी है, जिसका एक महत्वपूर्ण संकेत बसपा नेता, मायावती को भोंडी गाली देने वाले भाजपा नेता की पत्नी को, एवजी का उम्मीदवार बनाए जाने से आगे, पूरे इलाके में महत्वपूर्ण प्रचारक बनाए जाने में देखा जा सकता है। फिर भी, कम से कम उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रचार के दूसरे चरण तक, खुद प्रधानमंत्री ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के मुद्दों से खुद को दूर रखा है। लेकिन, कब तक? अब जबकि मोदी के विकास का प्रतीक होने को अखिलेश की ओर से गंभीर चुनौती मिल रही है और नोटबंदी का चुनाव में भारी पडऩा साफ से साफ होता जा रहा है, यह देखना दिलचस्प होगा कि खुद मोदी क ब तक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के स्वर अपनाने के लोभ से बच पाते हैं। वैसे उनकी दुविधा वास्तविक है। वह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का सुर लगाएंगे तो विकास के मुद्दे पर अखिलेश को वॉकओवर मिल जाएगा, जो इस चुनाव में बहुत महंगा पड़ सकता है। लेकिन, जब भरष्टाचार, कानून, फौज का सम्मान आदि के मुद्दों पर विरोधियों पर तीखे हमले करने से और विकास की बतकही से काम न चल रहा हो और इतना महत्वपूर्ण चुनाव हाथ से खिसकता न•ार आ रहा हो, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का ब्रम्हास्त्र आजमाने से वह कब तक बच सकते हैं। यही देखना दिलचस्प होगा—आखिर, कब तक!


 

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