प्रधानमंत्री जी जरा मुस्कुराइये

प्रधानमंत्री ने उत्तरप्रदेश की एक सभा में गर्जना की- राजनीतिक दलों को एक-एक पाई का हिसाब देना होगा। सवाल है कि क्या राजनीतिक दल एक-एक पाई का हिसाब नहीं देते। ...

प्रधानमंत्री जी जरा मुस्कुराइये
प्रभाकर चौबे

प्रभाकर चौबे


प्रधानमंत्री ने उत्तरप्रदेश की एक सभा में गर्जना की- राजनीतिक दलों को एक-एक पाई का हिसाब देना होगा। सवाल है कि क्या राजनीतिक दल एक-एक पाई का हिसाब नहीं देते। नहीं देते होंगे, तभी तो प्रधानमंत्री उन्हें चेता रहे हैं कि एक-एक पाई का हिसाब देना होगा- मतलब प्रधानमंत्री को मालूम है कि राजनीतिक दल एक-एक पाई का हिसाब नहीं देते। इसका मतलब यह हुआ कि भाजपा भी एक-एक पाई का हिसाब नहीं देती। प्रधानमंत्री मोदी भाजपा से हंै। तो क्या कभी उन्होंने भाजपा से एक-एक पाई का हिसाब देने कहा? हो सकता है कहा हो, किसी को पता न चला हो। चुपके से कान में कह दिया हो कि एक-एक पाई का हिसाब दो। अब सार्वजनिक कर रहे हंै। हो सकता है भाजपा ने मोदीजी की सलाह न मानी हो और एक-एक पाई का हिसाब न दिया हो तो उन्हें क्रोध आ गया और सभा में फटकारा कि एक-एक पाई का हिसाब दो। पता नहीं क्या बात है, रहस्य है। राजनीति का रहस्य समझ में आता नहीं। कुछ रहस्य तो पार्टी तक में केवल मुखिया को पता होता है। नोटबंदी का निर्णय प्रधानमंत्री ने लिया और यह इतना गुप्त रखा गया कि वित्तमंत्री को तक पता नहीं चला। आगे अगर इस राजनीति पर महाकाव्य लिखा जाएगा तो कवि लिखेगा- जेटली तक यह मरम न जाना। प्रधानमंत्री ने खुद कहा कि किसी को कानोंकान खबर नहीं लगने दी। अगर एक दिन भी इधर-उधर होता, किसी के कान में बात गई होती तो ये कालाधन वाले सब वारा-न्यारा कर देते। प्रधानमंत्री ने राजनीतिक दलों को चेतावनी सी दी है कि पाई-पाई का हिसाब देना होगा। किसको देना होगा यह नहीं बताया। क्या प्रधानमंत्री खुद पाई-पाई का हिसाब लेंगे? राजनीतिक दलों की खाता- बही की जांच करेंगे। वित्तमंत्री को यह काम सौंपा जाएगा। लेकिन हमारे प्रधानमंत्री तो हर काम खुद करते हैं। किसी को काम सौंपते नहीं अपना काम खुद करो की नीति पर चलते हैं और इसीलिए स्वस्थ भी है। आमसभा में प्रधानमंत्री ने यह तो बताया नहीं कि पाई-पाई का हिसाब किसके सामने पेश करना है। कुछ दल तो अपनी खाता-बही लेकर घूम रहे हैं कि लो, देख लो हिसाब। भाजपा के प्रवक्ता तो कह रहे हैं उनकी पार्टी का हिसाब चोखा रहता है। कांग्रेस अपना हिसाब देखे। वैसे आज तक तो किसी पार्टी ने पाई-पाई का हिसाब पेश किया हो, ऐसा तो सुनने-पढऩे में आया नहीं। चुनाव आयोग को हिसाब दे दिया, बस। कहां से चंदा आता है, आय के स्रोत क्या हैं, खर्च किन-किन मदों में किया जाता है, यह तो बताया नहीं जाता और तो और आय का स्रोत बताना उनके लिए जरूरी भी नहीं है। अब इस हालात में पाई-पाई का हिसाब देने की बात अलग, रुपया-रुपया तक का हिसाब नहीं दिया जाता। आमजन को राजनीतिक दलों के हिसाब-किताब की जानकारी नहीं होती। कोई नहीं बताता कि पार्टी चल किस तरह रही।
 मतलब पैसा कहां से आता है, कहां जाता है, यह रहस्य है, लेकिन इनके काम चलते हैं, चुनाव में प्रत्याशी खर्च का हिसाब भी चुनाव आयोग को पेश करते हैं। गजब है- यह तो यूं हुआ कि ‘कुछ नहीं का, कुछ नहीं को हिसाब देना...। चुनाव आयोग इतना ही देखता है कि हिसाब ठीक है- मतलब आडिट का होता है। लोकतंत्र में जनता को अडिटर का काम करना चाहिए। लेकिन जनता को ही पता नहीं कि चंदा आता कहां से है।
एक गीत है- नदिया आये कहां से जाये कहां रे...। प्रधानमंत्री की गर्जना कि राजनीतिक दलों को पाई-पाई का हिसाब देना होगा सुनकर राजनीतिक दलों ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। सब मुस्कुराने लगे। सबने सोचा, बोलने की पूरी आ•ाादी है, बोलते जाओ... बोलते जाओ...। वैसे पाई-पाई का हिसाब तो महात्मा गांधी ही रखते थे, यह सब लिखत में है। चंदा के हिसाब के मामले में बड़े कठोर थे- एक-एक पाई का हिसाब जब चाहो तब देख लो। वैसे आश्रम का हिसाब रखना और पार्टी का हिसाब रखना, दोनों में फर्क है। गांधीजी ने न चुनाव लड़ा न चुनाव मैनेजमेंट किया।
जो चुनाव लड़ते हैं, जिन्हें सत्ता पाने के लिए तरह-तरह के करतब करने पड़ते हैं, उनसे पूछो कि ‘हिसाब’ किसे कहते हैं। पार्टी किस तरह चलाई जाती है। सत्ता किस तरह प्राप्त की जाती है- सेंत-मेंत में कुछ नहीं हो जाता। कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं और ऐसा पापड़ बेलने का हिसाब रखा जाए, हिसाब दिया जाए तो चल गई पार्टी। आज तक कितनों ने कहा कि राजनीतिक दल अपना हिसाब सार्वजनिक करें, हिसाब दें, आय के स्रोत बतायें...। बड़े-बड़े आए, चल दिए। कहने का मतलब हिसाब के मामले में राजनीतिक दल का कलेजा मजबूत है, बड़े-बड़े तूफान का सामना कर लेती हैं राजनीतिक पार्टियां... इसलिए यह मानकर चलिए कि हिसाब पेश किया, हिसाब देखा, हिसाब दुरुस्त पाया। सीन एंड फाईल। फाईल बंद। वैसे प्रधानमंत्री सब जानते-समझते हैं, इसी व्यवस्था से आए हैं, बढ़े हैं। लेकिन जनता को बताना है कि तुम्हारा प्रधानमंत्री तेज-तर्राट है, सबसे हिसाब मांगता है, पाई-पाई का हिसाब मांगता है और हिसाब देने की बात सुनते ही भ्रष्ट राजनीतिक दलों को बुखार आ जाता है।
अपने प्रधानमंत्री को गुस्सा बहुत आता है- बहुत क्या वे हमेशा ही गुस्से में होते हैं। आज तक किसी आमसभा या मीटिंग में तनावरहित चेहरा उनका दिखा नहीं। पहले क्या था पता नहीं, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव की सभाओं में जो उनका दहाडऩा शुरू हुआ वह आज अढ़ाई साल गुजर जाने के बाद तक चल रहा है। लगता है उनकी गर्जना स्थायी हो गई है, जैसे कभी-कभी हिचकी लगातार आने-लगती है, कई उपाय करो नहीं रुकती। प्रधानमंत्री को गुस्सा छोड़ नहीं रहा- गुस्सा ने तुम्हें जकड़ रखा है। 2014 के चुनाव के समय का गुस्सा पेर रहा है। केजरीवाल जी की खांसी तो ठीक हो गई है। मोदी जी का गुस्सा ठीक नहीं हो रहा। लगता है राज्यसभा में पूर्ण बहुमत पाने के बाद और संविधान में मनमर्जी संशोधन कर लेने के बाद ही उनका गुस्सा शांत होगा। संविधान के दो-तीन प्रावधान हटाना है- धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, आरक्षण आदि। ये हटें तो चैन मिले। 2014 के चुनाव के समय मोदीजी का गुस्सा सातवें आसमान पर था- आज भी वहीं है। कहते रहे- बाप-बेटी ने राज्य को लूटा (बाद में उनके साथ सरकार बना ली) बहरहाल ये राजनीति है। गुस्से में बोलते- कालाधन 15 दिन में देश वापस लाया जाएगा, हर एक के बैंक खाते में 15-15 लाख जमा होंगे (लोग बैंक में खाता खुलवाने लगे) कहते कालाधन वालों को जेल भेजा जाएगा, उनके नाम उजागर किये जायेंगे। आज तक वे केवल गुस्सा में है, कुछ हुआ नहीं।  लगता है चुनाव सामने देखकर प्रधानमंत्री ताव में आ जाते हैं। आगे 5 राज्यों के चुनाव है तो वे गुस्से में हैं। मतलब अभी 2019 तक उनका यही रौद्ररूप रहेगा। आगे कुछ राज्यों के चुनाव होंगे, फिर लोकसभा के लिए चुनाव होगा... मतलब देशवासी अपने प्रधानमंत्री का हंसता हुआ  चेहरा नहीं देख पायेंगे। बस तना हुआ चेहरा...। इससे अच्छा तो लोकसभा और राज्यों की विधान सभा के चुनाव एक साथ हों, हमारे प्रधानमंत्री एक बार गुस्सा में रहें... ये क्योंकि सालों तना चेहरा लेकर जनता के सामने आना पड़े। हमारे प्रधानमंत्री का न तो कोई यादगार कार्टून बना, न उनसे सम्बंधित किसी घटना को लेकर कार्टून बना, न उन पर व्यंग्य, कविता लिखी गई न व्यंग्य किया गया- देश के रचनाधर्मी क्या इतने डरे हुए हैं। डरा कर रखा गया है। सबसे ज्यादा कार्टून तो गांधी-नेहरू पर बने और व्यंग्य, कविताएं लिखी गईं।
अगर राष्ट्रप्रमुख का कार्टून न बने और व्यंग्य का पात्र न बनाया जाए तो लगता है बौद्धिक वर्ग में वह पापुलर नहीं है। कार्टून उसकी पापुलरटी का मापदंड होता है। कार्टून कोई गाली नहीं है- यह जन अभिव्यक्ति है। नेता पर व्यंग्य करना, उस पर कार्टून बनाना उसे सांस्कृतिक मंच पर लाना होता है। गांधी- नेहरू-जयप्रकाश तो अपने पर बने कार्टून और व्यंग्य को रुचि से देखते रहे। लगता है मोदी जी का रौद्ररूप ही याद रखा जाए ऐसा शायद आदेश है। और देश के रचनाधर्मियों में एक तरह का आतंक-भय बनाकर रखा गया है कि नो कार्टून, नो व्यंग्य... साहब नाराज हो गए तो आटे-दाल का भाव याद दिला देंगे...। वैसे मोदीजी ने नोटबंदी कर आटे-दाल के भाव याद दिला दिया। अपने ही पैसे के लिए बैंक के सामने लाईन पर खड़े करा दिया। सब्जी, दूध, दवा, डॉक्टर को देने चिल्हर न होने पर कितनी पीड़ा, कष्ट इसका एहसास करा दिया।  प्रधानमंत्री जी जरा सहज होईये, मुस्कुराइये, खिलखिलाकर हंसिये, देशवासियों के चेहरे पर मुस्कुराहट आएगी। आपका तना चेहरा आतंक पैदा कर रहा। आप पर कोई अच्छा-सा सेटायर नहीं लिख पा रहा। डर रहा है। संस्कृत कर्मी डर गये तो सूखी सत्ता जनता का क्या विकास करेगी... बाकी आप जाने, आप के लोग जानें।
prabhakarchaube@gmail.com

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