'गुजरात’, 'गाय’ और 'हिन्दुत्व’ पर सेंसरबोर्ड का एतराज

दुर्भाग्य से इन 'खिदमतगारों’ को ऐसे मामलों से वैचारिक स्तर पर निपटने में हमेशा ही असुविधा होती रही है...

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- कृष्ण प्रताप सिंह

दुर्भाग्य से इन 'खिदमतगारोंको ऐसे मामलों से वैचारिक स्तर पर निपटने में हमेशा ही असुविधा होती रही है। इसीलिए उन्होंने नरेन्द्र मोदी के रूप में नया नायक पाते ही इन सबको 'अपनीसत्ता की दमनात्मकता के हवाले कर 'गौरवान्वितहोने का सिलसिला शुरू कर रखा है। मोदी सरकार को भी इसके लिए अपने अकादमिक संवैधानिक संस्थानों के दुरुपयोग में किसी भी सीमा तक जाने से परहेज नहीं है। होता तो यह हो ही नहीं सकता था कि जिस फिल्म प्रमाणन बोर्ड की स्थापना फिल्म निर्माताओं की निरंकुशता रोकने के लिए की गई थी, वह स्वयं सरकार के राजनीतिक या वैचारिक विरोधियों से निपटने का निरंकुश हथियार बन जाये।

 

केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन की ' आर्ग्यूमेंटेटिव इंडियन’ नामक पुस्तक पर इसी नाम से निर्मित डॉक्यूमेंट्री फिल्म में आये 'गुजरात’, 'गाय’, 'हिन्दुत्व’ और 'हिन्दू इंडिया’ जैसे शब्दों पर आपत्ति जताई और कहा है कि वह फिल्म को तभी प्रमाणित करेगा, जब इन शब्दों को निकाल, 'म्यूट’ या 'बीप’ कर दिया जाये।

इन शब्दों को निकालने, म्यूट या बीप करने का कोई ऐसा संदर्भ होता, जिसे तोड़-मरोड़ अथवा अनुकूलित करने से प्रतिद्वंद्वियों पर बढ़त पाने या राजनीतिक लाभ उठाने में मदद मिलती तो कोई शक नहीं कि अब तक इनके 'खुदाई खिदमतगार’ तमककर भड़क उठते और लाल-पीले हो रहे होते। यह भी पूछते कि क्या अब इन शब्दों को जुबान पर लाना भी अपराध हो गया है या कि इनकी चर्चा इस नहीं तो और किस देश में होगी?

लेकिन चूंकि फिल्म में ये शब्द अमत्र्य सेन के मुंह से निकले हैं, जिन्हें हिन्दुत्व का मुखर आलोचक माना जाता है और समझा जाता है कि फिल्म में इन्हें लेकर उनका रुख ऐसे सवाल खड़े करने वाला होगा, जिनका सामना करते हुए 'खिदमतगार’ लाजवाब हो जायें, इसलिए बोर्ड की इस ज्यादती के खिलाफ मुंह खोलते हुए उनका थूक गले में ही अटक जा रहा है। जाहिर है कि वे इन शब्दों को लेकर फिल्ममेकर सुमन घोष द्वारा बोर्ड के आदेश की अवज्ञा का भी समर्थन नहीं ही करने वाले। न ही उनके इस मत से सहमति जताने वाले कि 'बोर्ड के रवैये से इस डाक्यूमेंट्री की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है और मैं हमारे समय के कुछ बेहद अच्छे चिंतकों में से एक अमत्र्य सेन के विचारों को 'बीप’ या 'म्यूट’ करने के सुझाव से सहमत नहीं हूं।’

दुर्भाग्य से इन 'खिदमतगारों’ को ऐसे मामलों से वैचारिक स्तर पर निपटने में हमेशा ही असुविधा होती रही है। इसीलिए उन्होंने नरेन्द्र मोदी के रूप में नया नायक पाते ही इन सबको 'अपनी’ सत्ता की दमनात्मकता के हवाले कर 'गौरवान्वित’ होने का सिलसिला शुरू कर रखा है। मोदी सरकार को भी इसके लिए अपने अकादमिक व संवैधानिक संस्थानों के दुरुपयोग में किसी भी सीमा तक जाने से परहेज नहीं है। होता तो यह हो ही नहीं सकता था कि जिस फिल्म प्रमाणन बोर्ड की स्थापना फिल्म निर्माताओं की निरंकुशता रोकने के लिए की गई थी, वह स्वयं सरकार के राजनीतिक या वैचारिक विरोधियों से निपटने का निरंकुश हथियार बन जाये।


प्रसंगवश, अमत्र्य सेन द्वारा फिल्म में 'गुजरात’ शब्द का इस्तेमाल कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में दिये एक भाषण में किया गया है, जबकि 'गाय’ शब्द का एक बहस के दौरान। 'हिंदुत्व’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने कहा है कि वे भारत को हिंदुत्व के चश्मे से नहीं देखते, बल्कि उनकी भारत की कल्पना अलग है। वैसे यह कोई छुपी बात नहीं कि वे दक्षिणपंथी विचारों व प्रवृत्तियों के विरोधी हैं। उन्होंने पश्चिम बंगाल के हाल के साम्प्रदायिक घटनाक्रमों को लेकर भी भाजपा की आलोचना की और पूछा है कि हिन्दू-मुस्लिम तनाव का लाभ हमेशा उसके ही खाते में क्यों जाता है। जाहिर है कि उनके ये विचार भाजपा या मोदी सरकार को नहीं सुहाने वाले।

ऐसे में सवाल है कि क्या बोर्ड '' आर्ग्यूमेंटेटिव इंडियनको सेन के इन विचारों की सजा दे रहा है? अगर हां, तो भी यह कोई ऐसी पहली फिल्म नहीं है, जिसे प्रमाणित करने में वह मोदी सरकार की तरफ से उसके विरोधियों से भिड़ता दिखता हो। 2008 में अहमदाबाद में हुए बमविस्फोट पर बनी फिल्म 'समीर’ के एक डायलॉग में 'मन की बात’ का जिक्र आया तो भी बोर्ड ने उसे हटाने को कहा। फिल्म के आखिरी दृश्य में खलनायक का नायक से यह कहना भी गंवारा नहीं किया कि 'एक मन की बात कहूं।’ उसकी मानें तो चूंकि 'मन की बात’ पीएम का रेडियो शो है इसलिए ये डायलाग तो फिल्म से हटना ही चाहिए। क्या अर्थ है इसका? यही तो कि जब तक पीएम रेडियो पर 'मन की बात’ करेंगे, बोर्ड किसी और को अपने मन की बात नहीं करने देगा?

ऐसी ही एक और नजीर है 'फिल्लौरी’, जिसमें भूतनी से डरा हुआ हीरो 'हनुमान चालीसा’ पढ़ने लगता है, तो भी वह नहीं भागती। बोर्ड ने इस 'आपत्तिजनक’ दृश्य को हटाने के लिए तर्क दिया कि हमारे समाज में मान्यता है कि हनुमान चालीसा के पाठ से भूत भाग जाते हैं, जबकि इस फिल्म में भूतनी नहीं भागती। उसके इस 'वैज्ञानिक’ दृष्टिकोण पर कौन न बलि-बलि जाये! इसके पहले बोर्ड ने कई फिल्म समारोहों में पुरस्कृत 'लिपस्टिक अंडर माय बुर्खा’ को यह कहकर प्रमाणपत्र देने से मना कर दिया था कि फिल्म 'लेडी ओरिएंटेड’ है, और उसमें उनके सपनों व फंतासियों को 'जिंदगी से ज्यादा’ तवज्जो दी गई है। इसी तरह गत मार्च में बोर्ड के कोलकाता क्षेत्रीय कार्यालय को आम लोगों पर नोटबंदी के प्रभावों पर बनी पहली बंगला फिल्म 'शून्यौता’ यानी खालीपन की रिलीज रोकने में भी संकोच नहीं हुआ था।

'जब हैरी मेट सेजल’ के तो ट्रेलर को ही लेकर बोर्ड ऐसा भड़का कि लोग कहने लगे कि इक्कीसवीं सदी के 17वें वर्ष में वह फिल्म दर्शकों को खुलेपन से बंद गली और वैज्ञानिकता से अवैज्ञानिकता की ओर ले जा रहा है। दिन भर इंटरनेट व टीवी चैनलों पर ढेर सारी अनसेंसर्ड सामग्री देखने के बावजूद उसे लगता है कि ये दर्शक अभी इतने परिपक्व नहीं हुए कि वह उनकी समझदारी को लेकर कुछ अच्छा सोच सके। तभी तो उसके अध्यक्ष 'जब हैरी मेट सेजल’ के उक्त ट्रेलर में दो किरदारों की बातचीत में आये 'इंटरकोर्स’ शब्द पर आपत्ति जताते और आलोचना होने पर फिल्ममेकर से कहते हैं कि अगर उसे आम लोगों से अपने समर्थन में एक लाख वोट मिल जाते हैं तो वे उसे अपनी सहमति दे देंगे। इस पर व्यंग्य करते हुए शाहरुख ने ठीक ही कहा, 'मैं सोचता हूं कि मेरी उम्र 18 वर्ष से कम है, इसलिए मैं इसमें वोट नहीं दे सकता।’

इसी तरह 'नाम शबाना’, 'हेवन ऑन अर्थ और 'प्रोवोक्ड’ जैसी घरेलू हिंसा की फिल्मों पर भी बोर्ड ने खास तरह से एतराज जताये। 'नाम शबाना’ से तो उसने घरेलू हिंसा के अलावा शराब की बोतल और संता-बंता जोक के सीन भी डिलीट करवा दिये। तर्क दिया, 'किसी संप्रदाय की भावना को ठेस नहीं पहुंचाया जा सकता। मजाक के तौर पर भी नहीं।’

बोर्ड की इन कारस्तानियों को 'मोदी सरकार के इशारे पर’ बताकर आलोचना की जाये तो सरकार अपना यह प्रिय तर्क दोहरा सकती है कि कांग्रेस व दूसरी पार्टियों के राज में भी 'विरोधी’ या 'नुकसानदेह’ फिल्मों व विचारों से ऐसा ही सलूक किया जाता था। उसके पास अमृत नाहटा की फिल्म 'किस्सा कुर्सी का’, सलमान रुश्दी व उनकी बहुप्रचारित पुस्तक पर प्रतिबंध और तसलीमा नसरीन को कोलकाता में रहने तक की इजाजत न दिये जाने की नजीरें हो सकती हैं। साथ ही वह गजानन माधव मुक्तिबोध की पुस्तक पर प्रतिबंध का पुराना मामला भी याद दिला सकती है। लेकिन बेहतर हो कि समझे कि मतदाताओं ने उसे हालात को पहले जैसे बनाये रखने के लिए नहीं, बदलने के लिए चुना था और किसी भी परिपक्व लोकतंत्र में विरोधी विचारों को उन पर रोक लगाकर नहीं, तार्किक परिणति तक ले जाकर निपटाया जाता है। फिर उसका कुसूर इस अर्थ में बड़ा है कि वह हर भले विचार की राह रोकती और सांप्रदायिक साजिश, हिंसा, भय, नफरत व तनाव का मार्ग प्रशस्त करती दिखाई देती है। वह अपने लोगों को तो गाय, गुजरात व हिन्दुत्व के नाम पर कोई भी बदतमीजी करने देती है और अमत्र्य सेन जैसों के मुंह से उनका उच्चारण भी कुबूल नहीं करती। ऐसा कैसे चलेगा?

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