समस्या केवल तीन तलाक की नहीं

मुस्लिम महिलाओं की सच्ची मदद के लिए हलाला और बहुविवाह पर भी रोक जरूरी...

देशबन्धु
समस्या केवल तीन तलाक की नहीं
Three divorces
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- डॉ. गीता गुप्त 

केन्द्र सरकार ने अन्तत: एक बार में तीन तलाक  के खिलाफ मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक 2017 लोकसभा में पारित कर दिया। राज्य सभा में पारित होने के बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति से वह कानून का रूप ले लेगा। लेकिन विधेयक के मौजूदा स्वरूप को लेकर कुछ मुस्लिम महिला संगठनों को आपत्ति है। विधेयक में प्रस्तावित प्रावधानों के अनुसार एक बार में तीन तलाक कहने वाले पुरुष को तीन साल के कारावास का दण्ड दिया जाएगा। यह जुर्म गैर जमानती होगा। तलाकशुदा पत्नी और आश्रित बच्चे के लिए गुजारा-भत्ता तय करने का अधिकार मजिस्ट्रेट को होगा। साथ ही एक बार में तीन तलाक दिये जाने की सूरत में नाबालिग बच्चे का अधिकार मां को दिया जाएगा। सरकार के मुताबिक, तीन तलाक का मुद्दा लिंग न्याय, लिंग समानता, महिला की प्रतिष्ठा तथा मानवीय धारणा से उठाया हुआ मुद्दा है, न कि विश्वास व धर्म से जुड़ा हुआ मुद्दा।

महिलाएं तीन तलाक को गैरकानूनी और गुनाह बताकर इसे प्रतिबन्धित करने की मांग करती आ रही हैं। मौलानाओं ने भी तीन तलाक  को बिद्दत बताकर उसे गुनाह, $गलत और $कुरान के बाहर का तो बताया लेकिन ये भी कहा कि अगर किसी ने एक बार में तीन तला$क दिया है तो वह तलाक हो गया, उसमें पुनर्विचार की गुंजाइश नहीं। ऐसे पति को कानून सख्त सजा दे। खलीफाओं के दौर में उन्हें 50 कोड़े मारने की सजा दी जाती थी। यानी मौलाना तीन तलाक को गलत मानकर कड़ी सजा के भी पक्षधर तो हैं, परन्तु उन्होंने ऐसा कोई प्रावधान करने की जहमत नहीं उठाई ,जिससे महिलाओं पर इसका कहर न टूटे।

सच तो यह है कि दशकों से तीन तलाक की मार झेल रही महिलाओं के हित में कभी किसी आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड या मुशावरत या तंजीम ने कोई कदम नहीं उठाया। इस गलत परम्परा को समाप्त करने के लिए मौलानाओं या सुफी मुस्लिम समुदाय ने कभी कोई बड़ा सन्देश नहीं दिया। ऐसी तलाक शुदा औरतों के पुनर्वास पर भी वक्फ के अकूत $ख•ााने हमेशा बन्द रहे। ऐसे पतियों को जवाबदेही के लिए इन्होंने नहीं घेरा। मौलानाओं ने चुप्पी साधे रखी और अपने एफि डेविट में लिखा कि सभी महिलाएं ना$िकसुल अक्ल होती हैं लिहाजा सिर्फ मर्द तय करेगा कि क्या करना है। ऐसी सोच रखने वालों के हाथ में यदि समाज के नियंत्रण का दायित्व है तो महिलाओं के हक में कैसे कुछ अच्छा होने की उम्मीद की जा सकती है? जो मसला सुफी बोर्ड और मौलानाओं के सिर्फ एक बयान से हल हो सकता था कि- तीन तलाक  गैरकानूनी है इसलिए सिर्फ तलाक-ए-अहसन और तलाक -ए-हसन ही मान्य होगा, उसके लिए महिलाओं को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी और सरकार को कानून बनाने की जद्दोजहद करनी पड़ी। हालांकि अब भी बहुत-से प्रश्न अनुत्तरित हैं।

गौरतलब है कि अगस्त 2017 में ही सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने 1400 वर्षों से प्रचलित तीन तलाक व तलाक-ए-बिद्दत की परम्परा को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। यही नहीं, तीन तलाक को संविधान की धारा 14 व 21 के विरुद्ध भी माना। 10 अक्टूबर 2015 को उत्तराखण्ड की शायरा बानो ने सर्वोच्च न्यायालय में मुस्लिम पर्सनल ला एप्लीकेशन क ानून, 1936 धारा-दो की संवैधानिकता को चुनौती दी थी। 17 संगठनों ने भी याचिका दायर कर शायरा का पक्ष म•ाबूत कर दिया था। इसके बाद जयपुर की आफ रीन, पश्चिम बंगाल (हावड़ा) की इशरत, सहारनपुर की अतिया और रामपुर (उत्तरप्रदेश) की गुलशन ने भी इस कुप्रथा के विरुद्ध आवाज बुलन्द करते हुए याचिका दायर की। इन पढ़ी-लिखी युवतियों को उनके पतियों ने क्रमश: स्पीड पोस्ट, फोन, कागज पर लिखकर और दस रुपये के स्टाम्प पेपर पर तलाक नामा भेजकर तलाक  दे दिया था।

स्मरणीय है कि वर्ष 1978 में इन्दौर की शाह बानो ने भी तलाक के बाद अपने पति मोहम्मद खान से गुजारा भत्ते हेतु $कानून की शरण ली थी। तब सर्वोच्च न्यायालय ने उसके पक्ष में निर्णय दिया था। किन्तु राजीव गांधी सरकार ने एक वर्ष में मुस्लिम महिला (तला$क  में संरक्षण अधिकार) अधिनियम पारित कर उस निर्णय को ही पलट दिया। इससे शाह बानो जीता हुआ मु$कदमा भी हार गईं। सच तो यह है कि अनगिनत महिलाएं इस कुप्रथा का दंश झेल रही हैं। भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन की सहसंस्थापक जकिया सोमण और नूरजहां सफिया निया•ा ने नवम्बर 2016 में प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर देश के दस राज्यों में 47110 मुस्लिम महिलाओं के बीच किये गए सर्वेक्षण का हवाला देते हुए बताया था कि इनमें 92.1 प्रतिशत महिलाएं मौखिक/एकतर$फा ढंग से दिये तला$क पर प्रतिबन्ध चाहती हैं और 91.7 प्रतिशत बहुविवाह के विरुद्ध हैं।

मगर मुस्लिम समुदाय के सुफी, बरेलवी, देवबन्दी, अहले हदीस और शिया समेत सभी वर्गों के विद्वानों और मौलवियों ने मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत के बैनर तले जुटकर तीन तलाक को जायज ठहराया। आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने तो इसके समर्थन में प्रस्ताव पास कर महिलाओं से जुड़े मसलों पर विचार हेतु अलग महिला विंग का गठन कर दिया। लगातार मुस्लिम महिलाओं के उजागर हो रहे तीन तलाक के प्रकरणों ने सरकार को इस पर विचार के लिए बाध्य कर दिया। तब अक्टूबर 2016 में विधि आयोग ने पर्सनल ला में सुधार और समान नागरिक संहिता लाने की दिशा में विचार हेतु एक प्रश्नावली सार्वजनिक की। आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के जनरल सेक्रेटरी मौलाना वी रहमानी ने इस प्रश्नावली का बहिष्कार ही नहीं किया अपितु यह भी कहा कि मुस्लिम पर्सनल ला ईश्वरीय $कानून है और इसमें किसी भी बदलाव की सम्भावना या आवश्यकता नहीं है। 

दरअसल जब भी महिलाओं के अधिकारों के मुद्दे उभरते हैं, कट्टरपंथियों की प्रतिक्रिया निराशाजनक ही होती है। जबकि सभी धर्मों में नारी-विरोधी प्रावधानों में संशोधन समतावादी $कानून प्रणाली की आवश्यकता है। अधिकतर इस्लामिक देशों, यहां तक कि मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान ने भी शरीयत के कानून में बदलाव किये हैं। वहां सन् 1961 में द मुस्लिम फैमिली लाज आर्डिनेन्स  पारित हुआ जो कि मैरिज एण्ड फैमिली लाज  के कमीशन के सम्मुख कुछ सिफारिशों पर आधारित है। 22 इस्लामिक देशों में तीन तला$क प्रतिबंधित है। ईरान, पेलिस्टाइन, इजिप्त आदि में मुस्लिम विधि के कुछ महत्वपूर्ण भागों की नई संहिता तैयार की गई है और सुधार के उद्देश्य से मुस्लिम विवाह-विच्छेद अधिनियम में परिवर्तन किये गए हैं। मिस्र पहला ऐसा देश है जिसने वर्ष 1929 में तलाक-पद्धति में परिवर्तन किया और तलाक के लिए 90 दिनों की प्रतीक्षा अवधि निर्धारित की। वैधानिक तला$क की घोषणा न्यायालय द्वारा की जाती है। इसके दो प्रकार हैं-


1. जिहार-जब कोई मुस्लिम पुरुष किसी ऐसी स्त्री से निकाह कर लेता है जिसे इस्लाम धर्मानुसार निषिद्ध घोषित किया गया हो; तो बीवी शौहर से इस कार्य के लिए प्रायश्चित करने का आग्रह करती है और उसे लैंगिक सम्बन्ध स्थापित नहीं करने देती। पति द्वारा प्रायश्चित न किये जाने पर वह न्यायालय में तलाकके लिए प्रार्थनापत्र दे सकती है।

2. लियान-पति द्वारा पत्नी पर व्यभिचार का झूठा आरोप लगाने पर पत्नी न्यायालय में तलाक का दावा पेश कर सकती है। पति द्वारा आरोप वापस लिए जानेे पर मुकदमा समाप्त हो सकता है अन्यथा तला$कहो जाता है। उपर्युक्त अधिनियमों ने स्त्री को कुछ सीमा तक अधिकार-सम्पन्न बनाया मगर पुरुषों को प्राप्त मौखिक तला$क का अधिकार उस पर आज भी भारी पड़ता हैै। मर्दों द्वारा सिर्फ तलाक  के उच्चारण को सम्बन्ध-विच्छेद मान लिया जाना, सोशल मीडिया जैसे -स्काइप, वाट्सएप या एसएमएस द्वारा तला$क दे दिया जाना हाल के दिनोंं में बहुत बढ़ गया है। इस कारण मुस्लिम स्त्रियों का वैवाहिक जीवन भयमुक्त नहीं रह गया है। दरअसल कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन, मुस्लिम विद्वान, राजनीतिज्ञ और मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड भी अपनी महिलाओं के जीवन के अधिकार के सन्दर्भ में कभी प्रगतिशील नहीं रहे।

धार्मिक आस्था के नाम पर स्त्रियों का शोषण बदस्तूर जारी रहा। कोई सरकार इस विवादित मुद्दे पर साहसिक पहल नहीें कर सकी। अन्तत: मुस्लिम महिलाएं ही न सिर्फ  तीन तलाक के खिलाफ लामबन्द हुईं बल्कि सर्वोच्च न्यायालय तक भी जा पहुंचीं। 50 हजार महिलाओं ने तीन तलाक को खत्म करने की याचिका पर हस्ताक्षर किये। फिर लम्बी बहस और तर्क-वितर्क के बाद सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय सामने आया। न्यायाधीश कुरियन जोसेफ ने अपने निर्णय में कहा कि- सर्वोच्च न्यायालय पहले भी शमीम आरा के मामले में तीन तलाक  को कानूनन गलत करार दे चुका है। तब कोर्ट ने इसकी विस्तार से वजह नहीं बताई थी; अब बताने की जरूरत है।

इस्लामी कानून के चार स्रोत हैं- कुरान, हदीस, इज्मा और कियास।  कुरान मौलिक है। जो बात कुरान में नहीं, उसे मौलिक नहीं माना जा सकता। बाकी स्रोतों में कोई भी बात कुरान में लिखी बात के विरुद्ध नहीं हो सकती। 1937 बग शरीयत एप्लीकेशन एक्ट का मकसद मुस्लिम समाज से कुरान से बाहर की बातों को हटाना था। मेरा मानना है कि तीन तला$क को संविधान में मिले धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत संरक्षण हासिल नहीं है।

 बहरहाल, तीन तलाक पर सरकार ने कानून तो बना दिया, सम्भव है कि वह लागू भी हो जाए। परन्तु तीन तलाक पर प्रस्तावित कानून महिलाओं की सभी समस्याओं का समाधान नहीं है। जहां तक महिलाओं को समान अधिकार और सम्मान दिलवाने की बात है तो , जब तलाक देने वाले पति को जेल भेज दिया जाएगा और शादी का रिश्ता ही नहीं बचेगा तो कैसा हक और कैसा सम्मान? मुस्लिम महिला कोर्ट का दरवाजा इसलिए खटखटाती है कि वो पति के साथ रह सके और उसे आर्थिक मदद मिलती रहे।  लेकिन पति को जेल भेज देने से उसे दोनों ही अधिकार नहीं मिलेंगे। विवाह एक सामाजिक अनुबन्ध है तो फिर उसे तोड़ने पर आपराधिक मामला क्यों बनाया जाए? विधेयक में निकाह, हलाला, बहुविवाह और दूसरे तरह के तलाक के बारे में कोई जिक्र नहीं है। विधेयक इस पर भी चुप है कि पति के जेल चले जाने पर पत्नी को गुजारा-भत्ता कौन देगा, सरकार या तलाक देने वाला पति या पति का परिवार? एक और महत्वपूर्ण प्रश्न यह कि बिना तला$क बोले अगर पति छोड़ दे तो उस सूरत में सरकार के पास नये कानून में क्या प्रावधान है? मुस्लिम महिलाओं की सच्ची मदद के लिए हलाला और बहुविवाह पर भी रोक जरूरी है।

बहरहाल, लोकसभा में मुस्लिम महिला वैवाहिक अधिकार संरक्षण विधेयक 2017 पास हो गया है। लेकिन यह केवल तीन तलाकयानी तलाक-उल-बिद्दत पर केन्द्रित है जबकि महिलाओं की समस्या केवल तीन तलाक की नहीं है। मुस्लिम विवाह-विच्छेद के सभी पहलुओं पर विचार किये बिना इसके दूरगामी परिणाम की आशा नहीं की जा सकती।

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