महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने की राह

भारत में रोजगार सृजन के नए अवसर जुटाने, विभिन्न क्षेत्रों में बिखरे हुए कौशल को विकसित होने और देश को आत्मनिर्भर बनाने जैसे बड़े उद्देश्यों के साथ प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना की शुरुआत मोदी ने की थी...

देशबन्धु
महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने की राह
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भारत में रोजगार सृजन के नए अवसर जुटाने, विभिन्न क्षेत्रों में बिखरे हुए कौशल को विकसित होने और देश को आत्मनिर्भर बनाने जैसे बड़े उद्देश्यों के साथ प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना की शुरुआत नरेन्द्र मोदी ने की थी। इसके लिए बाकायदा कौशल विकास और उद्यम मंत्रालय का गठन किया गया, जो राष्ट्रीय कौशल विकास निगम (एनएसडीसी) के माध्यम से इस कार्यक्रम को क्रियान्वित कर रहा है। इसके तहत 24 लाख युवाओं को प्रशिक्षण देकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने की योजना है। चूंकि यह प्रधानमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट है, इसलिए इसे सरकार की ओर से बढ़ावा भी खूब मिल रहा है। लेकिन सुनहरे सपनों वाली इस परियोजना की एक कड़वी सच्चाई यह है कि इसकी पेचीदा नियमावली के कारण बहुत सी महिला उद्यमी, या कह लें कुटीर उद्योगों के दम पर जीवनयापन करने वाली महिलाओं के समक्ष भविष्य का संकट गहराने लगा है। 

1986-87 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने सपोर्ट टू ट्रेनिंग एंड इंप्लाएमेंट प्रोग्राम फार वीमेन यानी स्टेप की शुरुआत की थी। इसका प्राथमिक उद्देश्य देश भर में महिलाओं को स्वरोजगार के लिए सहायता देना था। कृषि, बागवानी, खाद्य प्रसंस्करण, हथकरघा, सिलाई, कढ़ाई, हैंडलूम, ट्रैवल एवं टूरिज्म जैसे कई छोटे कामों के जरिए महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्टेप के तहत अनुदान राशि देने की व्यवस्था है, जो उन संस्थाओं, गैर सरकारी संगठनों को सीधे दी जाती है, जो महिलाओं को इन कामों में प्रशिक्षित करती हैं। देश भर की कई संस्थाएं, कहींं 3 सौ तो कहींं 5 सौ महिलाओं को बकरी, मुर्गी पालन या हथकरघा या सिलाई-बुनाई या पापड़-अचार बनाने के काम में इस अनुदान राशि से प्रशिक्षित कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाती रही हैं।

देश में लिज्जत पापड़ बनाने वाला श्री महिला गृह उद्योग, कुटीर उद्योग में कदम रखने वाली महिलाओं के लिए मिसाल है, जिसमें 7 महिलाओं ने मिलकर काम शुरु किया और आज देश भर में इसकी 81 शाखाएं हैं, विदेशों तककारोबार फैला हुआ है। श्री महिला गृह उद्योग जैसे ही बहुत से महिला स्वसहायता समूह देश के ग्रामीण अंचलों और कस्बों में कामयाबी से संचालित हो रहे हैं। अगर बड़ी-पापड़ बनाने और सिलाई-कढ़ाई करने जैसे घरेलू कामों को कौशल विकास से जोड़ा जाए तो युवाओं के साथ-साथ महिलाओं के लिए भी रोजगार के नए अवसर जुटेंगे। लेकिन कौशल विकास कार्यक्रम में नियमों की पेचीदगी छोटे-छोटे रोजगार में जुड़े लोगों के लिए बाधक बन रही है।


कौशल विकास मंत्रालय की गाइड लाइन में पापड़ बनाने और सिलाई-कढ़ाई सेंटर जैसे छोटे कामों के लिए भी अधिक संसाधन और अधिक जगह जैसी पात्रता रखे जाने का परिणाम यह हुआ है कि स्टेप के तहत पिछले दो सालों में रोजगार के अवसर ठप्प हो गए हैं। खबरों के मुताबिक पिछले साल सितम्बर से तो इसमें कोई काम ही नहीं हुआ है। इस योजना के लिए रखे गए 40 करोड़ रुपए में से बमुश्किल 16 लाख ही खर्च हो सके हैं। महिलाओं को रोजगार के लिए जिन 1500 संगठनों ने आवदेन दिए थे, उनमें से एक को भी पात्र घोषित नहीं किया गया। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने इस संबंध में कौशल विकास मंत्रालय को इस आशय के पत्र लिखे हैं कि बेहद छोटे रोजगार के लिए बड़ी बंदिशें नहीं लगानी चाहिए।

मंत्रालय ने कौशल विकास मंत्रालय को बार-बार यह समझाने का भी प्रयास किया है कि वह इस योजना में जिन महिलाओं को रोजगार दिलाना चाहता है, उनको उद्यमी न समझा जाए। उसने बताया कि वो जिन महिलाओं की मुश्किल की तरफ ध्यान देने को कह रहा है वे ऐसी महिलाएं हैं जो छोटे-छोटे काम करके 5-7 हजार रुपए कमाती हैं। क्या महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की इस पहल से कौशल विकास के नियम शिथिल होंगे? क्या छोटे-छोटे कदमों से आसमान छूने का ख्वाब वे घरेलू महिलाएं पूरा कर पाएंगी, जो उद्यमी बनना चाहती हैं? महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने व्यावहारिक कठिनाइयां कौशल विकास मंत्रालय के सामने रखी हैं। अब गेंद उसके पाले में है। देखना यह है कि दो मंत्रालयों के बीच झूल रहे रोजगार के सवाल का हल क्या निकलता है। 

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