थोथा नारा बस है रामराज्य

शीतला सिंह : भारतीय जनता पार्टी अब कम से कम इस अर्थ में तो ‘बदल’ गई है कि मोदी सरकार के शीर्षस्थ नेता अयोध्या में राममंदिर निर्माण के सम्बन्ध में मुंह नहीं खोलना चाहते।...

शीतला सिंह
थोथा नारा बस है रामराज्य
शीतला सिंह

शीतला सिंह
भारतीय जनता पार्टी अब कम से कम इस अर्थ में तो ‘बदल’ गई है कि मोदी सरकार के शीर्षस्थ नेता अयोध्या में राममंदिर निर्माण के सम्बन्ध में मुंह नहीं खोलना चाहते। केवल उसके कुछ छुटभैये ही, जिनकी राममन्दिर आंदोलन में सक्रिय भूमिका थी, गाहे-ब-गाहे इसकी चर्चा करते हैं। अलबत्ता, एक जमात विनय कटियार जैसे आग्रहशीलों की भी है, लेकिन जनता जानती है कि उनके नारों, आग्रहों और भाषणों का कोई अर्थ नहीं है, क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी बिना अयोध्या में राममंदिर की चर्चा किये पहली बार भाजपा को उसकी आधी से अधिक सीटें जिताकर प्रधानमंत्री बन गये हैं। अब उन्हें राममंदिर के पिट चुके मुद्दे के बल पर सत्ताप्राप्ति की संभावनाएं क्षीण लगती हैं, इसलिए उन्हें अपनी सत्ता बनाये रखने और राज्यों में उसके विस्तार के लिए उन नारों की तलाश है जो जनता को नये सिरे से आकर्षित व प्रेरित कर सकें।
अब देश में 18 वर्ष से अधिक के जो युवक मतदाता बने हैं, उनकी संख्या 10 करोड़ से अधिक है और जब तक उन्हें प्रेरित-प्रभावित करके साथ नहीं लाया जायेगा, चुनाव में राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति संभव नहीं है। इसलिए उनका जीवन स्तर उठाने,  काम-धंधे की संभावनाओं व विकास के नारों को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए। इन्हीं उद्देश्यों के लिए मोदी विदेशी पूंजी को बड़े पैमाने पर आकर्षित करने के लिए लगातार विदेश यात्राएं कर रहे हैं, ताकि युवाओं के मन मस्तिष्क पर अपना सिक्का जमा सकें। यह सवाल अलग है कि जो पूंजीपति भारत आ रहे हैं, वे लाभ अर्जित करके अपने देश ले जायेंगे या उन कार्यों में लगायेंगे, जो भारत में हों या अन्यत्र, मगर अधिक लाभ का कारण बन सके।
केन्द्रीय सडक़ परिवहन, राजमार्ग और जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के संदर्भ में परिवर्तन यात्रा को सम्बोधित करने अयोध्या के जुड़वां शहर फैजाबाद पहुंचते हैं तो फोरलेन सडक़ें बनाने की घोषणा कर उसकी आधार शिला रखते हैं, राम को भूले नहीं हैं, यह संदेश देने के लिए 84 कोसी परिक्रमा मार्ग पर, जिस पर किसी भी वर्ष दो हजार यात्री भी नहीं चलते, सडक़ बनाना चाहते हैं। लेकिन आगे रामराज्य की बात करते हैं तो उसकी यथार्थता और युग के अनुसार उपयोगिता के प्रश्न पर चर्चा ही नहीं करना चाहते। इससे पहले 1989 के लोकसभा चुनाव के समय प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी अयोध्या आकर देश में रामराज्य की स्थापना की घोषणा की थी।
लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठतम नेता नानाजी देशमुख इसे बचकानी घोषणा कहा करते थे। उनका मानना था कि हम युग को घुमाकर पीछे की ओर नहीं ले जा सकते। वे पूछते थे कि रामराज्य का नारा कितना भी आकर्षक हो, लोग लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ राजशाही को स्वीकार कर लेंगे क्या? कर भी लेंगे तो राम का उत्तराधिकारी किसे बनायेंगे और वह क्या जनता को स्वीकार्य होगा? हम जानते हैं कि वह युग सडक़ों का नहीं था।  मोटरगाडिय़ों को कौन कहे, साइकिलें भी नहीं हुआ करती थीं। घोड़ों द्वारा संचालित रथ भर थे। शिक्षा-दीक्षा के लिए गिनती के गुरुकुल। पर अब तो देश में अनेक विश्वविद्यालय हैं, साथ ही ज्ञान, विज्ञान एवं टेक्नालाजी का अपरिमित विकास हुआ है जो अट्टालिकाएं, महल और आधुनिक भवन/मकान बने हैं, क्या हम रामराज्य के नाम पर उन्हें त्यागने के लिए तैयार हैं?
यह बात सही है कि सीता के पास मोबाइल या स्मार्ट फोन होता तो उनका हरण संभव नहीं होता। उनकी खोज के लिए जो प्रयत्न हुए वे भी जल्दी सफल हुए होते। वहीं लंका में भी हनुमान ने उसे जलाया तो बुझाने वाला फायर ब्रिगेड नहीं था। तीर-कमान ही उस युग के अस्त्र थे, जबकि वर्तमान युग का नागरिक दुनिया भर में बेहद विकसित व आधुनिक अस्त्र-शस्त्रों, माध्यमों व साधनों का वारिस है। अब वह लोटा, डोरी और कुएं तक ही सामित नहीं, बल्कि वृहत्तर जलकल व्यवस्था से जुडऩा चाहता है।
रामराज्य में ‘मांगे वारिधि देहिं जल’ की परिकल्पना तो है, बल्कि कहना चाहिए कि तब सब कुछ व्यक्ति की इच्छाओं से ही संभव था और प्रकृति उसे स्वीकार करने को तत्पर थी, लेकिन आज प्रकृति व्यकिति की इच्छाओं की प्रतिपूर्ति में कितनी सक्षम है? रामकाल की जनसंख्या का आकलन करने चलें तो 1947 में देश आ•ााद हुआ, तो कुल जनसंख्या लगभग 35 करोड़ थी, लेकिन अब सवा अरब से ज्यादा हो गई है। अब एक ओर ग्रामीण बिजली चाहते हैं तो दूसरी ओर घी-दूध की नदियां घटते पशुधन के कारण असंभव हो गई हैं। सवाल है कि बिजली के बजाय घी के दीये आज कितने स्वीकार्य होंगे और क्या उनसे पंखे और शीत-ताप नियंत्रक भी चलेंगे? क्या हम इन उपकरणों की आदत छोडक़र प्रकृति के भरोसे होने और रहने को तैयार हैं?
देवताओं को भी जो साधन उपलब्ध नहीं थे, आज आम आदमी उनकी अपेक्षाएं करता और चाहता है कि राज्य उनकी आपूर्ति करे। ऐसे में खाने-पीने और कपड़ों की सिलाई की बात छोड़ भी दें तो जूते-मोजे छोडक़र चरण पादुकाओं की कल्पना कितनी व्यावहारिक होगी? फिर जातीय भेदभाव का क्या होगा? दलितों-पिछड़ों को देने के लिए हमने जो आरक्षण स्वीकार किया है, क्या हम उसे त्यागेंगे? शम्बूक वध की चर्चा न भी करें तो शूद्रों को बराबरी का जो अधिकार संविधान ने स्वीकार किया है, वे  उसे छोडऩे को तैयार हो जायेंगे? अब तो उन्हें मताधिकार भी प्राप्त है और हर दल को उनका भी सहयोग व समर्थन चाहिए ही। मातृसत्तात्मक समाज व्यवस्था से पितृसत्तात्मक व्यवस्था तक की यात्रा के सिलसिले में महिलाओं की रामायण और महाभारतकालीन स्थिति पर विचार कर सीता व द्रौपदी के अन्तर को देखें तो पाण्डवों की मां कुंती के विवाह पूर्व पुत्र कर्ण को किस रूप में स्वीकार करेंगे? भारतीय संविधान में, जिसकी शपथ लेकर राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री आदि बनते हैं, लिंग, जाति व धर्म पर आधारित भेदभाव को अस्वीकार किया गया है। इसलिए हम पंचकन्याओं का प्रात:स्मरण करके पुण्यलाभ की इच्छा तो कर सकते हैं, लेकिन क्या वह व्यवस्था सवर्णों को आज स्वीकार है? आज तो उस घरेलू हिंसा निवारण कानून में, जिसे भाजपा ने भी मान्यता प्रदान की है, गर्भवती सीता को बिना कारण बताए जंगल में छोड़ देना अपराध की श्रेणी में आयेगा।
बहरहाल, राम की स्वीकार्यता केवल हिन्दुओं तक सीमित नहीं है। मुस्लिम, ईसाई व बौद्ध देशों में भी रामकथाओं का मंचन होता है और उन्हें युग, मर्यादा, व आदर्श के जनक के रूप में देखा जाता है। राम के नाम पर उनकी इस स्वीकार्यता का लाभ लेेने का प्रयत्न तो हो सकता है लेकिन जो कारक मतों को घटाने का कारण बने, लोकतंत्र में उसे भला कौन स्वीकार करेगा? जाहिर है कि राम के नाम की स्वीकार्यता का लाभ उठाने और वर्तमान युग को बदलकर उनके युग की स्थापना करने में बड़ा अन्तर है। तभी उसके परिणामों से ये तथाकथित रामभक्त घबराते हैं। मोदी भले ही प्राचीनतावादी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संस्कृति से आये हों, वर्तमान युग परिप्रेक्ष्य में सत्ता संचालन हेतु उन्हें अधिकारों की आवश्यकता होगी तो वे अपने मतदाताओं की पसंद और मान्यताओं के आधार पर ही फैसले करेंगे। वैसे ही जैसे स्वतंत्रता आन्दोलन के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने तिरंगे के सम्बन्ध में कहा था कि इसे किसी भी हिन्दू को स्वीकार नहीं करना चाहिए लेकिन आज वह सिनेमाघरों में भी अनिवार्य रूप से उसके सम्मान में खड़े होने का पक्षधर है। साफ है कि पुरानी मान्यता कितनी ही पवित्र क्यों न हो, उसकी स्वीकार्यता पर विचार नये परिप्रेक्ष्य में ही करना होगा। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोग भी इससे वाकिफ हैं। इसीलिए उनके नारे और सत्ता के प्रयत्न भी आधुनिक युग वाले बनने लगे हैं।


 

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