चरखा चलाते तस्वीर का मकसद, क्या भाजपा कांग्रेस से डरती है

देश में पिछले हफ्ते चरखा विवाद खड़ा कर दिया गया। हुआ यूं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का चरखा कातते चित्र खादी बोर्ड के कैलेंडर में प्रकाशित किया गया। ...

चरखा चलाते तस्वीर का मकसद, क्या भाजपा कांग्रेस से डरती है
प्रभाकर चौबे

प्रभाकर चौबे
देश में पिछले हफ्ते चरखा विवाद खड़ा कर दिया गया। हुआ यूं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का चरखा कातते चित्र खादी बोर्ड के कैलेंडर में प्रकाशित किया गया। इस चित्र ने विवाद खड़ा कर दिया। या कहें विवाद खड़ा हो इसलिए इस तरह का करतब किया गया। देश में जमकर बवाल खड़ा हो गया। समझने की बात यह है कि प्रधानमंत्री ने ऐसा क्यों किया। दरअसल चुनाव जीतने और अपने वोट का ध्रुवीकरण की मकसद से भाजपा कई क्षेत्रों में काम कर रही है। भाजपा का ध्येय है संसद में पूर्ण बहुमत, राज्य सभा में अभी वह बहुमत में नहीं है। जब भी चुनाव आते हैं, भाजपा ऐसे कुछ भावनात्मक मुद्दे उछाल देती है।

सत्ता में आने के पहले से ही भाजपा ने दो प्रमुख काम निर्धारित कर रखे- एक तो गांधी-नेहरु को लोकस्मृति से हटाना-उन्हें राष्ट्रीय नेता के पद से अपदस्थ करना और परिदृश्य से गायब कर देना जिससे आनेवाली पीढ़ी तक दोनों बिल्कुल न पहुंचे अथवा पहुंचे तो भी एक धुंधली आकृति ही उनकी दिखे। आज भाजपा केन्द्र में सत्ता में है, और पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में है, अधिकतर राज्यों में उसकी सरकार है। मतलब आज भाजपा के पास राजनीतिक प्रशासनिक प्रचार की इतनी शक्ति आ गई है कि वह गांधी-नेहरु को जनमानस से हटा कर अपने आदर्श उनके मस्तिष्क में ठूंस सकती है।

भाजपा अब एक बड़ी ताकत है। भाजपा अकेली नहीं है। अन्य दल तो अकेले हैं- लेकिन भाजपा को संघ की ताकत तथा तरह-तरह के प्रकल्पों की ताकत भी मिली हुई है और भाजपा के पास सत्ता की ताकत भी है। मतलब भाजपा इस समय देश की सबसे बड़ी ताकतवर पार्टी है। भाजपा जो चाहे सो कर सकती है। सत्ता में होने के कारण मीडिया पर उसका पूरा नियंत्रण है। अत: भाजपा इस अवसर को खोना नहीं चाहती। भाजपा को लगता है कि इस सुनहरे अवसर का भरपूर उपयोग कर लिया जाए- जनता के मूड का क्या ठिकाना, कल वह खिलाफ न हो जाए।

वैसे भाजपा इस बात का पुख्ता इंतजाम करने में लगी है कि अगला चुनाव भी उसके ही पक्ष में हो। और इसी प्रयास के विभिन्न चरण समय-समय पर दृष्टिगोचर होते रहते हैं। मतलब प्रधानमंत्री ने सोची-समझी नीति के तहत ही चरखा चलाते हुए फोटो खिंचवाई और उसे खादी बोर्ड ने अपने कैलेंडर में छापा। मतलब चरखा चलाते हुए फोटो खिंचवाना और कैलेंडर में प्रकाशित करना अचानक नहीं हुआ है। भाजपा जानती थी, नीतिकार जानते थे कि इस तरह कैलेंडर में चित्र छपवाने पर विरोध होगा, जमकर चर्चा होगी। जानबूझ कर भाजपा ने यह चाल चली कि चर्चा हो। इससे भाजपा को अपने वोट कंसालिडेट करने का मौका मिला- भाजपा ने अपने वोट पक्के किये और यह इसलिए कह सकते हैं क्योंकि सोशल मीडिया में इसके समर्थन में लोग खड़े हो गये तथा विरोध करने वालों की कुटाई शुरू कर दी। यहां तक कि कुछ ने तो गांधी-नेहरु की चरित्र हत्या करने में भी परहेज नहीं किया।

भाजपा ने सब तयशुदा स्क्रिप्ट के अनुसार ही किया है। पूरी पटकथा लिखी हुई है- उसी के अनुसार काम हो रहा है। स्क्रिप्ट में है कि प्रधानमंत्री ऐसी तस्वीर खिंचवायेंगे, यह तस्वीर खादी बोर्ड के कैलेंडर में प्रकाशित होगी। कुछ लोग विरोध करेंगे तो भाजपा और भाजपा सरकार में से कौन-कौन मंत्री-नेता-पदाधिकारी क्या बोलेंगे- सबको भाजपा ने डायलाग दे दिया है, उन्हें वह डायलाग बोलना है, न ज्यादा न कम। यह भी तय है कि भाजपा इसे उनके निजी विचार कहेगी। सब तय है, सब कुछ मुख्य अभिनेताओं को बता दिया गया है। डायरेक्टर देख रहा है कि अभिनेता अपना रोल ठीक से निभा रहे हैं।

सवाल है कि क्या भाजपा कांग्रेस से डरती है।

वैसे राजनीतिक रूप से कांग्रेस ही उसके सामने है, उसकी प्रतिस्पर्धा कांग्रेस के साथ है, उसे सत्ता से बेदखल कांग्रेस ही कर सकती है, यह सब भाजपा को पता है। मतलब राजनीतिक सत्ता संघर्ष में कांग्रेस ही उसका सामना कर सकती है। लेकिन अब कांग्रेस वैचारिक स्तर पर भाजपा के लिए कांग्रेस चुनौती नहीं है क्योंकि कांग्रेस ने अपना मूल विचार एक तरह से तकिये के नीचे दबा दिया और सत्ता पाने के लिए धर्मनिरपेक्षता शब्द तक का त्याग करने में परहेज नहीं करती और कांग्रेस ‘नरम हिन्दू’ का बाना धारण का लेती है जिससे हिन्दुवादी वोट उसे मिल जाएं।

कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता को एक तरह से बगल में दबा लिया है और समाजवाद शब्द का पूरी तरह परित्याग कर दिया है- कांग्रेस अब समाजवाद शब्द से ही परहेज करने लगी है। कांग्रेस तो नवउदारवादी आर्थिक नीति की जननी बन गई है।

तमाम पब्लिक सेक्टर को किसी न किसी रूप में कमजोर करने का काम कांग्रेस ने शुरू किया और इसका नतीजा यह हुआ कि किसी पब्लिक सेक्टर के उद्योग की टांग टूट गई है तो किसी के हाथ काट डाले गये  है किसी को मोतियाबिंद हो गया है तो कोई बहरा कर दिया गया है। भाजपा ने तो कांग्रेस की सारी नीतियां- नवउदारवादी आर्थिक नीतियां ज्यों की त्यों अपना लिया है और उसे आगे ही बढ़ा रही है- पूर्व के एनडीए सरकार में तो बाकायदा विनिवेश मंत्रालय ही गठित कर दिया गया था। कुछ पब्लिक सेक्टर सस्ते में निजी क्षेत्र को बेच दिये गये।


2004 से डॉ.मनमोहन सिंह ने नवउदारवादी आर्थिक नीतियों को पुन: लागू करना शुरू किया। हुआ यह कि 2009 में फिर जनता ने कांग्रेस को मौका दिया लेकिन डॉ.मनमोहन सिंह की नवउदारवादी आर्थिक नीति ने जनता का कष्ट बढ़ाया ही, भ्रष्टाचार भी जमकर हुआ। 2014 में भाजपा सत्ता में आई इस समय में कांग्रेस से निराश हो चुके कार्पोरेट ने भाजपा को सत्ता प्राप्त करने में पूरी मदद की।

मतलब कांग्रेस आर्थिक सुधार के ट्रैक पर धीमी गति से दौड़ रही थी। कार्पोरेट को तेज धावक चाहिये थी अत: कार्पोरेट ने उसके नियंत्रित मीडिया के माध्यम का उपयोग किया, भाजपा ही कार्पोरेट की पसंद बन गई और 2014 में भाजपा सत्ता में आई।

आज भाजपा का हर आर्थिक कदम कार्पोरेट हित साधक है। पब्लिक सेक्टर कमजोर किया जा रहा है। दूसरा अपना वोटबैंक मजबूत हो, बढ़े इसलिए लोकलुभावन नारों, प्रतीकों का उपयोग कर रही है।

भाजपा जानती है कि उसकी आर्थिक नीतियां पूरी तरह कार्पोरेट हित साधने वाली है अत: आमजन को कष्ट ही होगा- कीमतें बढ़ीं, बढ़ रही हैं (कभी दाल की कीमत आसमान छूने लगती है, फिर छ:-आठ माह के बाद दाल की कीमत कम कर दी जाती है, प्रचार किया जाता है कि ‘दाल सस्ती हुई’ फिर अचानक दाल सस्ती हुई तो शक्कर-तेल की कीमत बढ़ा दी जाती है- जनता दाल की कीमत भूलकर शक्कर-तेल में उलझ जाती है- रेल की यात्रा का भार इस तरह तय किया जा रहा है कि यात्रा महंगी होती है, लेकिन टुकड़ों-टुकड़ों में महंगी हो रही है- बचत खाता की ब्याज दर कम कर दी जाती है। पेटीएम का नारा देकर किसी खास को लाभ पहुंचाया जाता है। बीएसएनएल सेवा को कामचलाऊ की सीमा पर ला दिया गया है। शिक्षा के क्षेत्र में पूरी तरह निजीकरण की दिशा में बढ़ा जा रहा है।

भाजपा को चुनाव की कठिन परीक्षा पास करनी है इसलिए भाजपा हर तरह के मोहक नारे परोसती चलती है। जैसे बाजीगर नये-नये शब्द प्रयोग कर दर्शकों को भरमाये रखता है- सांप-नेवले की लड़ाई देखना बाबूजी... यह कहते हुये पूरा करतब दिखा देता है। पैसे झटक लेता है। लेकिन अंत तक सांप- नेवले की लड़ाई नहीं दिखाता। भाजपा भी नये-नये नारे, नये-नये करतब दिखा रही है- चुनाव आते ही वह ऐसा करने लगती है।

भाजपा सरकार हर मोर्चे पर पूरी तरह फेल हो गई है, लेकिन चुनाव सामने है, चुनाव जीतना भी है, सरकार बनाना है, अपने अधूरे पड़े एजेंडा पूरा करना है इसलिये नये-नये जुमले छोड़ती है। चरखा चलाते हुए प्रधानमंत्री की तस्वीर कैलेंडर में छापना उस नाटक का एक हिस्सा है। मीडिया इसी पर चर्चा करती रहे, सरकार के वायदे भूल जाये, नोटबंदी की तकलीफ भूल जाए, रोजी-रोजगार नहीं मिलने की तकलीफ से ध्यान भटके, महंगाई से ध्यान हटे और चरखा चलाते चित्र पर ही माथापच्ची करने लगे- थक कर सो जाये। चरखा चलाते हुए तस्वीर खिंचवाना, छपवाना तो एक माध्यम है- सरकार के असफलताओं से ध्यान हटे।

भाजपा का सत्ता प्राप्त करने का ध्येय पूरा करने में जो भी कर्म करना हो किया जाये- गांधी-नेहरु को नकारा साबित करना। गांधी-नेहरु ही उनके लिए बड़े संकट  है। गांधी दर्शन से इन्हें कोई लेना-देना नहीं। उनकी समस्या गांधी-नेहरु की उपस्थिति को उसे गायब करना है। चुनाव में शायद यह तरकीब काम आये।

prabhakarchaube@gmail.com

 

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