कमजोर वर्ग की बजट से उम्मीद पूरी नहीं हुई

भारत डोगरा : वैसे तो केन्द्रीय सरकार के बजट को सदा ही कमजोर व निर्धन वर्ग की जरूरतों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए, पर इस बार ऐसी कुछ विशेष स्थितियां हैं...

भारत डोगरा
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वैसे तो केन्द्रीय सरकार के बजट को सदा ही कमजोर व निर्धन वर्ग की जरूरतों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए, पर इस बार ऐसी कुछ विशेष स्थितियां हैं जिनके कारण यह जरूरत और भी बढ़ गई हैं। यह विशेष स्थितियां मुख्य रूप से 8 नवंबर को घोषित विमुद्रीकरण के कारण उत्पन्न हुई हैं जिसका प्रतिकूल असर आज भी बहुत से लोगों पर देखा जा सकता है। ऐसे लोगों की संख्या करोड़ों में है जिन्हें कम या अधिक, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नोटबंदी के प्रतिकूल असर को झेलना पड़ा है, जिनकी आजीविका व आय पर सरकार के इस कदम का प्रतिकूल असर पड़ा है।  इसमें विशेषकर मजदूरों, प्रवासी मजदूरों, किसानों, छोटे स्तर पर अपना कार्य करने वाले दस्तकारों व छोटे उद्यमियों की स्थिति अधिक चिंताजनक है और उन्हें तुरंत राहत देने की जरूरत है।
नोटबंदी के समय लोगों को पहले तो कहा गया कि किसी बड़ेे उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उन्हें थोड़े से दिन के लिए थोड़ा सा कष्ट सहना पड़ेगा। थोड़े से दिन बीतने पर लोगों ने देखा कि नोटबंदी से जुड़े उनके कष्ट कम नहीं हो रहे हैं अपितु बढ़ रहे हैं और कोई बड़ा उद्देश्य प्राप्त होता हुआ भी नजर नहीं आ रहा है।
इस समय उन्हें दिलासा देने के लिए प्रधानमंत्री ने कहा कि आप 50 दिन का समय मुझे दे दीजिए तब तक सब ठीक हो जाएगा। 50 दिन का समय भी गुजर गया और सब ठीक नहीं हुआ। कुछ मामलों में हालात कुछ सामान्य हुए पर कई संदर्भों में लोगों विशेषकर कमजोर वर्गों के कष्ट बने रहे। किसी बड़े उद्देश्य की उपलब्धि इस समय तक भी नजर नहीं आई। इस समय प्रधानमंत्री ने विशेष संदेश प्रसारित किए तो सबको उम्मीद थी कि इसमें कोई बड़ी राहत की बात आने वाली है, पर इस संदेश से भी कोई महत्वपूर्ण राहत की दिलासा नहीं मिल सकी। कुछ अच्छी योजनाओं की बात जरूर हुई पर यह तथ्य सामने आया कि यह तो काफी पहले से बने कानून के अंतर्गत पहले ही उपलब्ध हो जानी चाहिए थीं।
अब अगला इंतजार लोगों को यह था कि केन्द्रीय सरकार के बजट से कुछ बड़ी राहत मिले जिससे उनकी बिखरी हुई आजीविका व अर्थव्यवस्था फिर से व्यवस्थित हो सके। अत: बजट में यह भरपूर प्रयास करना चाहिए था कि लोगों की यह उम्मीद इस बार पूरी हो सके और इतने इंतजार के बाद उन्हें महत्वपूर्ण राहत मिल सके। बहुत से ऐसे मजदूर हैं जिन्हें नोटबंदी के बाद बेरोजगारी झेलनी पड़ी है , जबकि बहुत से ऐसे मजदूर हैं जिनकी आय कम हो गई है। इन बेरोजगार लोगों को रोजगार मिलना बहुत जरूरी है। बहुत से छोटे स्तर के उद्यमियों का कारोबार बंद पड़ा है जिसके कारण उनके मजदूर भी बेरोजगार हैं। कुछ मजदूर शहरों से गांव लौट गए हैं। वे इंतजार कर रहे हैं कि सब स्थितियां अनुकूल बने व वे अपने रोजगार में लौट सके। कुछ मजदूरों को उद्यमियों ने कह दिया है कि जब तक हालत सुधर नहीं जाते हैं तब तक के लिए गांव चले जाओ। पर गांव में भी तो रोजगार नहीं मिल रहा है जिससे कि इन लोगों की समस्याएं बहुत बढ़ गई है।
अत: ग्रामीण क्षेत्रों की ओर भी विशेष ध्यान देने की जरूरत थी। कहां तो किसानों की आय बहुत बढ़ाने की बात पिछले बजट में कही गई थी और कहां तो नोटबंदी के कारण उनकी आजीविका को कई स्तरों पर संकटग्रस्त कर दिया गया। कई किसानों को अपनी उपज का सही दाम इस कारण नहीं मिल पाया तो कई किसानों की बुवाई भली-भांति नहीं हो सकी या उसमें देर हो गई। सहकारी समितियों, ग्रामीण बैंकों की समस्याएं भी बढ़ गई है जबकि जो स्वयं सहायता समूह पहले से भली-भांति चल रहे थे उन्हें भी नोटबंदी के कारण कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। यहां तक कि निर्धन वर्ग से पेंशन प्राप्त करने में भी बहुत कठिनाई जा रही है।
अत: कई तरह की राहत ग्रामीण निर्धन परिवारों व किसान परिवारों को देने के लिए यह अनुकूल समय है। बहुत समय से निर्धन वृद्ध लोगों की पेंशन, विधवा पेंशन व विकलांग लोगों को पेंशन बढ़ाने का मांग उठती रही है, इसमें अब देर नहीं होनी चाहिए कि साथ में यह पेंशन सभी जरूरतमंदों तक पंहुचनी चाहिए। मनरेगा की स्थिति सुधारने की बहुत जरूरत है। इस समय गांवों में रोजगार की जरूरत बढ़ गई है जबकि मनरेगा के अंतर्गत इनमें से अधिकांश लोग चाह कर भी रोजगार प्राप्त नहीं पर पा रहे हैं। अत: मनरेगा के लिए बजट को महत्वपूर्ण स्तर पर बढ़ाना जरूरी है। छोटी-मोटी वृद्धि से काम नहीं चलेगा। मात्तृत्व सहायता में वृद्धि के अनुकूल बजट बढ़ाना जरूरी है। बच्चों के पोषण व शिक्षा के बजट में वृद्धि बहुत आवश्यक है। शिक्षा व स्वास्थ्य में बजट वृद्धि की मांग बहुत समय से उठ रही है। विशेषकर आंगनवाड़ी, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बजट बढ़ाना जरूरी है। सोशल सेक्टर हो या सामाजिक क्षेत्र की कल्याणकारी योजगाओं के बजट को बढ़ाने के साथ आय व संपत्ति की विषमता को कम करने के लिए व्यापक कदमों की भी जरूरत है।
देश के कमजोर व जरूरतमंद वर्गों की इस बिगड़ती स्थिति के बीच केंद्रीय बजट की यह जिम्मेदारी बहुत बढ़ गई थी कि वह जरूरतमंदों को राहत दे तथा उनकी कठिनाईयों को कम करे। इस विशेष जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए वर्ष 2017-18 का बजट सफल नहीं हो सका है। यह बजट काफी हद तक किसी सामान्य वर्ष के बजट की तरह ही है। विशेष स्थितियों में उत्पन्न बहुत विशिष्ट जिम्मेदारियों को पूरा करने की कोई बड़ी तैयारी इसमें नजर नहीं आती है। इस बार जरूरत थी कि नोटबंदी के बहुत दुष्परिणाम झेलने वाले मजदूरों और किसानों व अन्य जरूरतमंद लोगों को बड़ी राहत दी जाती व उनकी क्षतिपूर्ति भी महत्वपूर्ण हद तक की जाती पर ऐसा नहीं हो सका। यह एक ऐसा समय है जब शहरों से मजदूरों को गांवों में लौटना पड़ा है पर गांव में भी रोजगार नहीं है। इस स्थिति में मनरेगा का कार्य महत्वपूर्ण स्तर पर बढ़ाने की जरूरत है। पर पिछले वित्तीय वर्ष में मनरेगा पर जो वास्तविक खर्च हुआ उसकी तुलना में मनरेगा में बहुत कम ही वृद्धि  की गई है। किसानों को बहुत उम्मीद थी कि तरह-तरह की विकट स्थितियों के बीच में उन्हें या तो कर्ज से महत्वपूर्ण छूट मिलेगी या अन्य कोई बड़ी राहत मिलेगी पर ऐसा नहीं हुआ। एक बड़ी उम्मीद यह भी थी कि बहुत समय से जो जरूरतमंदों की पेंशन में कोई महत्वपूर्ण वृद्धि नहीं हुई थी और पेंशन प्राप्त करने वालों की संख्या भी नहीं बढ़ायी गई है इन कमियों को इस बजट में पूरा किया जाएगा, पर यह उम्मीद भी पूरी नहीं हो सकी।
बजट में कोई ऐसी बात भी नहीं है जिससे अर्थव्यवस्था में ऐसा बड़ा मोड़ आने का संकेत मिले जिससे किसानों मजदूरों को यह उम्मीद बंधें कि उनकी आजीविका और आय पर हाल के समय में जो प्रतिकूल असर पड़ा है, वह शीघ्र दूर हो सकेगा। किसी बड़ी व नयी सोच को आगे न लाने के कारण यह बजट पुरानी सीमाओं में ही बंधा रह गया और आज के समय की विशिष्ठ जरूरतों को पूरा करने में समर्थ नहीं हो सका और विशेषकर सबसे जरूरतमंद लोगों की उम्मीद पर खरा नहीं उतर सका।


 

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