बारहवीं योजना की मध्यावधि समीक्षा अनिश्चित

डॉ. हनुमन्त यादव : जब 15 अगस्त, 2014 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा अपने स्वाधीनता दिवस के उद्बोधन में केन्द्रीय योजना आयोग के खातमे की घोषणा की गई थी तो बुद्धिजीवी वर्ग हतप्रभ हो गया था। ...

डॉ. हनुमंत यादव

डॉ. हनुमन्त यादव
जब 15 अगस्त, 2014 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा अपने स्वाधीनता दिवस के  उद्बोधन में केन्द्रीय योजना आयोग के खातमे की घोषणा की गई थी तो बुद्धिजीवी वर्ग हतप्रभ हो गया था। यह इसलिए कि 15 दिन पहले ही 31 जुलाई 2014 को राज्यसभा में योजना आयोग के बारे में पूछे गए एक लिखित सवाल के उत्तर में केन्द्रीय योजना मंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने कहा था कि  योजना आयोग को खत्म करने या उसके मौजूदा स्वरूप में परिवर्तन करने का कोई प्रस्ताव उनके मंत्रालय एवं केन्द्र सरकार के विचाराधीन नहीं है। उन्होंने सांसदों को भरोसा दिलाते हुए कहा था कि यदि  योजना आयोग को युक्तिसंगत बनाने या उसके ढांचे में बदलाव के बारे में कोई प्रस्ताव आया या सरकार ने निर्णय लिया तो सरकार सबसे पहले संसद को सूचित करेगी । किन्तु 14 दिन बाद ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने योजना मंत्री के वक्तव्य को झुठलाते हुए योजना आयोग को भंग करने एवं उसके स्थान पर नई संस्था बनाने की सार्वजनिक घोषणा कर दी।
यद्यपि संघीय वित्त आयोग के समान केन्द्रीय योजना आयोग एक संवैधानिक संस्था नहीं थी क्योंकि इसकी स्थापना भारत सरकार के प्रशासकीय आदेश द्वारा योजनाबद्ध विकास हेतु  एक संस्थान के रूप में की गई थी। योजना आयोग द्वारा बनाई जानेवाली पंचवर्षीय योजनाओं के दृष्टिकोण पत्र, तथा योजना मसौदा के अनुमोदन के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय विकास परिषद गठित की गई थी जिसमें भारत के संघीय ढांचे की गरिमा हेतु सभी राज्यों के मुख्यमंत्री को पदेन सदस्य बनाया गया था। पंचवर्षीय योजनाओं की समीक्षा का कार्य संपादन भी राष्ट्रीय विकास परिषद द्वारा किया जाता है। अब यदि योजना आयोग के संबंध में सभी नीतिगत अधिकार राष्ट्रीय  विकास परिषद को थे, तो स्वाभाविक है कि केन्द्रीय योजना आयोग के भविष्य तय करने का अधिकार भी परिषद को ही निहित थे।
लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का तका•ाा था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 15 अगस्त के उद्बोधन के पूर्व  राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक बुलवाकर मुख्यमंत्रियों को विश्वास में लेकर योजना आयोग को भंग करने का प्रस्ताव पारित करवाना चाहिए था। योजना आयोग को भंग करने के पीछे प्रधानमंत्री का तर्क था कि वह राज्यों के मुख्यमंत्रियों को विश्वास में लिए बिना ही अपनी मनमर्जी से योजनाएं बनाकर राज्यों पर थोप देता है। यदि प्रधानमंत्री का दावा कि राज्यों के मुख्यमंत्री योजना आयोग से असंतुष्ट थे तो उन्हें राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में योजना आयोग को भंग करने के प्रस्ताव पारित करवाने में कोई कठिनाई नहीं आती। यदि प्रधानमंत्री राष्ट्रीय विकास परिषद के प्रस्ताव के आधार पर योजना आयोग को भंग करने की घोषणा करते तो  योजनामंत्री राव इन्द्रजीत सिंह संसद में गलतबयानी करने की हास्यास्पद स्थिति से बच जाते। 15 अगस्त, 2014 के तत्काल बाद ही  बारहवीं पंचवर्षीय योजना के आखिरी पंचवर्षीय योजना होने की संभावना व्यक्त की जाने लगी थी। इस प्रकार अनेक लोगों ने यह मान लिया था कि भारत से योजनाबद्ध विकास का युग समाप्त हो गया है इसलिए 1 अप्रैल, 2017 से प्रारम्भ होने वाली तेरहवीं पंचवर्षीय योजना प्रारंभ नहीं हो पाएगी। उस समय यह भी सवाल उठा था कि बारहवीं पंचवर्षीय योजना पूरे पांच साल योजना 31 मार्च, 2017 तक चलाई जाएगी अथवा  तीन साल में ही 31 मार्च, 2015 तक समाप्त कर दी जाएगी। केन्द्र सरकार ने 1 जनवरी, 2015 के दिन प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में भारतीय राष्ट्रीय परिवर्तन संस्थान-नीति आयोग  की औपचारिक रूप से स्थापना की। सरकार ने राष्ट्रीय विकास परिषद को अभी तक भंग नहीं किया है। केन्द्र सरकार ने बारहवीं पंचवर्षीय योजना को इसकी निर्धारित अवधि 31 मार्च, 2017 तक जारी रखने का निर्णय लिया।
फरवरी 2015 में सरकार ने बारहवीं पंचवर्षीय योजना की मध्यावधि समीक्षा का कार्य नीति आयोग को सौंपा। 12वीं योजना की मध्यावधि समीक्षा कार्य में कोई प्रगति न देखकर  अप्रैल 2016 में वित्त मंत्रालय से जुड़ी संसदीय समिति के अध्यक्ष वीरप्पा मोइली ने नीति आयोग से मध्यावधि समीक्षा कार्य पूरा करने हेतु तेजी लाने के लिए अनुरोध किया। 31 मार्च, 2017 को बारहवीं पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल पूरा होने जा रहा है किन्तु मंथर गति से चलने के कारण 30 नवम्बर, 2016 तक भी मध्यावधि समीक्षा का कार्य पूरा नहीं हो पाया था। योजनामंत्री राव इन्द्रजीत सिंह संसदीय समिति को यह बताने में विफल रहे हैं कि मध्यावधि समीक्षा कब पूरी होगी तथा उसे कब राष्ट्रीय विकास परिषद के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। 7 दिसम्बर, 2016 तक वित्त मंत्रालय से जुड़ी संसदीय समिति के अध्यक्ष वीरप्पा मोइली को बारहवीं पंचवर्षीय योजना की प्रगति की  मध्यावधि समीक्षा के बारे में नीति आयोग से जानकारी नहीं मिल पाने के कारण उन्होंने नीति आयोग द्वारा किए गए विलम्ब पर सार्वजनिक रूप से अप्रसन्नता व्यक्त की है। अब तो दो माह बाद तो मध्यावधि समीक्षा की बजाय बारहवीं योजना के पूरे पांच साल की समीक्षा का समय आ गया है। फरवरी 2015 में सौंपे गए मध्यावधि समीक्षा कार्य को 2 साल में भी पूरा न कर पाना नीति आयोग तथा सरकार की उदासीनता दर्शाता है।
जब 2015 में की जानेवाली बारहवीं पंचवर्षीय योजना की मध्यावधि समीक्षा का ही अता पता नहीं है तो तेरहवीं पंचवर्षीय योजना के प्रारम्भ किए जाने का सवाल ही नहीं उठता। प्रधामंत्री नरेन्द्र मोदी ने केन्द्रीय योजना आयोग को तो भंग कर दिया है किन्तु  राज्यों में  राज्य योजना आयोग तथा राज्य योजना मंडल अभी भी कार्यरत है। ये 12वीं योजना की मध्यावधि समीक्षा करने और राज्य की 13वीं योजना बनाने की बजाय अन्य सभी कार्य कर रहे हैं जिनका उससे कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। केन्द्र सरकार के निर्देशानुसार राज्य योजनामंडल थिंक टैंक बनकर दो साल से नीतियां बनाने का कार्य कर रहे हैं। उसी प्रकार जिला स्तर पर जिला योजना समितियां अभी भी विद्यमान हैं। चूंकि जिला योजना समितियां संवैधानिक संस्था हैं इसलिए उन्हें भंग करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 243 जेड.डी. को संशोधन या विलोपित करना पड़ेगा। इसलिए ये भी अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं। जहां तक बारहवीं पंचवर्षीय योजना की नीति आयोग द्वारा समीक्षा का सवाल है, इसके बारे में आज भी कोई जानकारी नहीं है, यदि फरवरी माह में यह कार्य हो भी जाता है तो समीक्षा का अब कोई व्यवहारिक एवं उपचारात्मक महत्व नहीं है।


 

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