उत्तर प्रदेश : भाजपा को सांप्रदायिकता का ही सहारा

राजेंद्र शर्मा : अगर अब भी किसी सहज-विश्वासी को इसमें संदेह था कि भाजपा विधानसभाई चुनाव के मौजूदा चक्र में और सबसे बढक़र उत्तर प्रदेश में, अपना जाना-पहचाना सांप्रदायिक पत्ता खेलने जा रही है,...

उत्तर प्रदेश : भाजपा को सांप्रदायिकता का ही सहारा
राजेंद्र शर्मा

राजेंद्र शर्मा
 अगर अब भी किसी सहज-विश्वासी को इसमें संदेह था कि भाजपा विधानसभाई चुनाव के मौजूदा चक्र में और सबसे बढक़र उत्तर प्रदेश में, अपना जाना-पहचाना सांप्रदायिक पत्ता खेलने जा रही है, तो वह संदेह भी दूर हो जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश के लिए भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में ही सांप्रदायिक तुरुप चलने का रास्ता खोल दिया गया है। घोषणापत्र जारी करने के मौके पर अपने संबोधन में और उसके बाद एक समाचार चैनल को दिए एक लंबे साक्षात्कार में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने साफ कर दिया है कि यह सिर्फ किसी संगीत सोम या साक्षी महाराज या निरंजन ज्योति का ही मामला नहीं है। भाजपा के चुनाव प्रचार में बहुसंख्यकवादी सांप्रदायिक रंग आधिकारिक रूप से चढ़ाया जाएगा। वैसे खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दशहरा संबोधन के आरंभ तथा अंत में राम मंदिर आंदोलन से अभिन्न रूप से जुड़ा ‘जय श्रीराम’ का युद्घघोष दोहराकर, इस दिशा में बढऩे का पर्याप्त संकेत कर दिया था। बहरहाल, भाजपा के चुनाव घोषणापत्र के साथ अब यह भाजपा की ऑफिशियल लाइन हो गई है। अब सिर्फ यही देखना बाकी है कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश के अपने चुनाव संबोधनों में इस सूत्र को लोकसभा चुनाव की तरह ‘गुलाबी क्रांति’ यानी मांस उत्पादन बनाम ‘सफेद क्रांति’ यानी दूध उत्पादन के मुकद्दमे के माध्यम से ही बुनते हैं या अमित शाह की तरह कैराना से कथित हिंदू पलायन के नाम पर, मुजफ्फरनगर के दंगों की राख को कुरेदने तक या उससे भी आगे तक जाते हैं।
वास्तव में यह भी अचरज की बात नहीं है कि चुनाव घोषणापत्र और शाह की घोषणाओं के जरिए, भाजपा के ऊंट के सांप्रदायिक करवट बैठने से पहले तक बहुत ही असंतुष्ट माने जा रहे गोरखनाथ मंदिर के  महंत, योगी आदित्यनाथ ने, जोर-शोर से भाजपा के ‘स्टार प्रचारक’ की अपनी भूमिका संभाल ली है। इस भूमिका में उन्होंने एक ओर तो अपने ही खड़े किए संगठन, हिंदू युवावाहिनी की ‘योगी के अनादर’ के खिलाफ भाजपा से बगावत तथा खासतौर पर पूर्वांचल में अनेक सीटों पर अपने बागी उम्मीदवार खड़े करने की घोषणाओं को रुकवाया है। और दूसरी ओर, खासतौर पर पहले चरण में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मतदान की उग्र सांप्रदायिक तैयारियों के हिस्से के तौर पर खुल्लमखुल्ला इसका ऐलान कर दिया है कि ‘पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कश्मीर की घाटी से अस्सी अस्सी के दशक के आखिर में हुए हिंदुओं के पलायन जैसे हालात पैदा हो गए हैं।’ याद रहे कि आदित्यनाथ का अपनी खास शैली में हर चीज को अतिरंजित करना अपनी जगह, कैराना से कथित हिंदू पलायन के दावों के जरिए, वास्तव में मुजफ्फरनगर के भयावह दंगों की राख कुरेदने का काम, खुद भाजपा का उत्तर प्रदेश का चुनाव घोषणापत्र करता है।
खासतौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रभावशाली जाट समुदाय की बढ़ती नाराजगी को देखते हुए, ‘कैराना’ पत्ता खेलने के लिए भाजपा की उत्सुकता आसानी से समझी जा सकती है। अचरज नहीं कि यह उत्सुकता तथाकथित हिंदू पलायन का शोर मचाने वाले, शामली के भाजपा सांसद की पुत्री को, कैराना से भाजपा का उम्मीदवार बनाए जाने तक सीमित नहीं है। उल्टे आदित्यनाथ ने इसे उत्तर प्रदेश के चुनाव में सांप्रदायिक गोलबंदी की सबसे प्रमुख निशानी बनाने का ही संकेत दे दिया है। निवर्तमान विधायक सुरेश राणा ने इसका स्वर और तेज करते हुए, अपनी जीत के बाद कैराना से देवबंद तक कफ्र्यू लगने का ही ऐलान कर दिया है। मौजूदा चुनाव के संदर्भ में यह खेल विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि मुजफ्फनगर के दंगों की पृष्ठïभूमि में 2014 के आम चुनाव में इकतरफा तरीके से भाजपा के साथ चले गए जाट समुदाय का इन ढाई वर्षों में उससे भारी मोहभंग ही नहीं हुआ है, इस समुदाय ने नोटबंदी पर अपनी नाराजगी मुखर तरीके से व्यक्त की है। फिर भी इस चुनाव में भाजपा की सांप्रदायिक दुहाई मुस्लिम बहुल केंद्रों से कथित हिंदू पलायन तक ही सीमित नहीं है। इसके साथ ही भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में कथित ‘रोमियोविरोधी दस्ते’ गठित करने का भी ऐलान किया गया है, जो एक बार फिर न सिर्फ मुजफ्फरनगर के दंगों से ऐन पहले की घटनाओं की ओर इशारा करता है, और सामान्य स्तर पर तथाकथित ‘लव जेहाद’ के खिलाफ जेहाद की ओर भी इशारे करता है। कहने की जरूरत नहीं है कि ‘बहन-बेटियों की इज्जत’’ के लिए खतरे की दुहाई, हमेशा ही सांप्रदायिक गोलबंदी का एक महत्वपूर्ण हथियार बनती है। इसके ऊपर से मशीन वाले कट्टïीखानों को बंद कराने की मांग और जोड़ दी गई  है, जो तथाकथित ‘गोरक्षा’ से लेकर मांस खाने को मुसलमानों की पहचान बनाने तक के जाने-पहचाने सांप्रदायिक उत्प्रेरणों को समेटने की कोशिश करती है।
इस सब के ऊपर से भाजपा के उत्तर प्रदेश के चुनाव घोषणापत्र में अयोध्या में राम मंदिर बनाने की वचनबद्घता भी दोहरायी गई है। बेशक, अमित शाह ने इसके साथ यह भी जोड़ा है कि इस वादे को संविधान तथा कानून के दायरे में पूरा किया जाएगा। यह अदालत के फैसले से हो सकता है, जिसके  सामने मामला विचाराधीन है या फिर विभिन्न पक्षों के बीच आम सहमति से। लेकिन, वास्तव में वह यह सब वैधानिक चेतावनी की तरह से ही जोड़ते हैं। इस वादे के वास्तविक अर्थ का खुलासा योगी आदित्यनाथ यह वादा कर देता है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद एक साल के अंदर-अंदर मंदिर का निर्माण शुरू हो जाएगा। याद रहे कि राज्य भाजपा अध्यक्ष, केशव प्रसाद मौर्य इससे पहले ही करीब-करीब यही बात कह चुके थे। संकेत स्पष्टï है। पूरे उत्तर प्रदेश में हिंदू गोलबंदी के झंडे के तौर पर, राम मंदिर के मुद्दे का विशेष रूप से आम जनता के स्तर पर चुनाव प्रचार में इस्तेमाल किया जाएगा, बल्कि पहले ही किया जा रहा है।
बेशक, इसके बावजूद ऐसा नहीं है कि नरेंद्र मोदी और भाजपा, ‘उत्तर प्रदेश के विकास’ के नाम का जाप बंद कर देंगे। भाजपा को इसका अच्छी तरह से पता है कि अकेले सांप्रदायिक गोलबंदी के बल पर वह पूरे उत्तर प्रदेश में जीतने की उम्मीद नहीं कर सकती है। 2014 के आम चुनाव में प्रदेश में उसे मिली भारी कामयाबी, सबसे बढक़र रोजगार से लेकर काले धन तथा भ्रष्टïाचार तक के मुद्दों पर, आम लोगों की उम्मीदें जगाने और विकास के सपने दिखाने में कामयाबी का नतीजा थी। भाजपा और नरेंद्र मोदी के दुर्भाग्य से, बिहार की ही तरह उत्तर प्रदेश में, अखिलेश यादव के रूप में उसका मुकाबला एक ऐसे नेता है, जिसकी पहचान विकास करने वाले नेता की है। उसके ऊपर से, बिहार की ही तरह उत्तर प्रदेश में भी भाजपा, अपने बनाए नाजुक जातिवादी ताशमहल को बचाने के लिए मुख्यमंत्री पद के किसी उम्मीदवार को आगे न कर के नरेंद्र मोदी की तस्वीर लेकर ही चुनाव लडऩे पर मजबूर है। नरेंद्र मोदी के ढाई साल के शासन से पैदा हुई निराशाओं और सबसे बढक़र रोजगार तथा किसानों के हित के मामले में निराशाओं ने, पहले ही उनसे विकास की उम्मीदों को भोथरा कर दिया। इसके ऊपर से नोटबंदी से खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्र में हुई बदहाली ने, माहौल को साफ तौर पर भाजपा के खिलाफ कर दिया है।
ऐसे में भाजपा 2014 के लोकसभा चुनाव के 329 सीटों पर बढ़त के प्रदर्शन को दुहराना तो दूर, तिकोने मुकाबले में सबसे आगे निकलने की भी आसानी से उम्मीद नहीं कर सकती है। वास्तव में जनवरी के पूर्वाद्र्घ में हुए अधिकांश चुनाव-पूर्व सर्वेक्षणों भी भाजपा और सपा के बीच कांटे की टक्कर ही दिखाई दी है और शायद ही किसी सर्वे में भाजपा बहुमत के आंकड़े के आस-पास भी पहुंच पाई है। इसी पृष्ठïभूमि में सपा के अंदरूनी झगड़े का निर्णायक रूप से अखिलेश के नेतृत्व के पक्ष में फैसला होने और सपा तथा कांग्रेस का गठबंधन कायम होने के बाद, जो भाजपाविरोधी वोट का कहीं ज्यादा धु्रवीकरण कर सकता है, भाजपा की चिंता बहुत बढ़ गई है। प्रधानमंत्री मोदी के 2019 के अभियान के लिए, उत्तर प्रदेश के इस चुनाव में हार-जीत का जितना भारी महत्व है उसे देखते हुए, भाजपा उत्तर प्रदेश के चुनाव मुकाबलेे में सब कुछ झोंकने के लिए तैयार है, नरेंद्र मोदी का विकास पुरुष का मुखौटा भी। विडंबना यह है कि भाजपा का सांप्रदायिक चेहरा जैसे-जैसे सामने आता जाएगा, वैसे-वैसे उसके लिए उत्तर प्रदेश की जनता विश्वास जीतना मुश्किल से मुश्किल होता जाएगा। लेकिन, हार का खतरा देखकर भाजपा वही सब कर रही है जो वह करना जानती है—सांप्रदायिक तुरुप का इस्तेमाल।


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