कट्टरपंथ को जिंदा करने की कोशिश

एक सेकुलर समाज के 'हिन्दुकरण' से देश की अखंडता खतरे में है। धर्म किसी राष्ट्र को एक नहीं बना सकता। इसका उदाहरण बांग्लादेश है जिसने अपने को पाकिस्तान से काटकर अलग कर लिया...

कट्टरपंथ को जिंदा करने की कोशिश
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कुलदीप नैय्यर

एक सेकुलर समाज के 'हिन्दुकरण' से देश की अखंडता खतरे में है। धर्म किसी राष्ट्र को एक नहीं बना सकता। इसका उदाहरण बांग्लादेश है जिसने अपने को पाकिस्तान से काटकर अलग कर लिया। उर्दू के लादे जाने पर इस्लामिक पूर्व पाकिस्तान को स्वतंत्र, सार्वभौम बांग्लादेश गणतंत्र बनाने को मजबूर होना पड़ा। भारत एक देश बना रह गया क्योंकि अलग-अलग सांस्कृतिक इकाइयों के साथ छेड़छाड़ नहीं की गई।

 अपने पक्के समर्थकों के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत कोलकाता पहुंचने वाले ही थे कि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उस हाल में सभा किए जाने की अनुमति रद्द कर दी जिसे आरएसएस ने उनकी मीटिंग के लिए आरक्षित किया था। भागवत ने हाल रद्द करने को 'अलोकतांत्रिक' बताकर इसकी सही आलोचना की है। लेकिन हिंदू-मुसलमान समीकरण को बिगाड़ने का आरएसएस का रिकार्ड इतना लंबा है कि सावधानी उचित है। सच है, ममता बनर्जी  तानाशाही अपनाती दिखती हैं, लेकिन उनके कदम को तर्कसंगत ठहराया जा सकता है। फिर भी, मैं चाहता था कि वह एक दूसरी आवाज, चाहे वह कितना भी आलोचनात्मक क्यों ना हो, के उठने की अनुमति देतीं।

मुसलमानों को पिछड़े वर्ग (ओबीसी) में शामिल करने और मुल्ला-मौलवियों को भत्ता देने जैसे उनके कदम उस लोकतांत्रिक भारत के लिए ठीक नहीं है जो हम बनाना चाहते हैं। जाहिर है, किसी समुदाय की भावना को संबोधित करने का मकसद उनका वोट पाना होता है। यह उससे भी बुरा है जो आरएसएस करता है। 

उस स्थान पर एक छोटा मंदिर उभर आने से जहां कभी बाबरी मस्जिद थी, अध्याय, कम से कम, फिलहाल के लिए बंद हो गया था। लेकिन यह मुसलमानों को संतोष देने वाला मालूम नहीं देता और ना ही उन्हें यह अपने हित में लगता है। आरएसएस के मार्गदर्शन में भाजपा उसी तरह का माहौल बनाना चाहता है। विविधता पर सरकार के अस्पष्ट विचार ने हिंदुत्व-तत्वों को मदद ही की है। प्रधानमंत्री मोदी इस बिगड़े माहौल को साफ करने के लिए कुछ सकारात्मक कर सकते थे। लेकिन उनकी पार्टी ऐसा करती दिखाई नहीं देती क्यों कि वह समाज को विभाजित रखने का फायदा ले रही है। कोई भी बाहरी व्यक्ति इसमें हस्तक्षेप नहीं कर पाया क्योंकि उस समय के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का पालन करने के लिए कुछ नहीं किया जिसने कहा था कि यथास्थिति बनाई रखी जाए।

एक सेकुलर समाज के 'हिन्दुकरण' से देश की अखंडता खतरे में है। धर्म किसी राष्ट्र को एक नहीं बना सकता। इसका उदाहरण बांग्लादेश है जिसने अपने को पाकिस्तान से काटकर अलग कर लिया। उर्दू  के लादे जाने पर इस्लामिक पूर्व पाकिस्तान को स्वतंत्र, सार्वभौम बांग्लादेश गणतंत्र बनाने को मजबूर होना पड़ा। भारत एक देश बना रह गया क्योंकि अलग-अलग सांस्कृतिक इकाइयों के साथ छेड़छाड़ नहीं की गई। सच है कि हिन्दू 80 प्रतिशत हैं। लेकिन अल्पसंख्यकों, मुसलमानों को, कुछ थोड़े सनकी लोगों को छोड़कर, कोई डराता-धमकाता नहीं है।
अगर आरएसएस वास्तव में हिन्दुत्व में दिलचस्पी रखता है तो उसे दलितों के अधिकार के लिए आंदोलन करना चाहिए, जो भेदभाव के बावजूद हिन्दू धर्म के भीतर बने रहे। सच है कि कुछ ने दूसरे धर्मांे में धर्मान्तरण के जरिए आजदी पाने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने मुस्लिम और ईसाई समाज पर विपरीत असर ही डाला। धर्म बदलने वाले दलित जिस धार्मिक समाज में जाते हैं वहां भी वे कमोबेश उसी तरह भेदभाव का सामना करते हैं।

हिंदुओं के सवालों के लिए अभियान चलाने का दावा करने वाले आरएसएस प्रमुख हाल ही में उस दलित के जला दिए जाने पर कुछ नहीं बोले जिसकी बकरी एक उच्च जाति वाले के खेत में चली गई थी। अभी मोदी ने लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया है तो उन्हें दलितों की मदद करनी चाहिए तथा ऊंची जातियों को दलितों के खिलाफ भेदभाव छोड़ने के लिए कहना चाहिए।

मैंने मोदी या उनके समर्थकों, जो दावा करते हैं कि वे बिना भेदभाव वाला भारत बनाएंगे, को इन  घटनाओं की हल्की आलोचना करते भी नहीं देखा है। काफी देखे जाने वाले दूरदर्शन के नेटवर्क अगर रोज-रोज के पूर्वाग्रह को न भी दिखाएं, उन्हें दलितोंको जलाए जाने की घटना दिखानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार खुद ही इस मामले को ज्यादा आवाज नहीं देना चाहती है क्योंकि इसमें ऊंची जातियों का बोलबाला है। वैसे भी, यह एक अलिखित कानून है जो आदेश देता है कि ऐसी खबरें प्रकाशित नहीं होनी चाहिए। निश्चित तौर पर, यह प्रेस की आजदी नहीं है।  नतीजन, देश में संस्थाएं पिछड़ रही हैं।


अगर मीडिया, जो एक महत्वपूर्ण संस्था है, दबावमुक्त होता तो आरएसएस संविधान के बुनियादी ढांचे जिसमें सेकुरिज्म शामिल है, को चुनौती देने की हिम्मत नहीं कर पाता। आरएसएस प्रमुख को यह समझना चाहिए कि हिन्दू धर्म का मतलब है लोगों को जगह देना और सहिष्णुता की भावना, न कि समाज का विभाजन।

भाजपा का फैलना चिंता का विषय है क्योंकि यह मुसलमानों की आकांक्षाओं को नजरअंदाज करता है। विकास के मोदी के नारे ने लोगों को आकर्षित किया है क्योंकि यह गरीबी को हटाने का नहीं भी तो कम करने की उम्मीद जरूर दिलाता है। उन्होंने इस रास्ते को नहीं छोड़ कर अच्छा किया है। दुर्भाग्य से, उनका और उनके अजीज अमित शाह का आरएसएस से नियमित संपर्क इस ख्याली पुलाव को नष्ट कर देता है कि मोदी एक पूर्वाग्रह से मुक्त समाज बनाएंगे। 

चीजें एकदम अलग होतीं अगर आरएसएस से हर संबंध खत्म करने का भाजपा के कुछ उदार सदस्यों की मांग लागू हो गई होती। इस संभावना पर चर्चा चल रही थी जब गांधीवादी जयप्रकाश नारायण ने जनसंघ के शीर्ष नेताओं को जनसंघ भंग कर जनता पार्टी में शामिल होने के लिए राजी कर लिया था। लेकिन जनसंघ के पुराने नेता आरएसएस के लगातार संपर्क में रहे, और इसने पूरे उद्देश्य को नकार दिया।

ज्यादा समय नहीं हुआ, उदारवादी अटल बिहारी वाजपेयी ने आरएसएस तथा जनसंघ के बीच के संबंधों को खत्म करने की पूरी कोशिश की थी। लेकिन वह सिर्फ कागज पर ही सफल हुए वह पुराने सदस्यों की वफादारी को कम नहीं कर पाए। एलके आडवानी भी उनमें से एक थे जिन्होंने भाजपा की स्थापना की थी। उन्होंने सोचा कि जनसंघ के पुराने सदस्यों पर जनता पार्टी में विश्वास नहीं किया जाता है। वह पार्टी का निर्माण करने में इसलिए सक्षम हुए कि जयप्रकाश नारायण ने जनता पार्टी के भीतर लाकर जनसंघ को विश्वसनीयता प्रदान की। जाहिर है वह अपने मिशन में कामयाब नहीं हुए। लेकिन आज परिस्थिति खराब है। कांग्रेस अब प्रासंगिक नहीं रह गई है और क्षितिज पर कोई दूसरा विपक्ष दिखाई नहीं देता है।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार भाजपा के हमले को रोक सकते हैं अगर वह भाजपा से लड़ने के लिए सभी गैर-भाजपा पार्टियों को एक मंच पर लाएं। इस समूह को बनाने में देरी हो जाएगी अगर यह तुरंत नहीं किया गया। देश में फैल गया नरम हिंदुत्व गहरा बनेगा और भारत की सोच, सेकुलर तथा लोकतांत्रिक, पीछे चली जाएगी। यह एक डरावनी संभावना है।

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