पुरुष बलि नहिं होत हैं, समय होत बलवान

शीतला सिंह : उत्तर प्रदेश में समाजवादी बाप-बेटे मुलायम व अखिलेश के बीच मचे उनकी पार्टी के चुनाव चिह्न के झगड़े का निपटारा तो चुनाव आयोग ने अंतत: अपने अधिकारों और सीमाओं में कर दिया।...

शीतला सिंह

शीतला सिंह
उत्तर प्रदेश में समाजवादी बाप-बेटे मुलायम व अखिलेश के बीच मचे उनकी पार्टी के चुनाव चिह्न के झगड़े का निपटारा तो चुनाव आयोग ने अंतत: अपने अधिकारों और सीमाओं में कर दिया। उसका कहना है कि वह और कुछ कर भी नहीं सकता क्योंकि चुनाव चिह्न आबंटन के लिए व्यवस्थाएं निर्धारित हैं, जिनमें स्पष्ट प्रावधान है कि पार्टी के चिह्न की बाबत उसके निर्वाचित व्यक्तियों एवं जनप्रतिनिधियों की बहुमत पर आधारित इच्छा ही निर्णायक होगी। ऐसे में पार्टी किसने बनाई और उसके लिए किसने, कब और कितना त्याग या बलिदान किया, इन सब कारकों का कितना भी ऐतिहासिक महत्व क्यों न हो, चुनावचिह्न के फैसले में उनके मुकाबले वर्तमान का मूल्यांकन ही निर्णायक होगा। जाहिर है कि इस मामले में वह बाप के बजाय बेटे के पक्ष में गया है, जिसके द्वारा दाखिल शपथ पत्र बताते हैं कि बहुमत असंदिग्ध रूप से उसके साथ है। इसके विपरीत बाप के पक्ष ने इतिहास पर भरोसा किया, जो कानून के अनुसार निर्णय का आधार नहीं हो सकता था।
जहां तक विधानसभा चुनाव की बात है, उसमें सपा की अन्तर्कलह के कारण और निदान नहीं, मतदाता की इच्छा निर्णायक तत्व है और इसका मूल्यांकन भी भूत पर नहीं वर्तमान पर ही आधारित होगा। इस लिहाज से देखें तो पार्टी, चुनाव चिह्न और झंडा ही निर्णायक होता तो 2007 में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी हारती ही नहीं। क्योंकि तब उसमें न तो कोई नेतृत्व का विवाद था, न ही कानूनी दिक्कत या अड़चन। उसके नेता एक सुर से यही बताते घूम रहे थे कि हम वापस आ रहे हैं। लेकिन मतों की गिनती हुई तो परिणामों ने उसे सत्ता में वापस लाने के बजाय बेहद कम सीटों पर पहुंचा दिया। इसके उलट 2012 में जब कोई उसके सत्ता तक पहुंचने की भविष्यवाणी या मूल्यांकन नहीं कर रहा था, वह अपनी पूर्व परम्पराओं और इतिहास को दरकिनार करती हुई सर्वाधिक यानी बहुमत से अधिक सीटें पाकर जीती और सत्ता में आ गई। फिर तो इसी बाप ने अपनी पसंद के आधार पर पार्टी के निर्वाचित विधायकों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से निर्दिष्ट कर उनके बल पर इसी बेटे को मुख्यमंत्री पद तक पहुंचा दिया। उसे लेकर अरसे तक लोग यही कहते रहे कि वह तो प्रशिक्षार्थी है और वास्तविक साढ़े चार मुख्यमंत्री तो अलग हैं। बाप भी उससे जब तब यही कहता रहा कि वह उसके छोटे भाई यानी अपने चाचा शिवपाल से विरोध न बढ़ाये वरना उसको सत्ता से हाथ धोना पड़ेगा।
लेकिन अंतत: इस बेटे ने चाचा को भी गच्चा देकर उनसे पार्टी व सरकार के सारे पद छीन लिये और बाप के सारे तथाकथित मन्सूबों व निर्णयों को निरर्थक बना दिया। अब हम देख ही रहे हैं कि वह खुद को राजनीति का बाप से भी बड़ा महारथी साबित कर चुनाव आयोग तक में उससे दो-दो हाथ करके भी ऐसी स्थिति में पहुंच गया है, जिसकी लोगों को कल्पना और भान नहीं था। अब चुनाव आयोग जैसी निर्णायक संस्था ने भी उसके किये पर  मुहर लगा दी है और साबित हो गया है कि असली पार्टी तो बेटे की ही है।
क्या इसके बाद भी इस सवाल का जवाब देने की जरूरत है कि राजनीति में निर्णायक किसे माना जाये? पुराने और पहचान वाले लोगों को धता-बताना इतना ही बड़ा ‘गुनाह’ है, तो अभी 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी ने यही करते हुए केन्द्र की सत्ता तक की मंजिल तय कर ली और उन सभी को राजनीतिक वनवास देकर बदला भी चुका लिया, जो पहले उनके विरोध में खड़े थे। सवाल है कि उनकी शक्ति और हैसियत इस कदर किसने घटा दी कि मोदी पर पुराने दागदार चेहरे के उनके आरोप भी निरर्थक हो गये?
 साफ  है कि किसी नेता की जनता में स्वीकार्यता का मुख्य आधार उसकी विश्वसनीयता होती है, जिसे जतन से प्रयास करके अर्जित करना होता है। हम जानते हैं कि मोदी ने इसे अर्जित करने के प्रयास में अपनी पार्टी के कई पुराने मुद्दों और मामलों को उठाया ही नहीं। राममंदिर से निकल रहे हिन्दुत्व या कि वाद को अपनी पसन्द नहीं बताया, बल्कि ‘सबका साथ, सबका विकास’ को ही निर्णायक माना। यह बात दूसरी है कि आज जनता पूछने लगी है कि क्या मोदी अपने वादों पर कायम हैं और वांछित स्थिति ला रहे हैं? जनता के कई हिस्से इस सवाल के रूबरू भी होने लगे हैं कि उसके मूल्यांकन में कोई चूक तो नहीं हो गई?
 देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश दुनिया के छठे बड़े देश से भी बड़ा है। बड़े आकार के लिहाज से इसके स्वार्थ, पहचान, दिशा और स्वरूप एक नहीं हो सकते। ऐसे में राजनीति के खिलाड़ी इस बड़े मैदान में किस प्रकार के दांव चलेंगे, जीत के लिए कौन-से अस्त्र या उपकरण प्रयोग करेंगे, देखने की इससे बड़ी चीज यह होगी कि उनके दांव पेंच मतदाताओं को पसंद आते हैं या नहीं। 80 लोकसभा सदस्यों वाले प्रदेश में किसी दल ने 2014 में सर्वाधिक 73 सीटें जीत ली थीं, यह आज की तारीख में मतदाताओं के फैसले का निर्णायक तत्व नहीं हो सकता। तब सपा ने मुलायम परिवार के प्रत्याशियों के नाम पर मोदी के बाद दूसरे स्थान पर रहकर पांच सीटें जीतीं थीं और अब यह परिवार ही सपा की अन्तर्कलह का मुख्य कारक बन गया है, जिससे न मुलायम का गांव या जिला बचा है, न पार्टी। फिर भी उनके परिवार की एकता की दुहाई देने वाले भूल जाते हैं कि उस परिवार के जो पांच सदस्य लोकसभा में पहुंचे, उनमें से चार परिवार के स्वयंभू मुखिया व पार्टी के नायक के विपरीत खेमे में ही जा खड़े हुए! ठस मुखिया ने अपनी पसंद के जिन 19 लोगों को राज्यसभा में भेजा था, उनमें से भी बारह ने उसके विरोध का झंडा उठा लिया। इन हालात में किसी परिवार के वाद या उसकी और उसके मुखिया की निर्णायक स्थिति को सदैव के लिए अपरिवर्तनशील नहीं माना जा सकता। ‘महाभारत’ का उत्तरार्ध भी तो यही संदेश देता है कि ‘पुरुष बलि नहीं होत हैं, समय होत बलवान, भीलन लूटी गोपिका, वही अर्जुन वही बान’। जाहिर है कि सही निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए इस बात की पहचान करनी पड़ेगी कि आज के समय की दु्रत परिवर्तनशीलता में कौन से मुद्दे प्रमुख और निर्णायक हो गये हैं और कौन से गौण?
परिवारवाद और मित्रता के द्वंद्व और परिणामों की दृष्टि से देखा जाये तो यह भी देखना होगा कि स्वार्थों का द्वंद्व कैसे निर्णायक बन जाता है। समय के अनुसार उसे पहचानना भी पड़ेगा। आखिरकार मुलायम ने बेनीप्रसाद वर्मा और अमर सिंह दोनों को राज्यसभा में भेजा था तो पुरानी दोस्ती के ही कारण। लेकिन आज दोनों अलग अलग क्यों खड़े हैं? क्या अमर सिंह में विश्वसनीयता का कोई नया आधार जुड़ गया था?
 अंत में कहना होगा कि सपा के संकट के इस मुकाम तक पहुंचने का एक और बड़ा कारण यह भी है कि वहां निर्णय प्रक्रिया में समुदाय नहीं बल्कि व्यक्ति महत्वपूर्ण हो गया था। यही कारण है कि बहुत कुछ अघटनीय यानी ऐसा घटा, जिसकी उम्मीद नहीं की जा सकती थी।  आगे चलकर इसमें बेटे की सत्ता का स्वार्थ भी जुड़ा, जिसके बारे में एक वक्त कहा जाता था कि उसकी हैसियत नहीं कि बाप की इच्छा के विरुद्ध जाकर उससे पंगा ले। उसने पंगा भी लिया और उसमें विजय का अध्याय भी लिखा।
 फिलहाल, नये मोड़ पर खड़ी समाजवादी पार्टी अपने संकटों के निवारण का रास्ता जनअपेक्षाओं के साथ खड़े होकर ही खोज सकती है। पुराना इतिहास बदलेगा, मिटेगा और नया बनेगा तो प्रभुत्व के मानक बदलेंगे ही। इस सिलसिले में यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हम जिसे महाभारत कहते हंै, वह वास्तव में परिवार का ही द्वंद्व था।


 

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