इन आंदोलनों से सबक सीखने की जरूरत 

फिलहाल जिस संकट से ईरान गुजर रहा है वह अकेले ईरान का संकट नहीं है बल्कि दुनिया के बहुत से देश इस प्रकार के संकट से गुजर रहे हैं...

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इन आंदोलनों से सबक सीखने की जरूरत 
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- डॉ. रहीस सिंह

फिलहाल जिस संकट से ईरान गुजर रहा है वह अकेले ईरान का संकट नहीं है बल्कि दुनिया के बहुत से देश इस प्रकार के संकट से गुजर रहे हैं। कारण यह है कि दुनिया अधिकांश देश जीडीपी अर्थशास्त्र में उलझे हुए हैं लेकिन वे लोगों को सुविधाएं देने या युवाओं को रोजगार देने में असमर्थ हैं। खास बात यह है कि दुनिया के ये देश अपनी नाकामियों को नहीं देखते बल्कि जीडीपी इकोनॉमी और इंवेट पॉलिटिक्स के जरिए सारे समाधान ढूंढ लेना चाहते हैं। यही हाल ईरान के संदर्भ में हुआ। अब अमेरिका और कुछ पश्चिमी दुनिया के देश ईरान सरकार को गलत और प्रदर्शनकारियों को सही ठहराने लगे हैं। यह वैश्विक विशेषता भी नितांत गलत है जो दुनिया में एकता और प्रगति के लिहाज से हितकर नहीं है।  ट्रंप प्रशासन ने इसे एक अवसर के रूप में देखा और इस मुद्दे को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाने पर जोर दिया जबकि रूस ने अमेरिका का विरोध किया।

28 दिसम्बर 2017 को ईरान के मशाद शहर में एक आंदोलन शुरू हुआ। यद्यपि यह आंदोलन दबाया जा चुका है, लेकिन इससे जुड़े कुछ सवाल बेहद अहम हैं। पहला यह कि क्या किसी देश के जीडीपी की बढ़ती दर या प्रतिव्यक्ति आय जैसी चीजें सामाजिक-आर्थिक न्याय का उचित पैमाना होती हैं? दूसरा क्या किसी चुनाव में मिला मत प्रतिशत इस बात की गारण्टी होता है कि वह चुना हुआ शासक जनता के हितों के लिए काम करेगा? क्या विपक्ष के निरन्तर कमजोर होने के कारण जनता स्वयं प्रतिपक्ष का काम करने के लिए विवश हो जाती है जिसके प्रतिफल ऐसे आंदोलनों के रूप में सामने आते हैं?

गौर से देखें तो ईरान में उभरे आंदोलन में एक बार वही झलक दिखी जो ट्यूनीशिया में वर्ष 2009 में उभरी जास्मिन क्रांति में दिखी थी जिसने जिने अल आबिदीन बेन अली, हुस्नी मुबारक तथा गद्दाफी जैसे तानाशाहों के वजूद को समाप्त कर दिया था। जास्मिन क्रांति की एक खास विशेषता यह थी कि उसका कोई नेता नहीं था बल्कि लोग स्वत:स्फूर्त थे, ठीक उसी तरह से ईरान में भी जो आंदोलन हुआ उसका कोई नेता नहीं था बल्कि लोग स्वयं अपना नेतृत्व कर रहे थे। जास्मिन क्रांति ने पहली बार यह स्पष्ट कर दिया था कि मतों का प्रतिशत इस बात की गारण्टी नहीं देता कि शासक लोकप्रिय है और जनदायित्वों से बंधा है।

उदाहरण के रूप में उस समय ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति बेन अली अपने 5 वर्षों के कार्यकाल के बाद निरन्तर कई बार जीत हासिल कर चुके थे और क्रांति आरम्भ होने से कुछ समय पहले ही 80 प्रतिशत मतों के साथ विजय हासिल करके सत्ता में आए थे। कुल मिलाकर जास्मिन क्रांति ने यह संदेश दिया था कि एक भ्रष्ट और भौतिकवादी शासक सिर्फ प्रतिव्यक्ति आय और जीडीपी के आंकड़े दिखाकर लम्बे समय तक देश की सत्ता पर काबिज तो रह सकता है लेकिन लोकप्रिय नहीं हो सकता। 

28 दिसम्बर को मसाद से शुरू हुए आंदोलन धीरे-धीरे ईरान के कई शहरों तक पहुंच गये। इस आंदोलन की शुरूआत मूलत: बढ़ती हुई महंगाई के खिलाफ थी लेकिन अगले दो दिनों के भीतर ही प्रदर्शनकारी राजधानी तेहरान सहित कई नगरों तक विस्तार ले गये। ये प्रदर्शनकारी बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे जिनके प्रदर्शन के दौरान 'रोहानी मुर्दाबाद, 'फिलिस्तीन को भूल जाओ' जैसे नारे लग रहे थे। वे बोल रहे थे कि 'लोग भीख मांग रहे हैं और हुक्मरान मौलवी लोग खुद को खुदा समझने लगे हैं।' मध्य पूर्व में दबदबा कायम करने की ईरान की कोशिशों पर मसाद शहर में तंज के साथ नारे सुनाई दिए थे- 'न गाजा, न लेबनान, मेरी है ईरान।' मतलब यह है कि प्रदर्शनकारी न किसी बहकावे में कोई आंदोलन कर रहे थे, न किसी देश के उकसावे में आकर बल्कि वे ईरान की जमीनी हकीकत से उपजे थे जिनमें व्यवस्था के प्रति रोष था। चूंकि आंदोलनकारी अपने आंदोलन के लिए सरकार और सुप्रीम धार्मिक नेता की नाकामियों को दोषी बता रहे थे, इसलिए इसे न ही सरकार सुन सकती थी और सुप्रीम लीडर के कट्टरपंथी समर्थकों।

जाहिर इसे दुनिया के दूसरे देशों की तरफ धकेला जाता, यही हुआ भी। यही नहीं इसे आंदोलन को काउंटर करने के लिए प्रतिआंदोलनकारी भी उतारे गये जो राष्ट्रपति हसन रोहानी और सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह खुमैनी के समर्थन में आवाज बुलंद कर रहे थे। लेकिन इनकी संख्या आंदोलनकारियों के मुकाबले बहुत कम थी, इसलिए ये आंदोलनकारियों को रोक नहीं पाए। परिणाम यह हुआ कि कुछ ही समय में आंदोलन एक दर्जन से भी अधिक शहरों तक फैल गया जिनमें जनजान, केरमानशाह, खोरामाबाद, अबार, अराक, दोरुद, इजेह, तोनेकाबोन, तेहरान, करज, मशाद, शहरेकोर्द और बांदेर अब्बास जैसे नगर शामिल हैं। अच्छी बात यह है कि ईरान के राष्ट्रपति हसन रोहानी ने यह स्वीकार किया कि यह प्रदर्शन लोगों में बढ़ रही हताशा का परिणाम है।


सरकारें जब नाकाम साबित होती हैं और जब उनके खिलाफ आम आदमी का गुस्सा व्यक्त होता है, तो उनका सबसे पहला प्रहार उन माध्यमों पर होता है जिसके जरिए लोग एक-दूसरे से आसानी से जुड़ सकते हैं। रूहानी सरकार ने भी यही किया। उसे भी सोशल मीडिया और खासकर टेलीग्राम में दोष नजर आया फलत: उसने कई मैसेजिंग एप्स पर रोक लगा दी और टेलीग्राम से हिंसा भड़काने वाले अकाउंट्स को बंद करने के आदेश दिए। सवाल यह उठता है कि क्या जब सोशल मीडिया नहीं था, तब क्रांतियां नहीं हुईं थीं? सोशल मीडिया विचारों के प्रसार एवं कनेक्टिविटी का एक माध्यम है न कि जनउभारों अथवा आंदोलनों या क्रांतियों का। यह अलग बात है कि फ्रांसीसी क्रांति के लिए भी फ्रांस के सम्राट ने कहा था- 'रूसो वाज बैड मैन, ही कॉज्ड रिवोल्यूशन' लेकिन सच में दोषी कौन था? जिस तरह से ईरानी अर्थव्यवस्था रसातल में जा रही है उसके कारण आने वाले समय में स्थितियां और भी बदतर होंगी। यानि ईरान सरकार आज आंदोलन को दबाने में सफल हो गई है लेकिन ईरान के लोगों ने यह जान लिया है कि अब वे बिना किसी नेतृत्व के ही आंदोलन कर सकते हैं। ध्यान रहे कि तमाम ईरानी कंपनियां खुद को दिवालिया घोषित कर चुकी हैं, जिससे हजारों लोगों की बचतें डूब गई हैं।

ईरान में एक बहुत बड़ी मात्रा में ऐसे लोग हैं जिनके पास जीविका के साधन नहीं हैं। देश में बेरोजगारी की दर 12 प्रतिशत के आसपास है लेकिन देश के कुछ इलाकों में बेरोजगारी की दर 60 प्रतिशत तक पहुंच गई है। जब आय नदारद हो, रोजगार बढ़ने की बजाय घट रहे हों तब जनता स्वत:स्फूर्त आंदोलनों से प्रेरणा लेकर स्वयं ही आगे आ जाती है। यही ईरान में हुआ। अब भले ही ईरान की सरकार और धर्माधिकारी यह कह कर अपनी आर्थिक अक्षमता को स्वीकार करने की बजाय परदा डालें कि ईरान में दंगे भड़काने का काम ब्रिटेन, अमेरिका और सऊदी अरब ने किया है अथवा यदि टेलीग्राम और इंस्टाग्राम जैसी सेवाएं न होतीं तो ईरान में कभी आंदोलन ही नहीं होता।

हालांकि आंदोलनकारियों की नाराजगी की एक वजह यह अवश्य थी कि अपनी विदेश नीति के कारण ईरान कई क्षेत्रीय संकटों में उलझा हुआ है तथा जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है जिसका खामियाजा ईरान के नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है। ईरान के लोग यह भी मान रहे हैं कि सरकार की कूटनीतिक असफलता के कारण ही ईरान को दुनिया के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है, जिसके कारण देश की आर्थिक प्रगति और रोजगार निर्माण की गति रुकी हुई है।

फिलहाल जिस संकट से ईरान गुजर रहा है वह अकेले ईरान का संकट नहीं है बल्कि दुनिया के बहुत से देश इस प्रकार के संकट से गुजर रहे हैं। कारण यह है कि दुनिया अधिकांश देश जीडीपी अर्थशास्त्र में उलझे हुए हैं लेकिन वे लोगों को सुविधाएं देने या युवाओं को रोजगार देने में असमर्थ हैं। खास बात यह है कि दुनिया के ये देश अपनी नाकामियों को नहीं देखते बल्कि जीडीपी इकोनॉमी और इंवेट पॉलिटिक्स के जरिए सारे समाधान ढूंढ लेना चाहते हैं। यही हाल ईरान के संदर्भ में हुआ। अब अमेरिका और कुछ पश्चिमी दुनिया के देश ईरान सरकार को गलत और प्रदर्शनकारियों को सही ठहराने लगे हैं। यह वैश्विक विशेषता भी नितांत गलत है जो दुनिया में एकता और प्रगति के लिहाज से हितकर नहीं है।  ट्रंप प्रशासन ने इसे एक अवसर के रूप में देखा और इस मुद्दे को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाने पर जोर दिया जबकि रूस ने अमेरिका का विरोध किया।

उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी दूत निकी हेली ने ईरान के प्रदर्शनकारियों को 'बहादुर लोग' कहकर उनकी तारी$फ की है। भले ही रूस और चीन इस विषय पर अमेरिका के खिलाफ खड़े हुए हों लेकिन इससे यह संदेश तो जाता है कि ईरान को अपना ट्रैक बदलने की जरूरत है। उसे यह विचार करने की भी जरूरत है कि आखिर ईरान में इतनी जल्दी प्रतिक्रिया क्यों हुई?

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